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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

01.06.2020, ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) दऺहम (देवादेव) (दशमी) च़ऺन्दॖरवार (सोमवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Jyesth Maas Shukla Paksh Dashamiyaam Partamiyaam Ekadashmiyaam Somvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_ 31 Sapthrishi Samvat _ 5096
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Manshikta मानसिकता: अब समय है आगे बढनें का

यह समय आगे बढनें का है। एक समय था जब सफल व्यापार, रिश्तें हुआ करतें थे। ये सब अब पहलें कि तरह जीवंत नहीं होतें। आप ऐसें लोगों से मिलोगे जो किसी भी चीज़ में शामिल होते हैं, परंतु उस चीज़ में उनकी रूचि समाप्त होनी शुरू होती है तो वे उससे दूर होनें लगतें हैं। आप खुद भी यह पायेंगे कि आपका हृदय भी अब उसमें नहीं है फिर भी आप उसे बनायें रखनें कि कोशिश करतें है क्योकि यदि किसी नें भी उसें बचानें कि कोशिश नहीं की तो यह समाप्त हो जायेगी। परंतु आपको क्यों सोचते है कि आप इसे बचाये ऐसा ईश्वर चाहतें है। हो सकता है कि वा चाहता है कि यह नष्ट हो ताकि वा कुछ नई रचना कर सके।

आप जानतें हैं कि ईश्वर चाहता है कि आप वह करें जिसके लिये वह आपको प्रेरित करता है। जब आपनें प्रेरित होकर कुछ निर्माण किया था तो वह सर्वोत्तम था। उसके निर्माण करनें में आप प्रसन्नता एवम् पूर्णता का अनुभव करतें है परंतु अब आप पहले जैसा कुछ भी महसूस नहीं करतें। हर संभव प्रयास के बाद भी आप पहले जैसी प्रेरणा महसूस नहीं करतें। आप सोचतें है कि चूंकि ईश्वर ने इसको बनाने के लिये आपका नेत्रत्व किया था, वह चाहता है कि आप इसें जारी रखें। आप जुनून को पुर्नजीवित करने की पूरी कोशिश करतें है परंतु इसके लिये अत्यधिक उर्जा की आवश्यकता प्रतीत होती है।

 सत्‍य यह है कि वह एक क्षण के लिये अच्छा था परंतु अब एक नया क्षण आ गया है और इसलिये यह नई चीज़ का समय है। जब निर्माण प्रारंभ होता है तो कुछ उत्कृष्ठ हो सकता है और कुछ लम्बी अवधि के लिये यह जारी रहता है परंतु एक समय आता है जब प्रतीत होता है कि यह समाप्त हो रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि चूंकि यह हमेशा के लिये नहीं था तो यह उपक्रम प्राथमिकता के लायक नहीं था। जब आप किसी कार्य को करनें के लिये प्रेरित थे तो वह उस कार्य को करने का उचित समय था। जब उस कार्य को करनें का उदेश्य समाप्त हो चुका है तो यह उस कार्य को खत्म करनें का उचित समय है।

 वास्तव में कुछ भी पूरी तरह से दूर नहीं होता, केवल अपना रूप बदलता है। पहले किये गये कार्यों या अनुभवो का प्रभाव नयें कार्यों अथवा अनुभवों का हमेशा एक हिस्सा बना रहेगा। यदि वह कार्य प्राथमिकता से नहीं किया गया तो यह नयें कार्यों को गहन व अर्थपूर्ण रूप से प्रभावित नहीं करेगा। कुछ भी ऐसा नहीं है जो व्यर्थ है या निरर्थक है। किसी समय किया गया कोई कार्य जो प्रेरणा या प्रेरित होकर किया जाता है वह  अनंत काल कि सार्वभौमिक और उनसे जुड़ी योजनाओं को प्रभावित करता है।

जब आप यह जानते है कि ईश्वर आपको आपके मन कि इच्छा के अनुसार चलाता है तो आप उन रिश्तो व कार्यों से क्यों लटक रहें है जिनमें अब आपका मन नहीं है? ऐसा इसलिये कि आपको डर है कि आपके पास जो है आप उसे खो देंगे। सत्य यह है कि आप कुछ भी नहीं खो रहे है। ईश्वर चाहतें है कि आप नये अनुभावों की ओर बढें जो आपके पहले अनुभावों से भी बेहतर होंगे। ऐसे रिश्तो व व्यापार को जानें दे जिनका हिस्सा बनने की इच्छा समाप्त हो चुकी है। नये रास्तों के लियें पुरानें रास्तों को जानें दो। ''जानें दो'' सीखने पर आप हमेशा परिपूर्ण महसूस करेंगे।

 प्रत्येक पल में, अपने कार्यों को स्वभाविक रूप से संचालित करने की अनुमति दे। जब आप प्रेरित होने का निर्णय करते है ताब आपका हमेशा मार्गदर्शन होगा जैसे- कब क्या करना है। जब आप कुछ ऐसा कार्य को करनें के कोशिश करतें है जिसके लियें आप प्रेरित नहीं है तो आप उस प्रक्रिया को संचालित करनें की कोशिश कर रहें है जबकि खुद को संचालित क़रना है। जब कभी कुछ घटता है तो आपको यह पता होता है कि यह कार्य नहीं होगा क्योकि प्रभु यह नहीं चाहते है। कार्यो को घटनें देनें के बजाय खुद के माध्यम से कार्यों को होनें दे।

 जब आप प्रत्येक क्षण में, जो आप को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, उसके अनुसार कार्य करतें है तब आप चीजो को ईश्वरीय तरीको से होने की अनुमति देतें है। कार्यों का साधारण क्रम जो दुनिया के मस्तिष्क में है वह है कि एक कदम के बाद, तार्किक रूप से, दूसरा कदम होना चाहिये जब तक कि वह कार्य पूर्ण न हो। परंतु जब आप साधारण तर्क के बजाय आत्मा का अनुसरण करतें है तब लोग सोच सकतें है कि आप गलत क्रम में व सही तरीके से कार्यों को नहीं कर रहें है। जब आप आत्मा का अनुसरण करतें है तब आप उच्‍च स्तरीय तर्क का अनुसरण करतें हैं। तब आप चीज़ो को समान्य क्रम में नहीं अपितु ईश्वरीय क्रम से करतें है।

 आत्मा तुम्हे एक उत्पाद बनाने का उपाय दे सकती है और तुम उस प्रेरित विचार पर कार्य करके उस उत्पाद का कार्य पूर्ण करतें हैं। वस्तुओं के साधारण क्रम के अनुसार, अगला तार्किक कदम दुनिया में उस उत्पाद को बेचना है। परंतु यदि आप अगले कदम के लिये प्रेरित नहीं है, क्योकि आप इसके बजाय कुछ और बनाना चाहते हैं, तो आपकी आत्मा आपका मार्गदर्शन कर रही है। आत्‍मा ने उस क्षण के लिये, आपको उसके निर्माण के लिये निर्देशित किया। संभवतः यह उसके लोकार्पण का सही समय नहीं है।

 इसलिये आत्मा का पालन करके आप उसे एक अलमारी में रख दे व अन्य किसी वस्तु पर कार्य करें। दुनिया के लिये अपने कोई कार्य अधूरा छोडा है जो कि वास्तव में एक सफल व्यक्ति का स्वभाव नहीं होता। परन्तु कुछ समय पश्चात, हो सकता है सालो बाद, आप उस उत्पाद को बाहर निकालने के लिये प्रेरित हो, जो अपने पहले रचा था, और दुनिया में उसका लोकर्पण करें। तब यह एक महान सफलता बन जाता है क्योंकि यही सही समय था। इसीप्रकार इश्वरीय क्रम व सही समय सर्वोत्तम परिणाम प्रस्तुत करतें है।

आप भी कार्यों के साधारण क्रम का अनुसरण करनें के लिये खुद को विवश करतें है जबकी आप ऐसा करनें के लिये प्रेरित नहीं है। परन्तु आप सोचतें है कि कार्य करने का सही तरीका यही है। लेकिन जब आप इसी तरीके से कार्य करतें है  तो आप उस कार्य के पूर्णतः असफल होने पर आश्चर्यचकित रह जाते है और आप सोचते है कि क्या सच में आप इसी चीज़ की रचना के लिये प्रेरित थे। यहा तक कि जब आप उसे उसी समय लोकर्पण के लिये निर्देशित होते है, परिणाम इश्वरीय क्रम व समय  के बहुत बाद आता है। इसलिये प्रत्येक क्षण आत्मा पर विश्वास करें व उसका पालन करें।