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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

01.06.2020, ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) दऺहम (देवादेव) (दशमी) च़ऺन्दॖरवार (सोमवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Jyesth Maas Shukla Paksh Dashamiyaam Partamiyaam Ekadashmiyaam Somvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_ 31 Sapthrishi Samvat _ 5096
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अहंकार का अंत

गुजरात में एक लोककथा प्रचलित है कि बहुत पहले अहमदाबाद का नाम कर्णावती था, जहाँ का राजा था- अहमदशाह। उसी राज्य में साबरमती नदी के किनारे माणिकनाथ का आश्रम था। वे सिद्ध पुरुष थे। एक दिन घूमते हुए राजा आश्रम आया। उसे वह जगह बहुत पसंद आई। उसने मंत्राी को आदेश दिया कि उसके लिए यहां एक विश्रामगृह बनाया जाए। जल्द ही माणिकनाथ के आश्रम के पास निर्माण कार्य शुरु हो गया। इस पर माणिकनाथ को गुस्सा आया। उन्होंने कहा, ‘बादशाह की इतनी हिम्मत कि वह बिना मुझसे पूछे आश्रम में दखल दे। उसे मेरी ताकत का पता नहीं है।’
    मजदूर दिन भर दीवार चुनने का काम करते और रात को माणिकनाथ मंत्रा बल से दीवार गिरा देते। कई दिनों तक यह सिलसिला जारी रहा। राजा को पता चला तो वह परेशान हो गया। बादशाह को चिंतित देख उसके वजीर ने कहा, ‘आप चिंता मत करें। मैं इसका हम खोज लूंगा।’ वजीर माणिकनाथ के आश्रम में गया और बोला, ‘गुरु जी मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं। माणिकनाथ ने उसे आश्रम में रख लिया। कुछ दिनों के बाद वजीर ने माणिकनाथ से कहा, ‘गुरुवर, मैंने सुना है आपने कई सिद्धियां हासिल कर रखी हैं। कोई चमत्कार तो दिखाइए।’ बार-बार कहने पर माणिकनाथ ने अपना शरीर छोटा किया औश्र एक लोटे में प्रविष्ट हो गए। वजीर यही चाहता था। वह बोला, ‘बाहर तो निकलिए।’ मंत्रोचार करते-करते योगी थक गए, लेकिन लोटे से बाहर नहीं निकल सके। तभी आकाशवाणी हुई। योगी के गुरु महाराज कह रहे थे, ‘माणिक, अब तुम्हारे सिद्धि मंत्रा का असर खत्म हो गया है। तुम्हारे अंदर अहंकार पैदा हो गया है। तुम्हें परोपकार के लिए सिद्धियां मिली थीं। पर तुमने प्रजा की भलाई के लिए नहीं बल्कि अहंकारवश बादशह के काम में बाधा डाली। जाओ, बादशाह से क्षमा मांग कर मेरे पास आ जाओ।’ माणिकनाथ ने पश्चाताप करते हुए गुरु से क्षमा मांगी और प्राण त्याग दिए। बाद में अहमदशाह के नाम पर कर्णवती का नाम अहमदाबाद पड़ा और उसमें माणिकनाथ के नाम पर एक माणिक चैक बना।