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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

01.06.2020, ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) दऺहम (देवादेव) (दशमी) च़ऺन्दॖरवार (सोमवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Jyesth Maas Shukla Paksh Dashamiyaam Partamiyaam Ekadashmiyaam Somvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_ 31 Sapthrishi Samvat _ 5096
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प्रत्येक व्यक्ति भगवान बन सकता है

प्रत्येक व्यक्ति भगवान बन सकता है
हर आदमी मे जन्म से ही दैवी गुण भी होते हैं और दानवी अवगुण भी। ये गुण अवगुण इस प्रकार अदृश्य होते हैं, जैसे तिल में तेल। घर के संस्कारों, वातावरण और अपने प्रयासों से इन गुण-दोषों का विकास होनले लगता है। यदि जन्म से मृत्यु तक मनुष्य को अपने गुणों के विकास के लिए उचित वातावरण मिलता है और वह स्वयं भी प्रयासरत रहता है, तो वह अपने उन दैवी गुणों का विकास करता हुआ पूर्णता को प्राप्त करता है- तब वह भगवान हो जाता है।
    भगवान बनने की क्षमता हरेक आदमी में होती है। कुछ लोग ईश्वर एंव भगवान को एक ही समझते हैं। लेकिन दोनों में बहुत फर्क है। ईश्वर निराकार, अजन्मा, अजर, अमर, òष्टा और पालनकर्ता है, जबकि भगवान तो मनुष्य के जीते-जागते उसके भौतिक शरीर में ही प्रकट होता है, उदाहरण के लिए बुद्ध व महावीर।
    ‘भगवान’ शब्द के अनेक अर्थ हैं, जैसे भगवान, भाग्यवान, भजनकर्ता, ऐश्वर्यवान, सुखभोक्ता, भगवान् आदि। ‘भगवान’ श्रेष्ठ शब्द है, उत्तम शब्द है, गौरवपूर्ण है। भगवान का अर्थ भग्न करने वाला भी होता है- जिस व्यक्ति ने राग, ईष्र्या, मोह, द्वेष आदि पापमयी भावनाओं और सेक्स, इन्द्रियों की संतुष्टि और भोग की इच्छा आदि को खत्म कर दिया है, वह भगवान है। जिसने सभी प्रकार के दुखों एवं क्लेषों को भग्न कर दिया है, वह भी भगवान है। जो व्यक्ति अकेले विचरण वाला, लौकिक और लोकोत्तर धर्मों के विभिन्न रूप को जानने वाला है, जो अर्थरस, धर्मरस व विमुक्तिरस को प्राप्त करने वाला है, वह भी भगवान है। जिसने क्रोध, लोभ, मोह व तृष्णाओं को भग्न करके उन पर विजय प्राप्त कर ली है, वह भगवान है।
    जो व्यक्ति अपने भव संस्कारों का अंत कर निर्वाण तक पहुंच गया है एवं जिसने काया, शील, समाधि की साधना पूरी कर ली है, जो व्यक्ति मन, वचन, कर्म से पाप नहीं करता, जो प्राणिमात्र की हत्या नहीं करता, चोरी नहीं करता, व्यभिचार नहीं करता, झूठ नहीं बोलता एवं किसी प्रकार का नशा नहीं करता और मन को हमेशा पवित्र रखते हुए धर्म का आचरण करता है, वह भगवान कहलाने योग्य है। 
    ऊपर दिय हुए गुणों के अलावा और भी ऐसे गुण हैं, जिनके पालन एवं सिद्धि से मनुष्य भगवान बनता है। ये गुण इस प्रकार हैंः-

1. दान- दान का अर्थ सिर्फ देना ही नहीं, बल्कि उदारता और निर्लोभता भी उसमें शामिल होना चाहिए।

2. शील- इसमें कायिक, वाचिक व मानसिक सभी प्रकार की क्रियाएं शामिल हैं। शील, नैतिकता व सदाचार है, जिसका पालन मनुष्य को भगवान बनाता है। 3. नैष्क्रय- यानी दुनियावी चीजों से लगाव न रखना।

4. प्रज्ञा- इसका अर्थ है सत्य का ज्ञान अर्थात जो जैसे वस्तु है, उसे उसी प्रकार जानना। प्रज्ञा से अविद्या, अंधश्रद्धा एवं पाखण्ड समाप्त हो जाते हैं और जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा होता है।

5. वीर्य- इसका अर्थ है कल्याण के मार्ग पर चलने के लिए बल, साहस व सतत श्रम का इस्तेमाल।

6. सहनशीलता- यदि आप में सहनशीलता होगी, तभी आप लाभ-अलाभ, यश-अपयश, प्रशंसा-निन्दा व सुख-दुख सब में समान भाव रख सकेंगे?

7. सत्य- सत्य के प्रति निष्ठा, उसकी स्वीकृति एवं उसका प्रतिपादन।

8. अधिष्ठान- यानी दृढ़ संकल्प।

9. मैत्री- यानी संसार के सभी जीवों के प्रति मित्र भाव। मैत्री के बिना करुणा और दया उत्पन्न नहीं हो पाती।

10. उपेक्षा- इसका अर्थ है सांसारिक सुख-दुख के प्रति उदासीनता का भाव।
    भगवान बनने के लिए उपरोक्त गुणों पर चलना जरूरी है। इन गुणों पर चलना तलवानर की धार पर चलने के समान कठिन होता है, पर असम्भव नहीं। असम्भव होता तो बुद्ध एवं महावीर कैसे भगवान बन पाते? जातक कथाओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि तीतर, बटेर, तोता, बया जैसे पक्षी और कुत्ता बन्दर, हिरन, बैल, भैंसा, शेर, हाथी आदि भी उपरोक्त गुणों पर चलने की वजह से बोधिसत्व बन गए थे। उस युग में शुद्र, वैश्य, क्षत्रिय एवं ब्राह्मण सभी उपरोक्त गुणों पर चलने की वजह से बोधिसत्व बन गए थे। जब पशु-पक्षी सद्गुणों का पालन कर भगवान बन सकते हैं, तो मनुष्य क्यों नहीं बन सकता?