मैथिलीशरण गुप्त की कविता गुरू तेगबहादुर का कश्मीरी अनुवाद

- मैथिलीशरण गुप्त की कविता गुरू तेगबहादुर का कश्मीरी अनुवाद




मैथिलीशरण गुप्त की कविता गुरू तेगबहादुर का कश्मीरी अनुवाद

सपरिचित कश्मीरी कवि कुमार अशोक सर्राफ घायल ने मुझे दिल्ली से फोन पर जब यह सूचना दी कि उन्होंने हिदी के प्रशस्वी कवि मैथिलीशरण गुप्त की ऐतिहासिक कविता गुरु तेगबहादुर' का कश्मीरी अनुवाद किया है, मैंने उन्हें बधाई दी। फोन पर ही उनसे कुछेक चुनिंदा पदों का कश्मीरी रूपांतर सुनकर मैं दंग रह गया। मूल पाठ के इतना निकट कश्मीरी रूपांतरण, मुझे अतिरिक्त खुशी हुई। एवं यह उनके तीन वर्ष के परिश्रम का सुफल है, ऐसा आ उन्होंने बताया।

मैंने इस अनुवाद को एक विस्थापित कश्मीरी कवि के नाते भी एक ऐतिहासिक कृतज्ञता (हिस्टॉरिकल इंडेटिडनेस) के साथ किया है। आप जानते हैं हम लोगों पर अलग से कितना ऋण है श्री गुरु तेगबहादुर का। मेरा अनुवाद सफल कहा जा सकता है या नहीं, यह मैं सुधी पाठकों पर छोड़ता हूं.. कुमार अशोक घायल की आवाज श्रद्धा विगलित थी।

मैंने उनसे पूछा "आपको दद्दा (मैथिलीशरण गुप्त) की इस कविता का ख्याल कैसे आया और यह रचना मिली कहां आपको?"

"विस्थापन के कुछ ही बरस बाद जब हम कश्मीरी पंडित हजारों की संख्या में एक कृतज्ञता-यात्रा के रूप में आनंदपुर साहब गए थे, उससे पहले दिल्ली में। गुरुद्वारा शीषगंज में भी कृतज्ञता अर्पित की थी। तभी से कुछ लिखने की बात थी मन में। फिर एक दिन यह हिंदी कविता हाथ लगी। मैथिलीशरण गुप्त की कविता । पढ़कर मैं अभिभूत हो गया। और बस ठान ली इसका कश्मीरी में अनुवाद करने की।

मेरे मन में कई प्रश्न उठे। हम कश्मीरी विस्थापितों में भी कितने लोगों को पता है कि मैथिलीशरण गुप्त ने अपने समय के अप्रतिम इतिहासपुरुष श्री गुरु तेगबहादुर के धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए तथा औरंगजेबी फासीवाद कि खिलाफ किए विलक्षण आत्म-बलिदान को लेकर काव्य रचा है।

कितने लोगों को पता है कि मैथिलीशरण गुप्त से भी पहले अट्ठाहरवीं शताब्दी में

रीतिकाल के आरंभिक दिनों में ब्रजभाषा के . एक महत्वपूर्ण कवि सेनापति ने गुरु तेगबहादुर के अद्वितीय प्राणोत्सर्ग को लेकर लिखा थाः

 

सगल सृष्टि पै ढापी

चादर

कर्म धर्म की जिनिं

पति राखी

अटल करी कलजुग में

साखी।।

सगल सृष्टि जा का

जस भयो।

जिह ते सरब धर्म बंचयो

तीन लोक में जै जै जै

भई

सतिगरि पैज राखि हम

लई।।

तिलक जनेऊ अरि

धरमसाला

अटल करी गुरु भए

दिआला।।

इसी तरह कितने लोगों को पता होगा कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंदा वीर वैरागी पर 'बंदी वीर शीर्षक से एक कविता लिखी है जो इसके तरह आरंभ होती है:

"पंच नदी तीरे

वेणी पकैया शिरे

देखिते दखिते गुरुर

मंत्रे जागिया उठिछे

सिख निर्मम

निर्भीक...

संभवतः मैथिलीशरण गुप्त की इस रचना गुरु तेगबहादुर" की पर्याप्त चर्चा और जानकारी के अभाव के कारण ही डा. आशानन्द वोहरा 'गुरु तेगबहादुर जी

जीवन और व्यक्तित्व' नामक आलेख में कहते हैं कि गुरु तेगबहादुर के जीवन और व्यक्तित्व पर हिंदी में स्वतंत्र ऐतिहासिक महाकाव्य अभी तक नहीं लिखा गया है। (गुरु तेगबहादुर : जीवन, दर्शन और विवेचना, सं. प्रेम प्रकाश सिंह, पृष्ठ 1) मैथिलीशरण गुप्त की यह रचना भले ही महाकाव्य न हो, लेकिन हिंदी में उन पर किसी ने कुछ न लिखा हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

कुछ दिनों के बाद कवि कुमार अशोक घायल के प्रकाशक उत्पल पब्लिकेशंस के मालिक मित्र उत्पल कौल ने मैथिलीशरण गुप्त के मूल हिंदी काव्य सहित कश्मीरी अनुवाद की पांडुलिपि मेरे पास भूमिका लिखने के लिए साग्रह भेजी। मैं ना नहीं कर सका। लोभ भी संवरण न कर सका।

यूनिवर्सिटी के दिनों पढ़ी 'गुरु तेगबहादुर' कविता आज बरसों बाद मेरे हाथ में थी। मैंने इसे पढ़ना शुरू किया कि अंत तक पढ़ता ही चला गयाः

"तेगबहादुर, हां, वे ही थे

गुरु पदवी के पात्र,

समर्थ।

तेगबहादुर, हां, वे ही थे

गुरु पदवी थी जिनके

अर्थ।। ..... .

यह लंबी प्रबंधात्मक कविता गुरु तेगबहादुर के  बलिदान की गाथा तो है ही, साथ ही यह उत्पीडित, शोषित और पद-दलित जनता के साथ कवि की पक्षधरता का भी परिचायक है।

राजनीतिक दमन, संकीर्ण सांप्रदायिक भावना अत्याचार और बलात धर्मातरण के विरुद्ध गुरु तेगबहादुर का तत्कालीन शक्तिशाली मुगलिया सलतनत के विरुद्ध डटकर खड़े होना मानवधर्म, सह-अस्तित्व और सौहार्द के उदात्त धर्मनिरपेक्ष जीवन मूल्यों की रक्षा में जान की बाजी लगाने की स्वर्णिम गाथा है। लोकमंगल के भावना से प्रेरित उनका जीवन आदर्श है उनका बलिदान यह विडंबना ही है कि स्वतंत्रता के बाद हमने लोकतांत्रिक भारत के सच्चे धर्मनिरपेक्ष महानायक के रूप में गुरु तेगबहादुर का ऐतिहासिक नायकत्व नही दिया। उल्टे में हम मैकालिफ, ट्रंप, पिंकाट जैसे विदेशी विद्वानों के पूर्वाग्रह जनित लेखन को महत्व देते रहे पर दुख-कातर संत कवि गुरु तेगबहादुर को लेकर नहीं लिखा गया।

||कवि मैथिलीशरण गुप्त।।

महावीर प्रसाद द्विवेदी के शिष्य मैथिलीशरण गुप्त हिंदी में राष्ट्रीय चेतना, गौरवशाली भारतीय अतीत के साथ ही साथ सांस्कृतिक, सामाजिक तथा भाषाई संवेदना और सौहार्द के प्रतिनिधि कवि हैं। गांधीवादी दर्शन से प्रेरित और प्रभावित मैथिलीशरण गुप्त स्वाधीनता आंदालेन में भी सक्रिय रहे। इसलिए उनके काव्य संसार में हम उनकी तत्कालीन भारतीय समाज की चिंताओं से उबरने की गंभीर छटपटाहट देखते हैं। वे इतिहास, पुराण मिथक से परंपरागत सौहार्द, नैतिकता, मानवीय संबंधों की पवित्रता और समानता की बहाली हेतु समाज में ऐसे पारंपरिक प्रतीकों, आदर्शों को केंद्रीयता देते हुए मिलते हैं।

भारत भारती', 'पंचवटी, यशोधरा, साकेत', 'मेघनाद वध', नहुष' जैसी उनकी अनेक मौलिक काव्यकृतियों तथा उनके द्वारा अनूदित रचनाओं को इसी दृष्टि से

देखा जाता है। उनकी कविता 'गुरु तेगबहादुर' की रचना प्रक्रिया के पीछे भी यही दृष्टि है। .

।।गुरु तेगबहादुर का आख्यान।।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्री डा. रमेश कुंतल मेघ के अनुसार इतिहास की यह

पैराडाक्स है कि गुरु तेगबहादुर द्वारा गुरुगदी पर बैठने 1665  के कुछ साल पहले वह (औरंगजेब) अपने अपने भाई दाराशिकोह का सर कटवा कर वैसा ही कत्ल करवा चुका था. अपने भाईयों और पिता को (गद्दी के उत्तराधिकारी  के संदर्भ में) कैद में डाल चुका था। इसके अलावा उसने सतनामियों की साधु जमात पर तेग चलाई और सरमद जैसे सूफी दरवेश को भी कत्ल कर दिया

कटरता की दशाओं में गैर-इस्लामी के बागी होने पर दो विकल्प थे-या तो वह इस्लाम कबूल करे अथवा मौत। गुरु तेगबहादुर की शहादत (भी) इसकी मिसाल

है।" (गुरु तेगबहादुर : जीवन, दर्शन और विवेचन , सं. प्रेम प्रकाश सिंह, पृष्ठ 127)

स्वभावगत कट्टरता, क्रूरता और करामातों में विश्वास  के कारण इतिहास में औरगजेब एक शक्तिशाली शासक के साथ ही एक दयनीय पात्र के रूप में भी जाना जाता । कार्ल मार्क्स उसे 'नोट्स ऑन इंडियन हिस्टरी

मास्को पृ. 51,53) में तो 'गधा' और 'बैल' तक कह देते हैं। डा. रमेश कुंतल मेघ अपने उपर्युक्त आलेख पृष्ठ 128) में लिखते हैं, कार्ल मार्क्स ने सन् 1666 वर्ष की डायरी में नोट किाय है कि 'अपने खुदगर्ज स्वभाव के बावजूद औरंगजेब मराठों के साथ शुरू से ही एक गधे की तरह तथा बाद में (1680)... 'एक बैल' की तरह व्यवहार करता चला।' अर्थात् यह औरंगजेब की पाश्विक प्रवृत्ति है जिसके धर्मांध रूप को विवेच्य कविता में गुरु तेगबहादुर का आध्यात्मिक संत व्यक्तित्व चुनौती देता है। मैथिलीशरण गुप्त की कविता में 'औरंगजेब' और गुरु तेगबहादुर हमारे लिए रूपक में बदलते हैं।

इस तरह आज भी गुरु तेगबहादुर का जीवनदर्श, समकालीन भारतीय समाज-जीवन में सौहार्द की स्थाई प्रतिष्ठा की दृष्टि से और अधिक प्रासंगिक हो उठता है।

। मैथिलीशरण की यह कविता।।

इस कविता के एक सौ उन्नीस पद हैं। सरस, सहज और करुण शब्द प्रवाह के साथ गुरु तेगबहादुर के जीवन, दर्शन और अप्रतिम बलिदान का ओजपूर्ण प्रतिपादन। गुरु तेगबहादुर' कविता सिख गुरु परंपा में नवमें गुरु तेगबहादुर के स्वभाव, वैराग्य, समभाव का निरूपण करती है।

ऐतिहासिक और राजनीतिक घटनाक्रम में उनका बलिदान प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार डा. महीप सिंह के अनुसार (गुरु तेगबहादुर के बलिदान का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, पूर्वोक्त संपादित पुस्तक, पृष्ठ 44) एक वृहत्तर विद्रोह की भूमिका का काम करता है और विद्रोह के बीज 'अस्वीकार में अंकुरित होते हैं।

अन्याय का यह 'अस्वीकार' अन्याय के प्रति विरक्ति या पलायन की स्थिति के बदले उससे सीधे जूझने में दिखता है।

कविता गुरु तेगबहादुर' में कवि मैथिलीशरण गुप्त बताते चलते हैं कि औरंगजेब की सुविचारित धार्मिक असहिष्णुता की हिंसक नीति के सताए कश्मीरी पंडितों के फरियादी जत्थे की हृदयविदारक गुहार सुनकर गुरु तेगबहादुर कैसे द्रवित हुए। कैसे जीवन के मोह को त्याग उन्होंने मृत्यु का सहर्ष वरण किया, उदात्त मानवीय जीवन मूल्यों की रक्षा करते किस तरह आसुरी अत्याचार सहे और अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।

इतिहासकार जदुनाथ सरकार (हिस्टरी ऑफ औरंगजेब, पृष्ठ 313) के शब्दों में उन्होंने (गुरु तेगबहादुर ने) कश्मीर के हिंदुओं को इस्लाम में जबरदस्ती दीक्षित करने का खुला विरोध किया था। दिल्ली बुलाए जाने पर उन्हें इस्लाम कबूल करने के लिए पांच दिन तक यातनाएं देने के बाद उनका शीष धड़ से अलग कर दिया गया।

 इस स्तब्धकारी घटना पर गुरु गोबिंद सिहं जी ओजपूर्ण काव्य-अभिव्यक्ति रोंगटे खड़े करने वाली है:

"ठीकरि फोरि दिलीस सिरि,

प्रभुपुर कियो पयान।

तेग बहादुर सी क्रिया करी

न किन हूं आनि।।

तेग बहादुर के चलत भयो

जगत को सोक।

है है है सभ जग भयो

जै जै जै सुरलोक।।

(दशम ग्रंथ, पृष्ठ 54)

अक्सर गुरु तेगबहादुर के बलिदान के संदर्भ में उद्धृत किया जाता है कि उन्होंने सीस दिया पर सीन उचरी। हमें उनसे दो सौ बरस पूर्व गुरु नानक देवी की वो वाणी याद करनी चाहिए जिससे सिख गुरुओं की बलिदानी मानसिकता बनी मालूम होती है

"जो तउ प्रेम का चाउ

सिरधर तली गली मेरी आउ

इत मारगि पैर धरीजै

सिर दीजै काणि न कीजै

अर्थात् यह कठिन मार्ग है। मेरी इस गली में आना चाहो तो सिर हथेली पर रखकर आना होगा। सिर देना होगा, पर उफ न करनी होगी। देखा जाए तो मैथिलीशरण गुप्त इस कविता में कामरूप (असम) बंगाल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और कश्मीर आदि की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में गुरु तेगबहादुर के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, उनके जीवन

और व्यक्तित्व, उनकी वाणी की तत्त्व-मीमांसा और कुल मिलाकर उनकी सक्रियता, उनकी दसियों प्रचार यात्राएं ऐतिहासिक कर्तारपुर की लड़ाई में उनकी शानदार भागीदारी पर अपने पिता हरगोबिंद से मिली प्रशंसा आदि की पृष्ठभूमि में कथ्य को विशद और बहुरेखीय बना सकते थे। कविता में एक स्थान पर संकेत भर मिलता भी है "शासन था औरंगजेब काल/चारों ओर मचा था त्रास। लेकिन कवि इस अवसर को शायद जानबूझकर हाथ से जाने देता है।

गुरु तेगबहादुर के जीवन-चरित्र से संबंधित जरूरी ऐतिहासिक दस्तावेजों के अध्ययन से एक बड़े परिप्रेक्ष्य का निर्माण हो सकता था। यह ऐतिहासिक कविता सच में एक बड़ी रचना बनती। लेकिन कवि एक विस्तृत फलक को दुख-कातर भाव से लिखकर इसे मेरे मतानुसार, उतनी बड़ी रचना नहीं बना पाए हैं। इसके बावजूद इस कविता का अपना समाजशास्त्रीय औ

हित्यिक तोहहा। यह कविता

न कहती कि समय

रु तेगबहादुर

जल्मो-सितम से

औरंगजेब) जाकर चिटठी क गुरु तेगबहादुर को

ऐतिहासिक महत्व है, साहित्यिक तो है ही यह कविता अपने कथ्य में मात्र इतनी सी बात न कहती कि समय के सताए कश्मीरी पंडित आनंदपुर आए गुरु तेगबहादुर को फरियाद की। उन पर ढाए जा रहे ज जुल्मो-सितम से चितित गुरु ने उन्हें बादशाह (औरंगजेब) जाकर चिटठी लिखने को कहा कि यदि एक गुरु तेगबहादुर को मुसलमान बना सकते हो तो सब कश्मीरी हिंदू इस्लाम कबूल करेंगे।

कविता आगे सरपट दौड़ती हुई गुरू के साथ  दिल्ली आए उनके शिष्य सचिव, विप्र बुधवार मति दास का उल्लेख करते हुए आगे वध स्थल की ओर बढ़ती है जहां पर धर्मातरण के प्रलोभनों छलो धमकियों तथा यातनाओं को अस्वीकार करने पर गुरु तेगबहादुर का शिरच्छेद कर दिया जाता है। और वहां पर गुरु तेगबहादुर के एक शिष्य पिता सहित प्रकट होते है । पिता अपने सिर को धड़ से अलग कर बेटे के लिए यह संभव करता है कि वह गुरु के शव को ले भागे और उसकी जगह उसका धड़ रखे। यह काल्पनि मोड़ सारी कथा के प्रभाव को कम करता है।

उस दौर में सिर्फ कश्मीरी पडिती पर ही धार्मिक उत्पीड़न नहीं हो रहा था। औरगजेब ने भारत को दारुल हरब' से दारुल इस्लाम बनाने हेतु पहले उज्जैन पर तलवार चलाई, फिर वाराणसी पर, फिर हरिद्वार और कुरुक्षेत्र पर । सबने कहा कि यदि कश्मीरी पंडित इस्लाम कबूल करेंगे तो पूरे हिंदुस्तान के हिंदु धर्मांतरण करेंगे। औरंगजेब ने इफ्तिखार खान को इस काम के लिए 1671 ई. में चौदहवें गवर्नर के रूप में कश्मीर भेजा। उसने कश्मीरी हिंदुओं पर बेइंतहा अत्याचार किए। ऐसे में मटन (मार्तंड) अनंतनाग के पं. कृपाराम के नेतृत्व में पांच सौ कश्मीरी पंडितों का फरियादी जत्था चके-नानकी (आनंदपुर) गुरु तेगबहादुर के पास पहुंचा।

कवि सेवा सिंह ने 'साहिब विलास' में इस घटना का एक सुंदर और सघन बखान इन शब्दों में किया है.

"दुखी विप्र चल के आए पुरी आनंद

बांह असाडी पकडिए, गुरु हरगोबिंद के चंद

तेगबहादुर जगत्गुरु, सुन इम हाहाकार

रछक गौ गरीब का कलजुग का अवतार

हाथ जोरि कहियो किरपाराम

दत्तज ब्राह्मण मटनग्राम

हमरो बल अब रहिया नहि काई

हे गुरु तेगबहादुर राई!"

मैथिलीशरण गुप्त इस प्रसंग को इस तरह रचते है

"देव यथा दैत्यों के भय से

आए थे दधीचि के द्वार।

कुछ कश्मीरी ब्राह्मण आकर

गुरु से करने लगे गुहार।।

डूब न जाए हाय! हे गुरुवर

निज नंदनवन-सा कश्मीर।

बरसाते हैं नयन-काल-धन

धेनु-रुधिर-धारा का नीर।

और कुमार अशोक घायल इसे कश्मीरी में ऐसे रखते हैं

"राख्यस बयि निश त्रहरेमित्य

आमित्य रेख्य दरवाज़स प्येठ।

केंह कॉशिर्य ब्रहमन ब्येसरेमित्य

द्वख विलजार आस्य आमित्य हेय।।

युथ न सॉज़ायि गछि ही गुरुवर

लूबवुन शूबवुन सोन कश्मीर।

खेहरनितिमत्य तिख्य मोकल सख्त

स्योद सादर यिने दिन हटि चीर।।

महत्प्रयोजन की सिद्धि के लिए गुरु तेगबहादुर के प्राणोत्सर्ग की विक्षोभकारी घटना को मैथिलीशरण गुप्त अनासक्त भाव के साथ इन शब्दों में निरूपण करते हैं

"ध्यानमग्न गुरु छोड़ चुके थ

मानो पहले ही निजी देह।

सिर कट गया और ऊपर को

बरसा उष्ण रुधिर का मेह।।

कुमार अशोक घायल ने इसे कश्मीरी में इस तरह पिरोया है:

- "गुरु श्री अमि ब्रोठ्य ऑस्य जन

 

त्यॉगिय शरीर तें दुनियों ही श्रेह।

म्वख गर्दनिगंड सोत सोत प्येव

तें रूदन वाहरोव सोत सोत श्रेह

गुरु तेगबहादुर की अंतिम वेला में उनके ब्रह्मलीन योगी रूप का जो कारुणिक वर्णन मैथिलीशरण गुप्त ने किया है वैसा ही वर्णन गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी बंदी वीर कविता में बंदा वीर बैरागी के बर्बर अंत के समय उनकी भावातीत अवस्था का किया है।

बोटी बोटी कटने पर भी एक कातर शब्द का उच्चार न करना उनके इसी योगीरूप का परिचायक है। देखें

"सभा होलो निस्तब्ध

बंदार देहो छिरिलो घातक

सरांशी करिया दग्ध

स्थिर होय वीर मरिल, ना करी

एकटी कातर शब्द

दर्शन जन मुदिल नयन

सभा होलो निस्तब्ध

अंत में कवि कुमार अशोक सराफ घायल को मैं बधाई देता हूं कि उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त की गुरु तेगबहादुर के अप्रतिम बलिदान पर लिखे काव्य का पूरी निष्ठा और सामर्थ्य के साथ का सार्थक रूपांतरण किया है। अनुवाद जितना सहज और संप्रेषणीय है उतना ही सफल भी होता है।

बर्ताल्ट ब्रेट के अनुसार कुछ लोग अनुवाद करते हुए कुछ ज्यादा की अनुवाद करते हैं जो कुमार अशोक घायल ने नहीं किया है। उनके अनुवाद में देशज महक है।

मैथिलीशरण गुप्त की ऐतिहासिक प्रबंध कविता का कश्मीरी काव्यानुवाद मूल हिंदी सहित प्रकाशित करने के लिए मैं उत्पल प्रकाशन के मालिक श्री उत्पल कौल को भी बधाई देता हूं। यह भी खुशी की बात है कि कश्मीरी अनुवाद के साथ ही साथ इसका पंजाबी अनुवाद भी प्रकाशित हो रहा है।

मुझे आशा है पाठक इस महत्वपूर्ण साहित्यिक पहल का भरपूर स्वागत करेंगे।.

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साभार:-   अग्निशेखर एंव कॉशुर समाचार  सितम्बर ,2018