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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

01.06.2020, ज़्येठॖ (ज्येष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) दऺहम (देवादेव) (दशमी) च़ऺन्दॖरवार (सोमवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, Jyesth Maas Shukla Paksh Dashamiyaam Partamiyaam Ekadashmiyaam Somvaasra sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_ 31 Sapthrishi Samvat _ 5096
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आस्था

एक आदमी के गाँव के पास एक बहुत ऊंचा पहाड़ था। उसके ऊपर हमेशा बर्फ जमी रहती थी और बादल मंडराते रहते थे। नीचे से उसका दृश्य बहुत ही मनोरम नजर आता था। बहुत दिनों से उसकी इच्छा थी कि एक बार वह उसकी चोटी पर जाए। अंततः एक दिन उसने दृढ़ निश्चय किया और चढ़ाई के लिए निकल पड़ा। पीठ पर उसने सारा जरूरी सामान लाद लिया और हिम्मत के साथ चढ़ना शुरू किया। चढ़ते-चढ़ते रात हो गई। बिल्कुल अंधेरा और खून जमा देने वाली ठिठुरन। पर उसने हार नहीं मानी, साहस नहीं छोड़ा- वह चढ़ता ही रहा। लेकिन जब वह बिल्कुल चोटी पर पहुंचने ही वाला था तो अचानक उसका पैर फिसल गया और वह चोटी से नीचे गिरने लगा। वह अपने संकल्प, अपनी ताकत, अपने साहस के साथ वहाँ तक चढ़ा था, पर गहरी खाई में गिरता हुआ वह भगवान से प्रार्थना करने लगा, हे भगवान बचा लो।

            अचानक एक जगह उसके हाथों को रस्सी का स्पर्श मिला। उसने उसे झपट कर पकड़ा। फिर भी तेज गति से गिरने के कारण वह फिसलता हुआ काफी नीचे तक पहुँच गया और हवा में झूलने लगा। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था, उसकी प्रार्थना चलती रही- हे प्रभु! किसी तरह बचा लो। अचानक तभी आवाज आई, तू क्या चाहता है? वह चैंका, फिर बोला, कौन? मैं भगवान! सुनते ही वह फिर करुण स्वर में याचना करने लगा, ओ दुनिया के मालिक! मेरी जिंदगी की रक्षा करो। ठीक है, तू रस्सी छोड़ दे, बच जाएगा। अंधेरे में वही स्वर फिर सुनाई पड़ा। अब तो वह आदमी घबराया, बड़ी मुश्किल से तो यह रस्सी हाथ लगी है, इसे कैसे छोड़ दूँ। वह डर गया, उसने रस्सी और जोर से कपड़ ली। वह रस्सी से रात भर लटका हुआ ठंड से अकड़ कर मर गया। लेकिन वह जमीन से मात्रा 10 फीट ही ऊपर लटका हुआ था। अगर वह रस्सी छोड़ देता तो बच जाता।

            आस्था और विवेक एक साथ नहीं फलीभूत होते, हमंे दोनों में से किसी एक को चुनना पड़ता है।