दासय दया म्य करतस, छखय निर्विकार दीवी।

दासय दया म्य करतस, छखय निर्विकार दीवी।



दासय दया म्य करतस, छखय निर्विकार दीवी।

चरणन तल म्य वरतम, करतम उदार दीवी।।

 

छखय सृष्टि-स्थिति कत्र्ता, भकत्यन च पान भत्र्ता

विश्वरूप ही अकत्र्ता, छखय ¬ कार दीवी।। ॰ ।।

 

सन्तुष्ट न्यथ म्य आसुम, मंज़ ध्यानसय म्य भासुम

च़्यथ शायि च़य विकासुम, दिमि सत्विच़ार दीवी ।।

 

त्र्यन कारण च़ शक्ती, दिमि म्य पनञ भक्ती

बनिहे म्य यूग मुक्ती, च़ल्यम अन्धकार दीवी।।

 

योगीश्वरन च़ भासान, प्रथ शायि च़य विकासान

यिम सोक्त दिल छि आसान, तिमहय छिय हुसार दीवी ।। ॰ ।।

 

चय छख बन्धु -भ्राता, चय छय पिता त माता

च़य छख गुरू त दाता, बोजतम म्य ज़ार दीवी।। ॰।।

 

दिम स्मरण म्य अन्तर्, भासतम अन्दर त न्यबर्

सन्ताप कुय छु म्य ज़र, ऐ च़्यथ स्फार दीवी।। ॰ ।।

 

हा दास ! गछ च अर्पण, शुद्ध कर मन दर्पण

आनन्द बनिय विलक्षण, साक्षात्कार दीवी।