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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

01.06.2020, ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) दऺहम (देवादेव) (दशमी) च़ऺन्दॖरवार (सोमवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Jyesth Maas Shukla Paksh Dashamiyaam Partamiyaam Ekadashmiyaam Somvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_ 31 Sapthrishi Samvat _ 5096
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Chaitan Kalyan चैतन्य कात्याग


एक बार चैतन्य महाप्रभु नाव मे जा रहे थे।साथ में उनके बचपन के मित्रा रघुनाथ पंडित भी थे,  जो संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान माने जाते थे ।चैतन्य महाप्रभु ने उन्हीं दिनो ंन्याय दर्शन पर एक उच्च को टिका गं्रथ लिखा था।उन्होंने उसे रघुनाथ पंडित को दिखाया और उसके कुछ अंश भी पढ़कर सुनाए।पंडित जी कुछ देर ध्यान से सुनते रहे। सहसा उनका चेहरा मुरझा गया और वह रोने लगे।  यह देख चैतन्य को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने उनसे रोने का कारण पूछा।पंडित जी बोले, ‘मित्रा,  मैंने वर्षों तक घोर तपस्या के बाद न्याय पर एक बड़ा ग्रंथ लिखा था। सोचा था कि यह अपने ढंग का बेजोड़ ग्रंथ होगा।इससे मुझे यश मिलेगा और कुछ धन भी प्राप्त हो जाएगा।पर इस विषय पर तुम्हारा गं्रथ इतना समर्थ है कि मेरे ग्रंथ को तो कोई पूछेगा ही नही। इसका सारा महत्व समाप्त हो गया।भला सूर्य के आगे दीपक की क्या बिसात।’ यह सुनकर चैतन्य बड़ी सहजता से बोले, ‘दुखी मत हो।तुम्हारे ग्रंथ का गौरव मेरे कारण कम होने वाला नहीं है।’ यह कहकर उन्होंने अपना ग्रंथ फाड़कर गंगा में फेंक दिया।