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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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Sharir aur Chetna शरीर और चेतना

जीवन का अर्थ सामाजिक संबंध है। बिना संवाद या संचार के संबंध टूट  जायेंगे और जीवन ढह जायेगा। बिना स्वस्थ मन के कोई स्वस्थ शरीर अन्य व्यक्तियों से संवाद करने का  अच्छा साधन नहीं बन सकता। स्वस्थ या अच्छे मन के बिना अच्छा शरीर संभव नहीं है। अन्य व्यक्तियों से संपर्क और संवाद स्थापित करने के लिए स्वस्थ शरीर और अच्छे मन की नितांत आवश्यकता है। अस्वस्थ शरीर व्यक्ति की मानसिक शक्तियों को स्थूल स्तर पर ही लगाये रहता है। फलतः व्यक्ति शरीर के अतिरिक्त अन्य किसी विषय के संबंध में सोच ही नहीं सकता। पीड़ा स्वसर्थपरता को जन्म देती है। जब कोई व्यक्ति सतत किसी शारीरिक कष्ठ से पीड़ित होता है, तो उसके लिए यह संभव नहीं होता कि वह  दूसरों की ओर ध्यान दे सके। प्रत्येक मनुष्य के पास दूसरों को देने के लिए कुछ अवश्य होता है। यदि कोई व्यक्ति कष्ट के कारण दूसरों को अपनी सेवाएं अर्पित नहीं कर सकता है, तों निश्चित ही वह अस्वस्थ है।
    पीड़ा या कष्ट से मुक्ति पाने के लिए जीवन के शारीरिक पक्ष से अधिक श्रेष्ठ आयाम को खोजने का प्रयास करना चाहिए। जब मनुष्य आत्मविश्लेषण प्रारंभ करता है तो वह अपने को समझना भी प्रारंभ कर देता है, और उसको यह ज्ञान होने लगता है  िकवह केवल शरीर नहीं है। वह शरीर के साथ इतने दितों तक रह चुका होता है कि वही शरीर से अपने को भिन्न नहीं समझ पाता है तथा वह निरंतर शरीर को ही सर्वस्व समझने लगता है। यह विश्वास इतना दृढ़ हो जाता है कि व्यक्ति चाहे जितना इध्ययन करे, चाहे जितनी कोई उसे शिक्षा प्रदान करे, लेकिन व्यक्ति की संपूर्ण चेतना केवल देह भाव के ही चारो ओर केन्द्रित बनी रहती हैै। वस्तुतः शरीर वायुयान के अड्डे के समान है, जिसमें आत्मा रुपी यान उतरता है। कुछ क्षणों के जिए आप पढ़ना बंद कर दीजिये। अपनी कुर्सी से उठने का प्रयास कीजिये। विचार कीजिये और ध्यान दीजिये। आपको शीघ्र ही अनुभव होगा कि आपका शरीर खड़े होने का काम नहीं कर रहा है, अपितु आपके शरीर के अंदर कोई अन्य है, जो अड्डियों और मांस के इस ढेर को खड़े होने का आदेश देता है। शरीर तो साधन या उपकरण मात्रा है, जो आदेश का पालन करता है।
    जब व्यक्ति सूक्ष्म रुप से आत्मनिरीक्षण करता है, तो उसे ज्ञात होता है कि शरीर के अंदर एक केन्द्र है, उसमें इतनी शक्ति होती है, जिसके कारण ही व्यक्ति दृढ़ता से खड़ा हा लेता है, शांति से बैठ जेती है, शांति से बैठ लेता है चल लेता है या प्रतीक्षा कर लेता है अथवा जो इच्छा करता है, वह कर लेता है इस केन्द्र में इतनी क्षमता होती है कि यह आपका सबसे बड़ा मित्रा अथवा सबसे  बड़ा शत्राु हो सकता है, स्वसस्थ्य का स्त्रोत हा सकता है अथवा बड़ा मित्रा अथवा सबसे बड़ा शत्राु हा सकता है, स्वास्थ्य का स्त्रोत हा सकता है अथवा रोग का मूल कारण बन सकता है।