डबल बनवास भी पार !

- डबल बनवास भी पार !




डबल बनवास भी पार !

 

निष्कासन...निष्कासन... निष्कासन... निष्कासन... धूपछाँव, सर्दी गर्मी, दुख-सुख, अमी गरीबी- इन सबमें निष्कासन की अवस्था अमूमन अकेला महसूस कराती है। आज पसेमंजर में अकेलेपन से जूझ रहे आदमी से भी ज्यादा अकेला। उसकी आंखो में कअनि, डब, कुठ, वोअट, ब्रअर कअनि, ठोकर कुठ और वुज़ । वो टूटा ब्रांद खुद जले हुए घर के मौन विलाप बंद लकड़ी के दरवाज़े को भीतर भीतर पीटता हुआ आते जाते लोगों की भीड़ इसकी तरफ हल्की सी नजर कर एकदम से मुंह फेर रही है।कुछ इसको जबरन उपहास परिभाषित करने पर आमादा है। क्या मैं नहीं? मेरी अवस्था और व्यथा स्पष्ट नहीं? मेरा शून्य गहरा मौन चिंतन का विषयनहीं? ये उपेक्षा ! इतनी दृष्टिहीन भावना और आचरण । मनुष्य...मनुष्यता... दया... धर्म... सत्यता किसका बोध हो रहा है यहां । निष्कासित क्या पदवी प्राप्त साधारण अवस्था होती है समाज और देश में। दर्पण से हर रोज अपना चेहरा देखकर पूछता रहता हूं। दर्पण से मानो एक गहरे असमंजस में उलझे गहरे सन्नाटे की गूंज लौट आती हो। मेरे अस्तित्व के कई टुकड़े कर जाती है। मुझमें बसा एक बेटा, एक भाई, एक पति, एक बाप...सबके मन छिल जाते हैं। सबकी सांसें उखड़ जाती हैं। मैं झट से चेहरे पर पानी के छींटे भर भर के डाल अपने को फिर से धोखे में जीने के लिए तैयार करता हूं। हौसला रख, तुम्हारे सब्र से अंधे भी तेरी पीड़ा को पढ़ेंगे। उपहास करने वाले गंभीर हो तेरे हाल पर आंखों में अश्रु लिए तुम्हें सिर्फ तुम्हें देखेंगे। और आती जाती भीडतुम्हारी तरफ बढ़कर तुम्हें न्याय के मार्ग के सहायक भी बनेंगे और न्याय होता देख के साक्षी भी। आंखों से बर्फ गिरने लगी फिर से । फिर से सब जम जायेगा। लालटेन आसपास रखो मुझे मेरी कलम थमा दो और 19 जनवरी 1990 वाला मेरी जिन्दगी की डायरी का पन्ना। उस पर दर्ज करूं मैं अपनी आत्मा का निष्कासन । ये खिडकी से धुंआ...। क्या जल रहा है? ओह! मेरा मकान या मेरे पूर्वजों का पार्थिवशरीर? शंखनाद कौन दे रहा रैणावारी के यारबल से?

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साभार:- अनिल नखासी  कॉशुर समाचार फ़रवरी, 2026