आज बसे सेवरी घर रामा...

- आज बसे सेवरी घर रामा...




आज बसे सेवरी घर रामा..

श्रीराम और श्रीकृष्ण सनातन भारतीय परंपरा के न केवल मानबिंदु हैं, बल्कि भारतीय समाज जीवन की आधार भूमि भी श्रीराम और श्रीकृष्ण की जीवन लीलाओं से सृजित और निर्मित है। इनके बिना भारतीयता और भारतीय सामाजिक चेतना की कल्पना नहीं की जा सकती है। जहाँ श्रीकृष्ण का लोकरंजक स्वरूप है, वहीं श्रीराम लोकरक्षक के रूप में माने और पूजे जाते हैं। राम और कृष्ण का लोक विन्यास उनके क्रमशः लोकरक्षक और लोकरंजक स्वरूप को लेकर विस्तार पाता है। विशेष रूप से राम की प्रतिष्ठा समाज में मर्यादित जीवन और आचार को लेकर है। संबोधनों में 'राम-राम' या 'जय सियाराम' या 'जय श्रीराम' आदि लोक-व्यवहार में मर्यादा की दुहाई देते हैं। रामराज्य की संकल्पना भी इसी पर केंद्रित है। संबंधों और व्यवहारों की मर्यादा के जीवंत स्वरूप राम के प्रति लोक आस्था की गहनता राम के व्यक्तित्व की विराटता को व्याख्यायित करती है। लोकजीवन में राम की व्याप्ति के साथ ही रामकथाओं का व्यापक विस्तार भारतीय समाज जीवन और सनातन भारतीय परंपरा में राम के वैशिष्ट्य को रेखांकित करता है। आद्यकवि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को भारतीय वाङ्मय में अद्धितीय स्थान प्राप्त है। महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण का विस्तार अन्य भारतीय भाषाओं में उत्तर से दक्षिण तक, और पूर्व से पश्चिम तक हुआ है। रामायण का आधार लेकर 88 विभिन्न रामकथाओं का सृजन भी हुआ है। विश्वना में रामकथाओं के अलग-अलग स्वरूप भी देखन को मिलते हैं। वाल्मीकि कृत रामायण के ब लोकभाषा में रचित सर्वाधिक प्रचलित रामकथा रूप में गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमान को जाना जाता है। लोकसाहित्य से लगाक प्रकीर्ण साहित्य से लगाकर शिष्ट साहित्य त रामकथा का विस्तार, राम के जीवन चरित गान विश्वसाहित्य में अन्यतम है। इतना विस्त और इतनी व्यापकता अन्य किसी के चरितगान मिलना असंभव ही होगा। वर्तमान असम के बराही राज्य के राज महामाणिक्य के आश्रित कवि माधव कंदली 14वीं सदी के मध्य में रामकथा लिखी थी। माध कंदली को अप्रमादी कवि के रूप में जाना जात है। उन्होंने अपने आश्रयदाता राजा की रामभन को पुष्ट करने हेतु रामकथा की सर्जना उन्हीं प्रेरणा से की थी। गोस्वामी तुलसीदास कृ श्रीरामचरितमानस का समय माधव कंदली द्वार रचित रामायण के लगभग 150 वर्ष बाद ठहरता है। वाल्मीकि रामायण के गौड़ीय पाठ इस सारानुवाद की भाषा ब्रजावली ब्रजबुलि लोक से संपृक्त सप्तकाण्ड रामायण में अप्रमा कवि माधव कंदली ने सात काण्डों में रचना की ऐसा उनके द्वारा कहे गए एक पद से स्पष्ट होता है। तथापि आदि काण्ड और उत्तर काण्ड अप्रा रहे। कालांतर में शंकरदेव और माधवदेव आदि इन दो लुप्त काण्डों का सृजन करके माधव कंदली को समर्पित किया और माधव कंदली की सप्तकाण्ड रामायण को पूर्ण किया। माधव कंदली कृत सप्तकाण्ड रामायण में असम के लोकजीवन की झलकियाँ दिखती हैं। इसके साथ ही राम के प्रजावत्सल स्वरूप के दर्शन विशेष रूप से होते हैं। राम का सरल और सहज स्वभाव, लोगों के कल्याण का भाव आमजन के साथ स्नेहपूर्ण प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करता है। दूसरी ओर गुरु विश्वामित्र के साथ जाकर वन-प्रांतरों को भयमुक्त करने, असुरों का दमन करने के कारण राम के प्रति प्रजा आस्थावान होती है। राजा दशरथ द्वारा कैकेयी को दिए गए वचनों के निर्वहन हेतु जब श्रीराम को वनवास जाना पड़ता है, तब प्रजाजनों के मन में आक्रोश उत्पन्न होता है। माधव कंदली की रामायण में प्रसंग आता है, कि वनवास जाते समय मंत्री सुमंत्र राम, लक्ष्मण और सीता को छोड़ने गए। अयोध्या के लोगों को भरोसा था,कि सुमंत्र उन्हें समझा-बुझाकर लौटा लाएँगे, लेकिन सुमंत्र के खाली हाथ लौटने पर अयोध्या की स्त्रियाँ उन्हें फटकारती हैं। माधव कंदली की सप्तकांड रामायण में राम के चित्रकट निवास का उल्लेख मिलता है। अयोध्या से भरत सहित अनेक लोग चित्रकूट जाते हैं, राम को अयोध्या ले आने के लिए,किंतु राम नहीं लौटते और भरत के साथ समस्त अयोध्यावासी लौट आते हैं। माधव कदली की रामायण में खाली हाथ लौटे पुरुषों को अयोध्या की स्त्रियों द्वारा पीटे जाने का वर्णन भी आता है। यद्यपि उपरोक्त दोनों प्रसंग पूर्वोत्तर में मातृपक्ष की प्रधानता और प्रभावपूर्णता को बताने वाले हैं,तथापि राम के प्रति लोकभावना की दृष्टि से ये दोनों प्रसंग राम के प्रति आस्थावान प्रजा के मनोभावों की व्यापकता को दर्शाते हैं। माधव कंदली की सप्तकाण्ड रामायण में वर्णित उपरोक्त प्रसंग वाल्मीकि रामायण के किसी पाठ में नहीं मिलते हैं। वाल्मीकि रामायण में प्रजावत्सल राम का स्वरूप अन्य प्रसंगों और अंतर्कथाओं के माध्यम से प्रकट होता है। आद्यकवि वाल्मीकि कृत रामायण का प्रारंभ ही संवाद के माध्यम से होता है। वाल्मीकिजी नारद मुनि से प्रश्न करते हैं, कि इस संसार में गुणवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी, दृढव्रत, प्राणिमात्र के हितैषी,विद्वान, धैर्यवान और तेजस्वी कौन हैं। उत्तर में नारद जी कहते हैं, कि आपने जिन गुणों का बखान किया है,वे सब दुर्लभ हैं, किंतु हम अपनी समझ से ऐसे गुणों से युक्त पुरुष को बतलाते हैं। मुनि वाल्मीकि जी की जिज्ञासा को शांत करते हुए नारद जी कहते हैं, कि अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम में ही ये सारे गुण मिलते हैं। नारज जी द्वारा विस्तार के साथ श्रीराम के गुणों का वर्णन किया गया है। इसी क्रम में नारद जी का कथन रामायण में आता धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः । यशस्वी ज्ञानसंपन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान् । । 12 || प्रजापतिसमः श्रीमान्धाता रिपुनिषूदनः । रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ।।13 ।। रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ।।14 ।। (वा.रा.,बालकाण्डे, प्रथमः सर्गः) दृढ़ प्रतिज्ञ और शरणागत की रक्षा करने के धर्म का निर्वहन करने वाले श्रीराम अपनी प्रजा के हितैषी हैं। वे अपने आश्रितों की रक्षा के लिए सदैव चिंतित रहते हैं। नारद जी श्रीराम के प्रजावत्सल स्वरूप का गान करते हुए आगे कहते हैं, कि राम प्रजापति ब्रह्मा के समान प्रजा का रक्षण करने वाले, शत्रुओं का नाश करने वाले और स्वधर्म तथा ज्ञानीजनों के रक्षक हैं। वेद और वेदाङ्ग के ज्ञान के साथ ही वे धनुर्विद्या में पारंगत हैं। शास्त्र के साथ ही शस्त्र का ज्ञान उन्हें लोकरक्षा के लिए समृद्ध और सशक्त बनाता है। धर्मविरुद्ध चलने वाले लोग उनके शत्रु हैं, जिनका विनाश करके वे धर्म की संस्थापना करते हैं। वाल्मीकि कृत रामायण में नारद मुनि और वाल्मीकि के मध्य संवाद से रामकथा का प्रारंभ होता है, और इस संवाद में ही प्रजावत्सल राम का लोकरक्षक स्वरूप प्रकट होता है। वाल्मीकि कृत रामायण के अरण्यकांड में प्रजावत्सल राम का स्वरूप निखरता है। वनवासी राम जब वन प्रांतर में प्रवेश करते हैं, तब वनों में रहने वाले सामान्य जनों के साथ ही ऋषि, मुनि, साधक, तपस्वी आदि भी स्वयं को भयमुक्त अनुभूत करने लगते हैं- ते वयं भवता रक्षया भवद्विषयवासिनः । नगरस्थो वनस्थो वा त्वं नो राजा जनेश्नरः । [20 || न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । रक्षितव्यास्त्वया शश्वदगर्भभूता स्तपोधनाः । 121 ।। (वा.रा. अरण्यकाण्डे, प्रथमः सर्गः) वाल्मीकि रामायण के राम देवता के रूप में नहीं हैं। उनके संवाद सामान्य प्रजाजनों के साथ सहज और स्वाभाविक हैं। राम देवत्व के गुणों से सुशोभित नहीं हैं। वे महामानव हैं। महामानव के रूप में उनकी प्रतिष्ठा उनके गुणों की श्रेष्ठता के कारण है, महानता के कारण है। वाल्मीकि के राम सामान्य मानव से महामानव की ओर चलते हैं। वे मानवीय मूल्यों की स्थापना करते हैं, उनका गान करते हैं, व्यवहार में प्रस्तुत करते हैं। मानव से महामानव की ओर का यह प्रयाण वाल्मीकि रामायण में प्रकट और परिलक्षित होता है। यही कारण है, कि वनवासी राम के वन-प्रांतर में पहुँचते ही वनवासी ऋषि मंडली स्वागत सत्कार में संलग्न हो जाती है। वनवासियों के लिए अयोध्या के 90 प्रख्यात राजपरिवार के सदस्यों का, विशेष राजकुमार राम का आगमन आश्चर्य से भर है। वे इसलिए और भी आश्चर्यचकित होते क्योंकि राम अयोध्या के होने वाले राजा भी हैं उनकी पत्नी सीता भी संग में हैं। यह सामान्य नहीं है, सरल नहीं है। राक्षसों की क्रूरता, अत्याचार और साधन विघ्न उत्पन्न करने की घटनाएँ कम नहीं थीं। अशांति का केंद्र बने हुए थे। वनवासी ऋषिगण मध्य राक्षसों का आतंक व्याप्त था, वे आत और भयग्रस्त होकर जीवन बिता रहे थे। राह को किसी बात का भय नहीं रह गया था, उनके द्वारा क्रूरताओं की पराकाष्ठा पार करते वन प्रांतरों को विभीषक स्थिति में पहुँचा दिया था। साधना के स्थल अपवित्र किए जा रहे ऐसी विपरीत और विकट स्थिति में राम, लक्ष्म और सीता वन में पहुँचते हैं। वनवासी राम, लक्ष्म और सीता का पहुँचना मानों एक नए युग सूत्रपात की तरह होता है। आतंक और भय साथ जी रहे ऋषियों को एक सहारा दिखता इसी कारण वे राम, लक्ष्मण और सीता के स्वाग का प्रबंध करते हैं। स्वागत सत्कार के साथ ही अपनी वेदना को, अपने दुःख को प्रकट करते वे कहते हैं, कि आपका राजतिलक होने वाला किंतु आपको वनवास मिला है। आप राजमह रहें, या वन में रहें, आपको हमारी रक्षा का लेना होगा। हम आपकी प्रजा हैं। आपके राज निवास करते हैं। आप राजसिंहासन में आरूढ या न हों, आप हमारे राजा हैं, और इसी अधि से हम आपसे अपनी रक्षा की विनती करते ऋषिगण आगे कहते हैं, कि हम लोगों ने क्रोध त्यागकर इंद्रियों को जीता है। हम शाप द्वारा उपद्रवियों का शमन नहीं कर सकते। हम इन्हें देने में असमर्थ हैं। अतः आपको हम सब तपस्ि की रक्षा अपनी प्रजा की तरह से करनी चाहिए। राम भी आश्वासन देते हैं, कि वे राक्षसों का नाश अवश्य करेंगे। वनवासी राम के साथ ऋषियों, साधु संन्यासियों का यह संवाद बहुत महत्त्व का है। एक राजा से उसकी प्रजा की दूरी यहाँ दिखाई नहीं देती है। सहजभाव से संवाद हो रहा है। प्रजा अपने पूरे अधिकार के साथ राजा से अपनी रक्षा की दुहाई दे रही है। राम भी वनचारी ऋषियों की बात को गंभीरता के साथ सुनते हुए आश्वासन दे रहे हैं। लोकरक्षक राम की छवि गुरु विश्वामित्र के साथ पहली बार वन आगमन पर बन गई थी। सामान्य जन को यह विश्वास है, कि क्रूर आक्रांताओं का नाश राम ही कर सकते हैं। राम की सहजता और सरलता भी सबकी देखी और जानी हुई है। इसी कारण अरण्यकांड में बहुत मार्मिक और सुंदर प्रसंग प्रस्तुत होता है। प्रजावत्सल राम का स्वरूप निखरता है। वाल्मीकि रामायण के साथ ही गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस में भी प्रजा और राजा के मध्य की दूरी नहीं दिखती । यहाँ भी वनवासी राम को अपने पास पाकर वन-प्रांतरों में निवास करने वाले कोल, भील आदि स्वागत के लिए उमड़ पड़ते हैं। गोस्वामी तुलसीदास इस प्रसंग का अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण वर्णन करते 音

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई ।

 हरषे जनु नव निधि घर आई ।।

 कंद मूल फल भरि भरि दोना ।

चले रंक जनु लूटन सोना ।।

 धन्य भूमि बन पंथ पहारा।

जहँ जहँ नाथ पाउ तुम धारा ।।

धन्य बिहग मृग काननचारी ।

सफल जनम भए तुम्हहि निहारी ।।

 जब तें आइ रहे रघुनायक ।

तब तें भयउ बनु मंगलदायक ।।

फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।

मंजु बलित बर बेलि बिताना ।।

(श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकांड, 135-137) कोल, किरात, भील आदि जब राम के वन आगमन की सूचना पाते हैं, तो प्रसन्नता से भर उठते हैं। उनके पास उपहार देने के लिए धन-संपत्ति नहीं है। वे तो पत्तों के दोने बनाकर उनमें कंद, मूल, फल आदि भरकर ले जाते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं, कि वह समय ऐसा लगता है, कि मानों रंक सोना लूटने के लिए जा रहे हों। राम का वन में निवास करना सुखद हो जाता है। भक्तकवि तुलसीदास पूरे वनक्षेत्र को धन्य कहते हैं, जहाँ राम ने अपने चरण रखे हैं। वस्तुतः यह आत्मीयता का भाव राम की सहजता और सरलता के कारण सुलभ होता है। यहाँ राजा और प्रजा के मध्य दूरी नहीं रह जाती है। वाल्मीकि रामायण से श्रीरामचरितमानस तक और आधुनिक युग में रामकथा गद्य के प्रणेता नरेंद्र कोहली की रामकथा-अभ्युदय तक राम के लोकरक्षक-प्रजावत्सल स्वरूप का एक अविरल क्रम देखा जा सकता है। अनेक रामकथाओं में राम के इसी स्वरूप की व्याप्ति है। वन प्रांतरों में निवास करने वाली विभिन्न प्रजातियों, जातियों को संगठित करके, उनके अंदर ऊर्जा का संचार करके, आत्मविश्वास जगाकर राम उन्हें सक्षम और समर्थ बनाते हैं। राम वन में सेना लेकर नहीं गए थे। उनकी शक्ति यही वनवासी बनते हैं। राम देवत्व के गुणों से सुशोभित होकर भी महामानव के रूप में अपने व्यक्तित्व की विराटता से जाने जाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास की वैष्णव-भक्ति की भावना राम को भले ही देवता के रूप में स्थापित करती हो, लेकिन तुलसी के मानस में भी

राम का महामानव रूप निखरता है। लोक की धारणाएँ और लोक की मान्यताएँ सदैव सहज और स्वाभाविक होती हैं। लोकजीवन में, लोकगीतों में, लोककथाओं और किस्सों में प्रजावत्सल श्रीराम को देखा जा सकता है। रामकथा में शबरी का प्रसंग अपना विशेष महत्त्व रखता है। अवध के भावी राजा राम शबरी के घर पधारते हैं। प्रजावत्सल राम का लोकविन्यास प्रजा के साथ राम के सहज और आत्मीय मिलन से विकसित होता है, बनता है। लोकगीतों में यह प्रसंग गाया जाता है-

 आज बसे सेवरी घर रामा।

सेवरी राम क आवत जाने, चंदन से लिपवावत धामा ।।

 कुस के आसन डारि बिछावे, लखन सहित प्रभु करै बिसरामा ।।

बइरी मकोइया फल लै आवै खात राम बहु करत बखाना ।।

(आज राम शबरी के घर आए हैं। रान आना है, ऐसा जानकर शबरी ने अपने घर चंदन से लिपवाया है। उसने कुश के बिछाए हैं, जिसमें राम और लक्ष्मण विश्राम हैं। शबरी बेरी अर्थात् बेर और बेर की जैसी प्रजा का फल मकोइया ले आई है, जिन्हें राम खात और स्वाद का गुणगान करते हैं।

अस्वीकरण :

उपरोक्त लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं और kashmiribhatta.in  उपरोक्त लेख में व्यक्त विचारों के लिए किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है। लेख इसके संबंधित स्वामी या स्वामियों का है और यह साइट इस पर किसी अधिकार का दावा नहीं करती है।कॉपीराइट अधिनियम 1976 की धारा 107 के तहत कॉपीराइट अस्वीकरणए आलोचनाए टिप्पणीए समाचार रिपोर्टिंग, शिक्षण, छात्रवृत्ति, शिक्षा और अनुसंधान जैसे उद्देश्यों के लिए "उचित उपयोग" किया जा सकता है। उचित उपयोग कॉपीराइट क़ानून द्वारा अनुमत उपयोग है जो अन्यथा उल्लंघनकारी हो सकता है।

साभार:- डॉ. राहुल मिश्र  कॉशुर समाचार मार्च, 2026