


कभी कभी
कभी कभी कुछ लम्हे, कितना भावुक कर देते हैं।
ऐसा क्यों होता है?
ऐसा कब होता है?
कोई मुस्कुराहट, कोई दुख भरा पल
अकस्मात किसी याद की छेड़।
पीड़ा होती है, खुशी भी कभी कभी
किसी की चाहत से
किसी के हंसने से... रोने से
किसी के आने से, बिछुड़ने से
कुछ कुछ हो जाता है
ऐसा क्यों होता है?
ऐसा ही क्यों होता है?
कोई भूली सी याद
कोई बिसरा हुआ सा एक नाम
एक चेहरा... एल पल
कोई ख्याल याद आता है क्यों?
कोई चाहत, जाग उठती हैं क्यों?
और बस
मन व्यथित हो उठता है
धक धक की गति
तीव्र सी हो जाती है
आंखें नम सी हो जाती हैं
सब कुछ रहते भी
लुटे हुए का एहसास होता है
और ठगे हुए से होकर भी
मन प्रसन्न सा हो उठता है
ऐसा क्यों होता है?
ऐसा ही क्यों होता है?
कभी कभी।।.
पूर्वजों के पूर्वजों...
के पूर्वजों... ने मेरे
उतार नन्दन धरा पर
इसे अथक परिश्रम से संवारा
दूर दूर तक सुनाई दी
फूलों की रंगबिरंगी हंसी
चर्चित हुई
सघन तरुओं की शीतल छांहें
फूलों की अनोखी मिठास
हरे कालीनों के अंतहीन विस्तार
अमिय जल वितस्ता का
ऊंचे श्वेत शिखरों से दोड़-दौड़
के आता
व मीठे गाने गाता
निर्मल नीर
पंछियों के मस्त कर देने वाले गान
रंगबिरंगी तितलियों व भौरे के नाच
पर अचानक यह क्या हुआ
अंधेरा छाया दिशा दिशा!!!
फूल मुर्झाए, पत्ते झरने लगे
गायब होने लगी हरियाली
तितलियों-भौरों के नाच को
लकवा मार गया!!
झरने पथरा गए
रक्तिम हो गई वितस्ता।
यह सब क्यों हुआ? कैसे हुआ??
सोचो सोचते रहो तब तक
जब तक
नन्दन फिर वही नन्दन
बल्कि उससे भी बेहतर
नन्दन से कई कदम आगे नन्दन
न हो ।
अस्वीकरण:
उपरोक्त लेख में व्यक्त विचार अभिजीत चक्रवर्ती के व्यक्तिगत विचार हैं और कश्मीरीभट्टा .इन उपरोक्त लेख में व्यक्तविचारों के लिए जिम्मेदार नहीं है।
साभार:- अशोक सराफ घायल एंव कॉशुर समाचार सितम्बर ,2018