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दमी डीठम नद वहवनी, दमी डयूठुम सुम नत तार। दमी डीठम थर फवलवनी, दमी डीयूठुम गुल नत खार।। Now I saw a river flowing, Now neither a bridge nor a ferry. Now I saw a plant in full bloom, now neither a flower nor a thron to be seen.

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || 8|| आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्र्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।। ८।। There are personalities like yourself, Bheeshma, Karna, Kripa, Ashwatthama, Vikarn, and Bhurishrava, who are ever victorious in battle. (8)  श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय पहला श्लोक.।।८।।

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उत्तराधिकार


उत्तराधिकार

संत फ्रांसिस ने एक कोढ़ी को चिकित्सा के लिए धन दिया] वस्त्र दिए] स्वयं   उसकी सेवा की। एक गिरजाघर की मरम्मत के लिए दुकान की कपड़े की कई गाँठें और अपना घोड़ा बेचकर सारा धन दे दिया। उनके पिता को इन बातों का पता चला तो उन्होंने उन्हें मारा पीटा ही नहीं अपनी संपदा के उत्तराधिकार से वंचित भी करने की धमकी दी।

      पिता की यह धमकी सुनकर आपने मुझे एक बहुत बड़े मोह बंधन से मुक्त कर दिया है। मैं स्वयं उस संपत्ति को दूर से प्रणाम करता हूँ जो परमार्थ और लोकमंगल के काम में नहीं आ सकती। यह कहते हुए उन्होंने उनके कपड़े तक उतार दिए। उन्होंने पिता की सारी संपदा के अधिकार को लात मार दी।

      लोकसेवा के मार्ग में बाधा बनने वाली संपदा का परित्याग ही उचित है।