नारी परिवेश

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नारी परिवेश

 

एक नारी होने के नाते अकसर में सोचा करती हूं कि नारी की परिभाषा क्या हो सकती है? परिभाषा तो वैसे प्रत्येक संज्ञा एवं कई अन्य सार्थक शब्दों की होती हैं। यहां तो हमारे सामने इस समय नारी है जिसके बारे में कहा जाता है कोमल है पर कमजोर नहीं, शक्ति का नाम ही नारी है। उसकी शक्ति के सामने मौत भी जाकर हारी है। नारी एक बहुरूपक सज्ञा है, जो पुरुष को जन्म देती है। अत नारी की परिभाषा उसके विभिन्न प्रकार के योगदानों के आधार पर उद्घोषित की जा सकती है। यदि कोई उसे अबला माने तो वह अपनी ससुराल के अत्याचारों में पिसकर मर सकती है और अगर वह खुद को सबला माने वह एक महत्त्वपूर्ण गरिमामय उच्च स्थान एवं संस्कारिक गरिमा का नाम है भारतीय परंपरा में नारी सभ्यता और संस्कृति की रखवाली करने का एकमात्र माध्यम है। वह अपने आदर्शों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सभाल कर रखती है। इस तरह नारी, सभ्यता और घर गृहस्थी अकसर एक साथ एक ही परिभाषा में समा जाते हैं। मैं आगे महिला सशक्तिकरण के मुद्दों पर संवेदनशीलता और सरोकार के ऊपर महिला परिवेष में प्रवेश करूंगी। हजारों वर्ष की परंपराओं से पुष्ट भारतवर्ष किसी समय विश्व गुरु कहलाता था। जिस समय आज के उन्नत एवं सभ्य कहे जाने वाले राष्ट्र अस्तित्वहीन थे या बर्बर अवस्था में थे उस समय भारत भूमि या वैदिक ऋचाएं लिखी जा रही वैदिक मंत्रों का गान गूज रहा था। यज्ञों की पवित्र ज्वालाओं का धुआ पूरे वातावरण को आनदमय बना रहा था। भारत हजारों वर्षों की पराधीनता सह गया पर अपनी संस्कृति । को नहीं भूला। शायद कविवर इकबाल को तभी लिखना पड़ा था यूनान मिस्र रोम सब मिट गए यहा से अब तक मगर है बाकी नामो निशा हमारा। रामायण महाभारत, वेद, पुराण आज भी हमारे पूज्य ग्रंथ हैं। आज भी गंगा नर्मदा कावेरी हमारे लिए पवित्र है। आज भी वैदिक काल की नारी मैत्रेया, गार्गी शिक्षा दीक्षा से संपन्न ऋषि मुनियों की गणना में लाई जाती हैं क्योंकि वैदिक काल में ही हमारे ऋषि मुनियों ने इस बात को पक्की मान्यता दी थी कि जिस प्रकार तार के बिना वीणा और घूरी के बिना रथ का पहिया बेकार होता है उसी प्रकार नारी के बिना सामाजिक जीवन। इस तथ्य के अनुरूप ही वैदिक काल में मनु महाराज ने यह घोषणा करके कि जहां नारियों की पूजा होती है, वहा देवता निवास करते हैं. नारी जाति की महत्ता प्रतिपादित की थी। वैदिक काल में प्रत्येक अनुष्ठान में नारी की उपसिति आवश्यक थी कन्याओं को पुत्रों के ही जैसे अधिकार प्राप्त थे। उनकी शिक्षा दीक्षा का समुचित प्रबंध था और मैत्रेया गार्गी जैसी विदुषी नारियों की गणना ऋषियों के साथ होती थी। यद्यपि नारियों के लिए कोई भी क्षेत्र वर्जित नहीं था पर उसका सेवाभाव उसकी प्रवृत्ति का एक अंग था। वह घर का काम काज करना अपना कर्तव्य समझती थी धर्म समझती थी पर दुर्भाग्य से धीरे धीरे नारी की परिस्थिति में आया। नारी के सम्मान को विशेष पक्का लगा। उससे शिक्षा एवं समानता के अधिकार छीने गए। यह पुरुष के भोग विलास का एक अंग बन गई। उसे परदे में रखा जाने लगा। वह घर के माहौल में रहने वाली जीवात्मा बनाई गई। सदियों से समय की तेज धार पर चलती हुई नारी अनेक बिडबनाओ और विसंगतियों के बीच यह प्रमाण देती रही कि वह कोई वस्तु नहीं बल्कि एक शक्ति है पचिनी दुर्गावती अहल्यासबा सरीखी नारियों ने अपने बलिदान और योग्यता से भारतीय नारी जाती का गौरव बढ़ाया। नारी की क्षमताओं को पुरुष प्रधान समाज रोक नहीं पाया। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भारत की जोन आफ आर्क झांसी की रानी को कोई भुला सकता है? उसने अपनी सीमित शक्ति से अंग्रेजों से टक्कर ली थी। अंग्रेजी शासन के दौरान की भारत में अनेक समाज सुधारक आंदोलन प्रारंभ हुए राजा राममोहन राय और स्वामी दयानंद ने नारी जागरण की और विशेष ध्यान दिया। भारत का स्वतंत्रता संग्राम जैसे नारी जाति की मुक्ति का संदेश लेकर आया। कई समाज सुधारकों आदोलनकारियों तथा संगठनों द्वारा उठाई आवाज द्वारा कि आजकल की नारी सीता और सावित्री बनकर नहीं जी सकती। उनका वर्णन मानव मूल्यों को समझाने के हेतु हुआ था। इस युग में न श्री राम सरीखे शासक है न बाल्मिकी सरीखे गुरु हैं। समय वह आया भारतीय इतिहास की सारी उथल के बावजूद भारतीय नारी के गुण उसके चरित्र से जुड़े रहे। यह विश्व की रही। इन गुणों में प्रमुख है नम्रता लज्जा और मर्यादा। कुछ लोग इन गुणों को नारी जाति की दासता के चिन्ह मानते हैं किंतु वस्तुस्थिति यह है कि इन्हीं विशेषताओं के कारण नारी पुरुष से परिवर्तन होने लगा। मुसलमान राजाओं का दौर ऊंचा स्थान पाती है।

असर क्या होगा बच्चों पर मा बाप के अतवार विशेषकर यूरोप की नारियों से पूरी तरह अलग की।

मां नारी का एक महत्वपूर्ण स्थान है। वह है मां के रूप में, वह एक शक्ति है जो नौ महीने बच्चे को कोख में रखकर तरह तरह के कष्ट उठाकर अपने दूसरे दायित्वों को संभालते हुए बच्चे की समाल करती है। वह इन महीनों में जिन मुश्किलों से गुजरती है पुरुष स्वप्न में भी उनको देखकर सहम सकता है पर कोमल है कमजोर नहीं है, शक्ति का नाम ही नारी है। उसके दृढ संकल्प के आगे मौत भी उससे हारी है। परंतु दुर्भाग्य यह है कि पश्चिमीय नारी का अनुकरण करके भारतीय नारी भी बहुत कुछ खोने लगी है। वह परिवार के प्रति अपना कर्तव्य भूलने लगी है। परिवार टूट रहा है जीवन का सुख समाप्त होता जा रहा है। सतान के लिए ममता नारी का वह गुण है जो उसे संतान के प्रति हिंसक नहीं हो सकती पर नारी जागरण के नाम पर नारी अपनी सतान के प्रति अपने उत्तरदायित्व से भी मुक्त होते दिखने लगी है लेकिन पुरुष किसी भी हालत में नारी को दासी के मानद नहीं मान सकता बच्चों के हेतु जो आने वाले भारत का भविष्य है मा और बाप दोनों को अगली पीढ़ी को सवारने का दायित्व कधों पर है। दोनों को एक दूसरे का सम्मान करते हुए परिवार और समाज में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। भारतीय नारी को परंपरा के अनुसार केवल संघर्ष नहीं त्याग शांति और ममता का प्रतीक बनकर आगे अग्रसर होना है और इस बात का खंडन करना है

दूध तो डिब्बे का है तालीम है सरकार की ।

(क्रमश)

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साभार:- राजदुलारी कौल, पठानकोट एंव, कॉशुर समाचार, जून 2018