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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

01.06.2020, ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) दऺहम (देवादेव) (दशमी) च़ऺन्दॖरवार (सोमवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Jyesth Maas Shukla Paksh Dashamiyaam Partamiyaam Ekadashmiyaam Somvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_ 31 Sapthrishi Samvat _ 5096
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अहंकार ही बंधन हैं

एक तपस्वी किसी धर्मात्मा राजा के महल में पहुँचे। राजा गद्गद हो गए और पूछा, आज मेरी इच्छा है कि आपको मुँहमाँगा उपहार दूँ। तपस्वी ने कहा, आप ही अपने मन से सबसे अधिक प्रिय वस्तु दे दें, मैं क्या माँगू। राजा ने कहा, अपने राज्य को समर्पण कर दूँ। तपस्वी बोले, वह तो प्रजाजनों का आप तो संरक्षक मात्रा हैं। राजा ने बात मानी और दूसरी बात कही, महल, सवारी आदि तो मेरे हैं, इन्हें ले लें। तपस्वी हँस पड़े, राजन् आप भूल जाते हैं। यह सब भी प्रजाजनों का है। आपको कार्य की सुविधा के लिए दिया गया है।
    अबकी बार राजा ने अपना शरीर दान देने का विचार व्यक्त किया। उसके उत्तर में तपस्वी ने कहा, यह भी आपके बाल-बच्चों का है, इसे कैसे दे पाएँगे। राजा को असमंजस मंे देखकर तपस्वी ने कहा, आप अपने मन का अहंकार दान कर दें। अहंकार ही सबसे बड़ा बंधन है। राजा दूसरे दिन से अनासक्त योगी की तरह रहने लगा। तपस्वी की इच्छा पूर्ण हो गई।