कश्मीरी कवि रत्न जगद्वर भट्ट

- कश्मीरी कवि रत्न जगद्वर भट्ट




कश्मीरी कवि रत्न जगद्वर भट्ट 

मैं अपने पापों से ही पतित हू तथापि ऐसा होने पर भी मैं आपकी अवज्ञा का पात्र नहीं आपको मेरा उद्धार करना ही। चाहिए। आप तो सर्वसामर्थ महादेव है। साधारण दयाशील जन भी पतित की उपेक्षा नहीं करते। यदि कोई विवेकहीन पशु स्वयंमेव किसी अंधकूप में गिर जाता है तो कारुणिक मनुष्य उसे भी कूप से निकाल देता है। अतः अपने ही कुकमों से प्रतित मुझ नरपशु पर भी दया करना आपका कर्तव्य है। आप ऐसा नहीं करेंगे तो आप पर पक्षपात का दोष लगेगा। आप अन्यायी ठहराए जाएंगे क्योंकि आपने मेरे जैसे कई जनों का परित्राण किया है। आपने अपने गले में जिस साप को लिपटा रखा है उसके करतूत पर आपने कभी विचार किया है? जैसा वह है वैसा में भी हूँ।

(निष्कर्ण एवं कुसृतिव्यसनी दिब्जिहवो मत्वेति चेत्तयजसि निःशरण प्रभोमाम एतादृशोअपि पवनाशन एष करमा च्छ्रोकण्ठ! कण्ठ पुनिले भवतागृहीत।।)

मैं निष्कर्ण हूँ-किसी की बात नहीं सुनता मैं मृतव्यसनी अर्थात् मार्गगानी हू में दिविजय हूँ क्या मेरे इन्हीं दुर्गुणों के कारण आप मेरा परित्याग करने चले हैं? क्या आपने इस सर्पराज वासुकि के गुणों या दुर्गुणों का कभी विचार किया है? यह भी तो ठीक मेरा जैसा है (कर्ण हीन कुसृति व्यसनी पृथ्वी पर पेट के बल चलने वाला है यह भी तो मेरा जैसा, मुख में दो जिह्वाएं • रखने वाला है, उस पर इतनी कृपा मेरी इतनी उपेक्षा ।

क्षेत्र के धर्मयुद्ध में वासुदेव भगवान कृष्ण ने गाडीवधारी अर्जुन को कहा कि तुम युद्ध की तैयारी से पहले इद्र से दिव्य अस्त्र लेने के लिए तपस्या कर लो यह तुम्हारी सबसे बड़ी आवश्यकता है। अर्जुन ने कठोर तप करके इद्र को प्रसन्न किया और अपनी तपस्या का हेतु बनाया। इंद्रदेव ने कहा मेरे दिव्य अस्त्रो पर तुम्हारा पूर्ण अधिकार है पर उससे पहले आपको शिवजी का पशुपत अस्त्र का होना अति आवश्यक है। उसके पश्चात ही मेरे दिव्य अस्त्र मिलेंगे। अर्जुन ने पुरारी की तपस्या आरंभ की और पाशुपत अस्त्र प्राप्त किया।

पुरारी की भक्तवत्सलता एवं महानता को दृष्टि में रखकर जगद्धर ने पुरारी को अपनी दीनता से अनुनय विनय करते हुए लिखा...

। (जिहवासहस्त्रयुगलेन पुरा स्तुतस्त्व, मेतेनतेन यदि तिष्टति कण्ठपीठे एकैवमे तव नुतौ रसनास्ति तेन स्थान महेश भवदधितले ममास्तु हा एक बात जरूर है किसी जमाने में इस शेषनाग ने अपनी दोहज़ार जिह्याओं से आपकी स्तुति की थी एतएव आप उसकी इस सेवा के ही कारण उस पर इतने प्रसन्न हुए हो और उसे कण्ठ में स्थान दिया हो। यदि बात यही है तो मुझे आपने दो हजार जिह्वाएं क्यों न दी? मेरे मुख में केवल एक जिहवा है उस एक ही से मैं आबात्यकाल आपकी स्तुति कर रहा हू सो दयासागर दो हजार जिह्वाओं से करने पर यदि आप किसी को अपने कण्ठ में हृदय पर बिठा कर रखता हूँ फिर भी मैं आपकी करने वाले मुझ नाचीज को अपने पैर के तलवे के कृपा का पात्र क्यों नहीं?

स्थान दे सकते हो तो एक ही जिह्वा से स्तुति नीचे ही पड़ा रहने दीजिए। ऐसी दशा में रह कर भी मैं अपने आपको कृतार्थ समझेगा। चलिए इस सर्पराज को जाने दीजिए। अपने वाहन बैल को ही लीजिए, उसके गुणों पर ही विचार कीजिए। वह भी तो मेरे सदृश है जो बातें मुझमें हैं वही उसमें भी। वह भी मेरा समान धर्मा है (श्रगी विवेकरहित पशुरून्मदोय मत्वेतिचेत परिहरस्यतिकातरमाम एवं विधोपि वृषभश्चरणार्थनेन नीतस्त्वया कथमनुग्रहभजनतवम।।) मैं श्रृंगी अर्थात् बडा घमंडी हूँ, मैं निर्विवेक हू मैं पशुप्राय या नरपशु हूँ, मैं उन्मत हूँ तो क्या इसी से आप मुझ महा कातर चाहिए. का परिहार करने चले हैं? यह भी तो श्रगी है-उसके भी तो सींग हैं, वह भी तो विवेक विरहित है, वह भी तो पशु है, वह भी तो उन्मत है तो हे शिव उसके क्या सुरखाब का पर लगा है जो आपने अपने चरण स्पर्श से उसे अनुग्रह का पात्र बनाया है? हम दोनों ही बराबर हैं पर बैल का तो इतना पक्षपात और मेरी इतनी अवज्ञा ? यह अन्याय है या नहीं?

(पृष्ठे भव्तमयमुद्धवते कदाचि देतावता यदि तवैति दयास्पदत्वम् । स्वामिन्न तु हृदयेअवहमद्धहमि त्वामित्यत कथमहो न त्वानकमय।।)

हा इसमें संदेह नहीं कि आपका वाहन वह बैल कभी कभी आपकी सवारी के काम आता है, संभव है आप तभी उस पर दयालू हो पर यह बैल आपको सदा ही अपनी पीठ पर सवार कराए रहता तो नहीं, जब कभी जरूरत पड़ती है तभी वह अपनी पीठ पर बिठा लेता है। अब आप मेरी सेवा का भी सवाल कीजिए। मैंने तो आपको पीठ पर नहीं हृदय पर बिठा रखा है। सो भी कभी कभी नहीं, दिन-रात, चौबीसों घंटे, फिर भी मेरा परित्याग आपका यह सरासर अन्या है, दिन रात में आपको महाराज अब और विलंब न कीजिए हम लोग जितने भी मनुष्य है सभी काल के पाश में फसने वाले हैं इस विषय में हम अति ही विवश है। जिस तरह मछियारा मछलियों को किसी दिन अचानक अपने जाल में फास लेता है उसी तरह मृत्यु भी हमें फास लेती है। उस समय किसी की भी शरण जाने से हमारा परित्राण नहीं। हम भिन्न प्रकार के बहाने भी बनाए यह हमें एकाएक आकर बिना आने साथ लिए नहीं जाती। अतः इसके आने से पहले मनुष्य को अपने परित्राण की चिंता करनी

(तावत्प्रसीद करून करूणामनन्द, माक्रन्दमि- मधुर मर्षयमाविहासी ब्रूहि त्वमेव भवन, करुणार्णवेन त्यक्तास्स्वया कमपर शरण जाम ।।) 

अतएव मौन आने से पहले ही आप मेरी भी यह प्रार्थना सुनने की दया कीजिए। मुझे बचा लीजिए आप ही कहिए. यदि आपके सदृशः करुणासागर ने भी मेरी रक्षा न की तो मैं फिर और किसकी शरण जाऊगा? क्या आपसे बढ़कर भी कोई और है जो मुझ सदृश पापी को पार लगा सके? आप शायद कहें कि तू मौत से क्यों इतना डरता है? मौत तो सभी को आती है। डरने से वह दूर नहीं हो सकती इसके जवाब में मेरा यह निवेदन है कि जो पैदा होता है वह मरता तो जरूर है। मैं इस बात को अच्छी तरह जानता हूँ मगर सरकार कुछ लोग आपकी कृपा से इससे भी बच गए हैं। राजा श्वेतकेतु आपके गण क्षेष्ट नदी को ही मैं उदाहरण के तौर पर पेश करता हूँ। आपकी कृपा से इन लोगों की मृत्यु भी टल गई है। हा यह ठीक है कि बहुत बड़ी तपस्या के प्रभाव से इन्होंने मृत्यु को जीता है। मुझ में इतना तपोबल नहीं कहा उनका घोर तप और कहा मैं तुच्छ नादान भक्त, चलिए मेरी मौन न टले, मेरे लिए कुछ तो रियायत कीजिए।

तार्चनन्ति समये तव पादपीठ मालिंगय निर्भरमभंगुर भक्तिभाजः ।

निद्रानिभेन विनिमीलितलेचनस्य प्राणाप्रयातु मननाथ तवप्रसादात | 

मैं आपकी रोज पूजा करता हूँ। पूजा की समाप्त पर आपके सिंहासन के नीचे स्थित आपके पैर रखने की चौकी पर अपना सिर रखकर मैं बड़े ही भक्तिभाव से उसका आलिंगन करता हूँ। बस आप इतना कर दीजिए कि उसी दशा में मुझे नींद आ जाए और उसी नींद के बहाने मेरे प्राणों का उत्क्रमण हो जाए।

(अज्ञस्तावदह न मदधिषन कतु मनोहारिणी श्राक्ति प्रभवामि यामि भवतो यामि कृपा पात्रताम । आस्तेणायशरणेन किन्तुकृपणेनाक्रदित कर्णयो कृत्वा सरवरमेहि देहि चरण मूर्धन्यधन्यस्य मे।।)

यदि मैं मीठी मीठी बातें बना सकता यदि मैं आपकी मनोहारिणी स्तुति करने की योग्यता रखता यदि मुझे खुशामद करना आता तो संभव है आप प्रसन्न होकर कृपा करते। पर मैं करू तो क्या करूं? मुझमें ऐसी शक्ति ही नहीं, मैं तो ठहरा मंदबुद्धि, महामूर्ख। अतएव आप मुझसे वैसी हृदयहारिणी उक्तियों की आशा न कीजिए आप केवल मेरी दीनता को ही देखिए मैं आर्त निःशरण हूँ, दुखी हूँ, आपकी दया का भिखारी हूँ । मेरा यह विलात्मक रोना-धोना सुनकर दौडिए देर न कीजिए। मुझ पापी के मस्तक को अपने चरणों का स्पर्श करा जाइए। भगवान शिव से मैं भी अपनी जन्मभूमि कश्यप वाटिका कश्मीर के शिव भक्त कवि रत्न जगद्धर भट्ट की ही भांति अनुग्रह की भिक्षा मांगते हुए आप पाठक भाई बहनों से विदा ले रही हूं और इस लेख की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।

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साभार:-  राजदुलारी कौल, पठानकोट एंव कॉशुर समाचार मई 2018