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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) च़ोरम (चतुर्थी) बॊम्वार (मंगलवार),श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Today isJyesth Maas Shukla Paksh Chaturthiyaam Mangalvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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Kya Uchit hai Kya Anuchet क्या उचित है, क्या अनुचित?

कमल सरोवर के निकट बैठे तथागत शांत मुद्रा में, विभोर से गंधपान कर रहे थे।
तभी एक देवकन्या ने कहाµ “तुम बिना कुछ दिए ही गंध का पान कर रहे हो। तुम गंध चोर हो।“
    तथागत ने देखा और सिर झुका लिया। तभी एक ग्राम्य बालिका आई और निर्दयतापूर्वक कमल पुष्प तोड़ने लगी। तालाब का पानी भी अस्वच्छ कर दिया। देवकन्या अभी भी खड़ी थी। उसे मौन देखकर तथागत ने कहाµ “देवी! मैंने तो केवल गंधपान ही किया था। तब भी तुमने मुझे चोर कहा और यह तो कमल पुष्प तोड़ रही है, सरोवर को अस्वच्छ भी कर रही है। तब भी तुम इससे कुछ नहीं कह रहीं?”
    देवकन्या मुस्कराई। सहज स्मृति में से स्नेहभरा स्वर फूटाµ “यह अबोध है, अज्ञानी है। क्या उचित है, क्या अनुचित? यह वह नहीं जानती। उसके कार्यकलाप सहज संचालित हैं, पर आप ज्ञानी हैं, नीतिमर्मज्ञ हैं, धर्म के ज्ञाता हैं। क्या श्रेय है और क्या प्रेय? यह आप भली प्रकार जानते हैं। आपकी लघु से लघु क्रिया भी औचित्य एवं अनौचित्य की कसौटी पर कसकर ही क्रियान्वित होनी चाहिए।” पुनः तथागत का शीश अवनत हो गया। इस बार शीश ही नहीं, हृदय भी लज्जित हो आया था। उन्होंने अनुभव किया शिक्षित और विचारशील लोग जब तक नैतिक आचरण नहीं करते सामान्य प्रजा तब तक सुधरती नहीं।