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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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जीवन की चुनौतियों का सामना करना

कितनी ही बार हम स्वयं को या अपने परिवार के सदस्यों को छोटी-मोटी तक़लीफ़ों के बारे में शिकायत करते हुए देखते हैं! अपने जीवन में हमें कई शारीरिक चुनौतियों से जूझना पड़ता है। बचपन में हमें बाल्यावस्था संबंधी रोग हो जाते हैं। बाद के वर्षों में भी हमें अनेक बीमारियाँ झेलनी पड़ती हैं। जब कभी हम ज़्यादा खाना खा लेते हैं, तो हमारे पेट में दर्द हो जाता है। हममें से कई लोग इन बातों को लेकर बहुत पेरशान हो जाते हैं और शिकायत करते रहते हैं।

 

लेकिन अगर हम आसपास नज़र दौड़ायें तो देखेंगे कि कितने ही लोग गंभीर विकलांगताओं से पीड़ित हैं। हम देखेंगे कि किसी का कोई अंग नहीं है तो किसी को कोई जानलेवा बीमारी है। इनमें से कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इन चुनौतियों के बावजूद ज़िन्दगी को भरपूर जीते है। ऊपर दी गई कहानी के काँलेज विद्यार्थी की तरह ही वे अपने शरीर की तक़लीफ़ों का असर अपने मन और आत्मा पर नहीं पड़ने देते।

 

हम वास्तव में आत्मा हैं। हमारा सच्चा स्वरूप आत्मिक है। शरीर केवल आत्मा के ऊपर चढ़ा आवरण है। अध्यात्म के द्वारा हम अपने सच्चे आंतरिक रूप को पहचान सकते हैं। ध्यान-अभ्यास और प्रार्थना की मदद से हम अपनी आत्मा को शरीर से अलग कर सकते हैं ताकि हम जान सकें कि हम वास्तव में हैं कौन।

 

हममें से कइयों के पास कारें हैं। कई बार कार ख़राब हो जाती है और उसे मरम्मत के लिए भेजना पड़ता है। इससे हमें चाहे थोड़े दिनों के लिए असुविधा हो और हमें किराये पर कार लेनी पड़े या हमारे परिवार के किसी सदस्य या मित्र को हमें अपनी कार में यहाँ-वहाँ घुमाना पड़े, लेकिन हमें ऐसा तो नहीं लगने लगता मानो हमारी ज़िंदगी ही ख़त्म हो गई हो। हम जानते हैं कि कार तो सिर्फ़ एक भौतिक साधन है जिसका इस्तेमाल हम अपने शरीर को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए करते है। इसी तरह हमारा शरीर भी हमारी आत्मा के लिए एक भौतिक साधन ही है। कभी-कभी इसमें ख़राबी भी आ सकती है। लेकिन इससे हमारी आत्मा पर असर नहीं पड़ना चाहिये। हम अपने जीवन को भरपूर जी सकते हैं, चाहे हमारा भौतिक साधन ख़राब हो या सही।

 

जीवन के किसी न किसी मोड़ पर हमारे शरीर में बढ़ती आयु के चिह्म दिखने लगते हैं। हालाँकि ‘जिनोम प्रोजेक्ट’ द्वारा वैज्ञानिक उस ‘जीन’ या गुणसूत्र को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं जो आयु के बढ़ने के लिए उत्तरदायी है, और हो सकता है कि एक दिन ऐसा भी आये जब अनेक लोग सौ वर्षों से भी अधिक समय के लिए जियें, लेकिन फिर भी ऐसा एक दिन अवश्य आता है जब हमारा शरीर उतनी अच्छी तरह काम नहीं कर पाता जितना कि युवावस्था में करता था। परंतु हमें इस बात से निराश नहीं होना चाहिये। वृद्धावस्था में कई लोगों का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, लेकिन यह बात उन्हें अपनी आत्मा की गहराई में शांति प्राप्त करने से रोक नहीं पाती।

 

इसी प्रकार हम भी शारीरिक चुनौतियों के बावजूद मानव जीवन का भरपूर लाभ उठा सकते हैं। अंतर में प्रभु के संपर्क में आकर और उनके दिव्य प्रेम का अमृत चखकर हम वो प्रेम दूसरों में भी बाँट सकते हैं। ऐसा हममें में हरेक कर सकता है, चाहे हमारी शारीरिक परिस्थिति कैसी भी हो। यदि हम किसी बीमारी के कारण घर पर हैं,तो हम अपने परिवार के उन सदस्यों को प्रेम बाँट सकते हैं जो हमारी देखभाल कर रहे हैं। वास्तविकता तो यही है कि जो बीमार है वो सिर्फ़ हमारा भौतिक आवरण है; हमारी आत्मा तो हमेशा पूर्ण रूप से स्वस्थ रहती है।