कश्मीर के राजा सुखजीवन मल साधारण से असाधारण शौर्य के प्रतीक

- कश्मीर के राजा सुखजीवन मल साधारण से असाधारण शौर्य के प्रतीक




कश्मीर के राजा सुखजीवन मल  साधारण से असाधारण शौर्य के प्रतीक

 

मध्यकालीन कश्मीर का इतिहास प्रायः रक्तरंजित रहा है। लगभग पाँच सौ वर्षों तक वहाँ के मूल निवासी हिंदुओं, जिन्हें कश्मीरी पंडित कहा जाता है, ने असहनीय यातनाएँ झेली और अपार क्षति उठाई। इसी पीड़ादायक कालखंड में आततायी और क्रूर अफगान शासकों के अत्याचारों से कश्मीर को मुक्त कराने का एक शौर्यपूर्ण अध्याय राजा सुखजीवन मल से जुड़ा हुआ है। साधारण सिपाही से राजा बनने तक की उनकी यात्रा संघर्ष, साहस और रोमांच से परिपूर्ण थी। यद्यपि उनका शासनकाल अधिक समय तक नहीं टिक पाया, फिर भी प्रशासनिक कुशलता और सीमाओं की रक्षा में प्रदर्शित उनका पराक्रम अतुलनीय था। मध्यकालीन कश्मीर के इतिहास में उनके शासन को स्वर्ण युग माना जाता है, जिसे 'वक्ते सखजू' के नाम से स्मरण किया जाता है। ऐसी प्रेरक और अपराजेय कथाओं का बार-बार उल्लेख होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि 1753 ईस्वी तक कश्मीर मुगलों के अधीन था। इसके पश्चात वहाँ क्रूर अफगान शासकों का अमानवीय और बर्बरतापूर्ण शासन आरंभ हुआ। इस दौर में कश्मीरी पंडितों की संपत्तियों को खुलेआम लूटा गया और सैकड़ों हिंदुओं की नृशंस हत्याएँ की गई। इतिहासकारों के अनुसार, कश्मीर पर अफगानों के आक्रमण में घाटी के दो प्रमुख नेताओं-मीर मुकीम कंठ और ख्वाजा जहीर दीदामारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन्हीं के आमंत्रण पर अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने कश्मीर पर अधिकार करने की योजना बनाई। कश्मीर पर सैन्य अभियान के लिए अब्दाली ने अब्दुल खान इश्क अक्कासी के नेतृत्व में एक निर्दयी सेना भेजी। तत्कालीन मुगल शासक को अपदस्थ कर अफगानों ने सत्ता अपने हाथ में ले ली और अब्दुल खान इश्क अक्कासी को कश्मीर का प्रथम सूबेदार नियुक्त किया गया। कश्मीर में लगभग पाँच महीनों तक अक्कासी के अत्याचारों का आतंक व्याप्त रहा। यह उत्पीड़न इतना भयावह था कि उसने पूर्ववर्ती सभी क्रूरताओं के रिकॉर्ड तोड़ दिए । अक्कासी का मुख्य उद्देश्य अधिकतम धन-संपदा लूटना और कश्मीर की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट करना था। जाते समय वह कश्मीर से एक करोड़ से अधिक की संपत्ति और बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर अफगानिस्तान की ओर भाग गया। जो लोग धन देने से इंकार करते थे, उन्हें कठोर शारीरिक यातनाएँ दी जाती थीं। किसी को सूली पर चढ़ा दिया जाता, किसी की तलवार से हत्या कर दी जाती, तो किसी को तप्त लोहे की सलाखों से दागा जाता। कुछ स्थानों पर विदेशी व्यापारी भी लूटमार के शिकार बने, किंतु अधिकांश अत्याचार हिंदुओं पर ही किए गए। असुरक्षा और भय के वातावरण में घाटी के अनेक हिंदुओं को पलायन का मार्ग अपनाना पड़ा। इनमें वे लोग भी शामिल थे, जो व्यापार के उद्देश्य से पहले से ही कश्मीर में बसे हुए थे। इस प्रकार अफगान शासनकाल ने कश्मीर के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय ताने-बाने को गहरी क्षति पहुँचाई । घाटी से अफगानिस्तान की ओर कूच करने से पहले अक्कासी ने शासन की बागडोर अब्दुल खान को सौंप दी थी तथा एक क्षत्रिय योद्धा सुखजीवन मल को अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त किया था। कालांतर में कश्मीर को अफगान शासकों के क्रूर शासन से मुक्त कराने हेतु प्रभावशाली अब्दुल हसन बांडे ने सुखजीवन मल के साथ मिलकर एक योजना बनाई और तत्कालीन अफगान शासक को परिदृश्य से बाहर कर दिया। इसके पश्चात सुखजीवन मल कश्मीर के वास्तविक शासक के रूप में उभर कर सामने आए। कश्मीर का शासक बनने से पूर्व सुखजीवन मल के भीतर गहन आत्मसंघर्ष चल रहा था। वे निरंतर इस विचार में डूबे रहते थे कि किस प्रकार कश्मीर की सांस्कृतिक धरोहर तथा कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। साथ ही वे सांप्रदायिक सौहार्द के प्रबल समर्थक थे। इतिहासकारों के अनुसार वे न्यायप्रिय, मानवीय मूल्यों के पक्षधर और सभी धर्मों व पंथों के प्रति समान दृष्टि रखने वाले शासक थे। अक्कासी की बर्बरता ने जनता को सड़क पर ला खड़ा किया था। व्यापार ठप्प हो चुका 86 था, परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहे थे भुखमरी फैलने लगी थी। इन परिस्थितिय समझते हुए सुखजीवन मल ने अपनी राजनी सूझबूझ और सामाजिक अनुभव के आधार कश्मीर को संकट से उबारने की ठोस रणन तैयार की। शासन संभालने के बाद उन्ह अफगानों से राजनीतिक संबंध तोड़ दिए 1754 ईस्वी में कश्मीर को स्वतंत्र घोषित दिया। इससे हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुद ने राहत की साँस ली। किंतु इतिहास को और ही मंजूर था। जब अहमद शाह अब्बा को यह ज्ञात हुआ कि कश्मीर उनके नहीं रहा, तो उन्होंने पुनः प्रभाव स्थापित का प्रयास किया। सुखजीवन को कश्मीर वायसराय मानते हुए उन्होंने अपने विश्वास ख्वाजा किजक को उनके अधीन भेजा तथा शर्त रखी कि वे जनता से अधिकतम धन व कर अफगानों को सौंपें। यह शर्त न तो सुखजीवन मल को स्वी थी और न ही उनके सहयोगी अब्दुल ह बांडे को। कश्मीर की जनता पहले ही अत्या झेल चुकी थी और अब सम्मानपूर्वक ज जीना चाहती थी। परिणामस्वरूप अफ आक्रमणकारियों और कश्मीरी सेना के भीषण युद्ध छिड़ गया। राजा के पराक्रम का परिणाम था कि बारामुला के निकट करन सेना ने आक्रमणकारियों को परास्त कर हटने को विवश कर दिया। इस विजय पश्चात बड़ी संख्या में युवक सुखजीवन मल सेना में भर्ती होने लगे। उधर अब्दाली लगात कश्मीर पर अधिकार करने के प्रयास रहा। उसने इश्क अक्कासी के नेतृत्व में लगभग तीस हजार सैनिकों की सेना भेजी, किंतु सुखजीवन मल की पूर्व तैयारियों के सामने वे टिक न सके और पराजित होकर लौट गए। मुख्यमंत्री अब्दुल हसन बांडे के सुझावों पर राजा ने प्रशासन में व्यापक सुधार किए। केवल विश्वसनीय और योग्य अधिकारियों को ही उच्च पदों पर नियुक्त किया गया। सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए सीमाओं पर अतिरिक्त सैनिक तैनात किए गए। किंतु प्रकृति राजा के अनुकूल नहीं रही। सन् 1755 में असामयिक वर्षा के कारण फसलें नष्ट हो गई और घाटी में भुखमरी फैल गई। लगभग दो वर्षों तक स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी रही। राजा ने अपनी सामरिक शक्ति को सुदृढ़ करने हेतु विशाल शस्त्रागार स्थापित किए थे, किंतु दुर्भाग्यवश जिस क्षेत्र में भारी मात्रा में हथियार संगृहीत थे, वहाँ अचानक आग लग गई। इससे शस्त्र भंडार को भारी क्षति पहुँची और संकट के समय सैनिक शक्ति कमजोर पड़ गई। यह भी अस्वीकार्य नहीं किया जा सकता कि अब्दाली ने जब यह समझ लिया कि सुखजीवन मल को सीधे युद्ध में परास्त करना कठिन है, तो उसने षड्यंत्रपूर्वक उनकी सामरिक शक्ति को कमजोर करने का प्रयास किया। किंतु इस षड्यंत्र के विषय में इतिहासकारों ने प्रायः मौन ही साधे रखा है। अब्दाली की शक्ति में निरंतर वृद्धि हो चुकी थी। उसने पुनः सिंधु पार कर पंजाब को अपने अधीन कर लिया। दिल्ली से लौटने के बाद उसने 1762 ईस्वी में लाहौर से नूरुद्दीन खान के नेतृत्व में अफगान सेना भेजकर कश्मीर पर कॉशुर समाचार मार्च 2026 आक्रमण करवा दिया। राजा सुखजीवन ने पूरी शक्ति के साथ शत्रुओं का सामना किया, किंतु इस बार उनकी सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी। अंततः युद्ध करते हुए वे बंदी बना लिए गए और नूरुद्दीन खान के समक्ष प्रस्तुत किए गए। इसके पश्चात उन्हें दयनीय अवस्था में लाहौर ले जाया गया, जहाँ अहमद शाह अब्दाली के आदेश पर उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गई। इतिहासकार पी एन कौल बाजई ने अपनी पुस्तक Culture and Political History of Kashmir के पृष्ठ 439 पर उल्लेख किया है कि नूरुद्दीन खान ने उन्हें अंधा करने का आदेश दिया था। इसी अमानवीय अवस्था में उन्हें लाहौर पहुँचाया गया, जहाँ अब्दाली की उपस्थिति में हाथी के पैरों तले कुचलकर उनकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार एक ऐसे हिंदू राजा का अत्यंत दर्दनाक अंत हुआ, जिसने कश्मीर की भूमि को अपने पराक्रम, सैन्य शक्ति और सदाशयता से सींचा था। समकालीन इतिहासकारों ने भी राजा सुखजीवन मल के व्यक्तित्व और कृतित्व की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। यदि अफगानों की कुदृष्टि इस क्षेत्र पर न पड़ी होती, तो संभवतः कश्मीर हर क्षेत्र में प्रगति के शिखर को छ लेता। इस प्रकार सुखजीवन मल का शासनकाल संघर्ष,साहस, दूरदृष्टि और राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो मध्यकालीन कश्मीर के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा। आज हम राजा सुखजीवन मल का पुण्य स्मरण करते हुए उन्हें शत् शत् नमन करते हैं

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साभार:- - महाराज कृष्ण भरत कॉशुर समाचार मार्च, 2026