मैं मुसाफिर हूँ बिखारी
डूंडतीहू आपको
जन्म जन्म मैं फिरी हूँ
आपकी तलाश में
अब मिली है तनहाई
डूंडती हूं आपको ॥
मुझे मालूम कुछ नहीं है
क्या मिला हमको यह फल
यह आपकी है मेहरबानी
डूंडती हूं आपको ॥
क्या हुआ है हाल मुझ पर
जाल माया का है यह
जब हुई मुझ से जुदाई
डूंडती हूं आपको ॥
क्या बताऊगी मैं आपको
मैं किसी की भी नहीं
आपके बिना कोई नहीं मेरा
डूंडती हूं आपको ॥
क्षन भर मे दुनिया बदलती है
हमारे सामने
देखती हूं आपकी बड़ाई
डूंडती हूं आपको ॥
मैं बताऊं हाल अपना
यह कहने के लायक नहीं
क्या निशआना था मुझपर
ढूंढती हूं आपको ॥
दुनिया बदल जाती है
आदमी बदलते रहते हैं।
खबर क्या क्या होने वाला है
डूंडती हूं आपको ॥
यहा की सब फिजायें हैं
यह आपके नज़ारे हैं
आपकी शरण आई ह कमला
ढूंढती हूं आपको ॥
साभारः कमला रैना (चौगाम)