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दमी डीठम नद वहवनी, दमी डयूठुम सुम नत तार। दमी डीठम थर फवलवनी, दमी डीयूठुम गुल नत खार।। Now I saw a river flowing, Now neither a bridge nor a ferry. Now I saw a plant in full bloom, now neither a flower nor a thron to be seen.

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || 8|| आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्र्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।। ८।। There are personalities like yourself, Bheeshma, Karna, Kripa, Ashwatthama, Vikarn, and Bhurishrava, who are ever victorious in battle. (8)  श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय पहला श्लोक.।।८।।

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यज्ञ के लिए


यज्ञ के लिए ‘स्व’ की अनुष्ठाानिक मृत्यु चाहिए

अतीत कभी व्यतीत नहीं होता, क्योंकि अतीत ही वर्तमान को जन्म देता है। समय शब्दहीन है,

         वह शब्दातीत भी है। वह अपना अर्थ देकर समाप्त होता है। और परंपरा से सभी बंधे हैं। जीवन भी परंपरा है, मरण भी एक परंपरा है। दोनों के बीच जो समय है, वही पूरा जीवन है। यही विशाल बोध की यात्रा है। विशालता का बोध फकीरी की दुनिया है। विशालता का बोध ही मंजिल हे।

         किसी सत्य का तीन चैथाई हिस्सा हमें दिखाई ही नहीं पड़ता, उसका सिर्फ एक हिस्सा दिखाई पड़ता है। इसलिए जो दिखाई पड़ता है। वह बड़ा आकर्षक जान पड़ता है। जो दिखाई पड़ता है, वही उसे शेष के साथ जोड़ने का सूत्रा है। जब हम समग्र की बात करते हैं, तो समग्र में वह अधिक है, जो दिखाई नहीं पड़ रहा है। पर है अवश्य।

         अनुष्ठान के स्तर पर यज्ञ में पहला चरण होता है दीक्षा का। दीक्षा के माध्यम से आप एक ऐसे जगत में प्रवेश करते हैं, जिसे आप लघु विश्व की संज्ञा दे सकते हैं। यह अपने को खोजने की तैयारी है कि आप जो कुछ कर रहे हैं, वह सबकी ओर से कर रहे हैं और सबके लिए कर रहे हैं। इस सोच का एक तात्पर्य यह भी है कि एक तरह से आपके भीतर जो निजता है, वह नष्ट हो जाए। पहले आपकी आनुष्ठानिक मृत्यु हो जाए। वह चाहे यज्ञ हो, चाहे पूजा हो- एक प्रक्रिया होती है कि पहले अपने भीतर के संकोच को जलाकर राख कर दें और फिर नया जन्म लेकर अपने अस्तित्व की पताका फहराएं।

         जब हम नदी की धारा बनते हैं तो नदी का जो वास्तविक संसार है, वह ओझल नहीं होता रहता है। उससे वैराग्य नहीं होता है, उससे विराग (विशेष राग) बना रहता है। स्वयं को बांधने की आसक्ति यहां नहीं रहती है। जब क्षुद्रता नहीं रहती, एक विशाल दृष्टि रहती है तो संयम अपने आप होता है, क्योंकि तब लोभ नहीं होता। संबंध संसार से छूटता है और ब्रह्म से और दृढ़ हो जाता है, तब संसार में रहते हुए भी वह नहीं रहता। उसका रूपांतरण हो जाता है। संसार के प्रति दृष्टि बदल जाती है। तब न कोई द्रष्टा रहता है न दृश्य।

         कालिदास ने कहा ‘परस्परेण स्पृहणीय शोभाम्’ यानी एक अलंकरण शरीर के अंगों की शोभा बढ़ाता है। लेकिन साथ ही वही अंग उस अलंकरण की शोभा भी बढ़ाता है। यही समग्र भाव संपूर्ण सृष्टि के बारे में होना चाहिए। विशालता के बोध में न दुख रहता है और न सुख। विछोह की वंचना नहीं रहती और मिलन की खुशी भी नहीं रहती।

         एक अन्य सूत्रा है कि जीवन में नैरन्तर्य एवं समग्रता का भाव हो। संहार का अर्थ विध्वंस नहीं है, इसका अर्थ समेटना है। नैरन्तर्य का अर्थ है कि मृत्यु अंत नहीं है। मृत्यु नया प्रारंभ है और मृत्यु को उस रूप में देखा जाता है जिस रूप में श्रीकृष्णा को समझाते हुए आंगिरस ने कहा कि तुम यह अनुभव करो कि तुम अच्युत हो, तुम अक्षत हो। तुम प्राण संशित हो। तीनों शब्द बड़े महत्वपूर्ण हैं। तुम अपने को अव्यय मानो। जो खर्च होने पर भी खर्च नहीं हुआ, जो व्यय होने पर भी व्यय नहीं हुआ, वह तुम हो। तुमने अपने आप को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया। सब कुछ दे दिया। लेकिन तब भी तुम हो, तुम्हारा कोई अंश है जिसका व्यय नहीं हुआ। तुम्हारा कोई एक घर नहीं है। तुम्हारा कोई एक ठौर नहीं है। तुम  सर्वत्रा हो और कहीं नहीं हो। किसी को अपना कह सको ऐसा भी नहीं है ओर किसी को पराया कह सको, ऐसा भी नहीं है।