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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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Prakerti se dure प्रकृति से दुरी हमें जीवन से भी दूर करने लगती है



जीवन अत्यंत सुन्दर और आकर्षक है । दुर्भाग्य से इस समय मनुष्यों के भीतर जीवन के सौन्दर्य और आकर्षण को परखने व समझने की क्षमता में निरंतर गिरावट आ रही है । जिसके बारे में कभी सोचा भी नही गया था आज वही दुगुर्ण मनुष्यों पर भारी पड़ रहा है । 
दरअसल मनुष्य प्रकृति का अंश है , लेकिन प्रकृति के दो प्रमुख जीवन दायी तत्व वायु और जल निरंतर प्रदूषित हो रहै है । जंगल लगातार कम हो रहै है गगनचुंबी इमारतें आसमान तक मनुष्यों की नजरों पहुंचने नही देतीं। कुल मिलाकर मनुष्य प्रकृति ये दूर होता जा रहा है । वर्षो दूर यदि कोई मनुष्य सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं की पीड़ाओं से गुजरता भी था तो उसे एकान्त में प्रकृति का साहारा मिलता था । प्रकृति से जीवन के प्रति लगन बढ़ाने की आत्म प्रेरणा मिलती थी वर्तमान में समाज ,परिवार शासन -प्रशासन और प्रकृति सभी व्यक्ति के लिए प्रतिकूल हो चुके है । अवसाद,तनाव , मनोभ्रम ,मतिभ्रम ,शारीरिक -मानसिक व्याधियां और सोचने समझने की शक्ति के शून्य हो जाने जैसे रोग मनुष्य को बुरी तरह जकड़ चुके है । इन परिस्थितियों में मनुष्य अपनी संवेदना को कैसे बनाऐ रखे , यह महात्वपूर्ण है ।
संवेदना में अंतराल उत्पन्न होते ही मनुष्य की अंतरदृष्टि क्षीण होने लगती है । मनुष्य का व्यवहार  और आचरण आसमान्य होने लगता है । एैसे मनुष्य परिस्थितिजन्य दुर्गुणों और दुरगतियों के वश में हो जाता है उसका आत्म चिन्तन नगण्य हो जाता है । उसकी आत्मिक चेतना अदृश्य हो जाती है । वह मौलिक विचारों और अनुभूतियों  से रहित हो सर्वथा विध्वंसकारी गतिविधियों का सहज अंग बनने लगता है आज चंहुओर देखने पर अधिसंख्या मनुष्य विध्ंवसकारक गतिविधियों के ही अंग बने प्रतीत होते है। एैसे में जीवन से लगााव रखने वाले ,जीवन -सौन्दर्य के बौध से रंगानुभूत जीवन से स्नेह रख उसे कोमलता से सहजने वाले और प्रतिक्षण जीवन के उदात्त भाव से वंचित रहने वाले मनुष्य संशयग्रस्त है। 
यद्यपि उनके मनोभाव में जीवन का सौन्दर्य जनित संगीत निरंतर गुंज रहा है तथापि नकारात्मकता का व्यापक वातावरण उनके लिए चुनौती बन खड़ा है जब नकारात्मक मनुष्यों की संख्या अधिक हो ,दुर्गुणों से ग्रस्त मनुष्यों की भीड़ लगातार बड़ रही हो और पग-पग पर मनुष्यता ध्वस्त हो रही हो तब भी मनुष्यता के साथ जीना आशा का संचार करता है ।ऐसे मनुष्य निश्चित रूप से प्रेरणा श्रोत है । जीवन से प्रेम करने और जीवन सौन्दर्य के लिए लालायित रहने की शिक्षा ऐसे ही मनुष्यों से ग्रहण की जा सकती है जीवन के प्रति ऐसा दृष्टिकोण बताता है कि जीवन वास्तव में पुष्प वाटिका के समान है । जीवन में सर्वोत्तम बोध से संचित मनुष्यों से जीवन जीने की शिक्षा लेनी चाहिए । इसके बाद सभी मनुष्यों को लगने लगेगा कि जावन अदभुत है । 
जीवन का समय रचनात्मक मनुष्यों के लिए बहुत छोटा है । जीवन साकार है । जीवन में विकार नही है । जीवन बहुगुणों से  युक्त है । जीवन के लिए सर्वोच्च मानुसिक योग्यता यही होगी कि मनुष्य जीवन के क्षण -क्षणांस के प्रति अनुराग रखें । जीवन इतना अलौकिक और सुखदायी है कि इसे समझने के लिए मनुष्य की प्राकृतिक  आयु बहुत छोटी है । जीवन को इतनी सम्पूर्णता के साथ समझने और इसका परमानन्द लेने के लिए मनुष्य को पता नही कितने जन्म लेने पड़ेगें ! 
साभार: नवभारत टाइम्स - 11 नवम्बर 2019