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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

01.06.2020, ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) दऺहम (देवादेव) (दशमी) च़ऺन्दॖरवार (सोमवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Jyesth Maas Shukla Paksh Dashamiyaam Partamiyaam Ekadashmiyaam Somvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_ 31 Sapthrishi Samvat _ 5096
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आत्मशक्ति का पूर्ण समर्पण

श्री रामकृष्ण परमहंस शिष्यों को उपदेश दे रहे थे। वह समझा रहे थे कि जीवन में आए अवसरों को व्यक्ति साहस तथा ज्ञान की कमी के कारण खो देते हैं। अज्ञान के कारण उस अवसर का महत्त्व नहीं समझ पाते। समझकर भी उसके पूरे लाभों का ज्ञान न होने से उसमें अपने आप को पूरी शक्ति से लगा नहीं पाते। शिष्यों की समझ में यह बात ठीक ढंग से न आ सकी। तब श्री रामकृष्ण देव बोलेµ “नरेंद्र! कल्पना कर तू एक मक्खी है। सामने एक कटोरे में अमृत भरा रखा है। तुझे यह पता है कि यह अमृत है, बता उसमें एकदम कूद पड़ेगा या किनारे बैठकर उसे स्पर्श करने का प्रयास करेगा।”
    उत्तर मिलाµ “किनारे बैठकर स्पर्श का प्रयास करूँगा। बीच में एकदम कूद पड़ने से अपने जीवन अस्तित्व के लिए संकट उपस्थित हो सकता है।” साथियांे ने नरेंद्र की विचारशीलता को सराहा, किंतु परमहंस जी हँस पड़े, बोलेµ “मूर्ख! जिसके स्पर्श से तू अमरता की कल्पना करता है, उसके बीच में कूदकर, उसमें स्नान करके, सराबोर होकर भी मृत्यु से भयभीत होता है।“
    ”चाहे भौतिक उन्नति हो या आध्यात्मिक, जब तक आत्मशक्ति का पूर्ण समर्पण नहीं होता सफलता नहीं मिलती।” यह रहस्य शिष्यों ने उस दिन समझा।