ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अष्टमी पर विशेष कश्मीर का प्रसिद्ध तीर्थ तुलमुल (बीर भवानी)

- ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अष्टमी पर विशेष कश्मीर का प्रसिद्ध तीर्थ तुलमुल (बीर भवानी)




ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अष्टमी पर विशेष कश्मीर का प्रसिद्ध तीर्थ तुलमुल (बीर भवानी)

 

श्रीनगर (कश्मीर) के पूर्व में लगभग चौदह किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटा सा गांव बसा हुआ है तुलमुल । यहीं पर जगदबा माता क्षीर भवानी का वह सुरम्य मंदिर / तीर्थ है जो प्राचीनकाल से श्रद्धालुओं और भक्तजनों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। श्रीनगर सेतु लमुल तीर्थ स्थान तक जाने के लिए पहले के समय में प्रायः लोग तीन मार्गो का उपयोग करते रहे हैं। एक सड़क से दूसरा वितस्ता या झेलम नदी से तथा तीसरा पैदल रास्ते से आजकल हनुमान अधिकाशत लोग बस मोटरकार दुपहिया वाहनों आदि में बैठकर ही यह तीर्थ यात्रा करते हैं। 'तुल कश्मीरी में तूत को कहते हैं तथा मुल पेड या जड़ को इस प्रकार तुलमुल का अर्थ तूत का पेड़ हो जाता है। कहते हैं जिस चश्मे में इस समय जगदम्बा महाराज्ञी का वास समझा जाता है वहां पर आज से कई सौ वर्ष पूर्व तूत का एक बड़ा पेंड विद्यमान था तथा लोग चश्मे में उसी पेड़ को महाराज्ञी का प्रतिरूप मानकर पूजा करते थे। इसीलिए इस तीर्थस्थान को तुलमुल कहा जाता है।

क्षीर भवानी तीर्थ के संबंध में मिथकों से जो जानकारी प्राप्त होती है उसके अनुसार लकापति रावण को अपूर्व शक्ति प्राप्त करने का वरदार जगदम्बा से ही प्राप्त हुआथा किंतु जब रावण सीता का हरण कर रामचंद्र जी के साथ युद्ध करने पर आमादा हो गए तो महाराज्ञी जगदम्बा रुष्ट हुई। इन्होंने हनुमान को तत्काल यह आदेश दिया कि वे इनको 'कश्यपमर / कश्मीर ले जाए क्योंकि रावण के पिता पुलस्त्य उस समय कश्मीर में ही रहा करते थे।

ने आदेश का पालन किया तथा कश्मीर के पश्चिम के एक दूरवर्ती गाव मजगाव में देवी की स्थापना की परंतु यह स्थान देवी को भाया नहीं और बाद में हनुमान ने देवी की स्थापना तुलमुल गाव में की। यहां देवी का नाम क्षीर भवानी पड़ा क्योंकि इनका भोग केवल मिष्टान एवं क्षीर से ही होने लगा।

कल्हणकृत राजतरगिनी के अनुसार कश्मीर का प्रत्येक राजा इस तीर्थ स्थान पर जाकर जगदम्बा महाराज्ञी के प्रति अपनी श्रद्धा के फूल अर्पित करता था। किवदती यह भी है कि भगवान राम बनवास के दौरान कई वर्षों तक माता जगदम्बा देवी की पूजा करते रहे और बनवास के बाद हनुमान से कहा कि वह माता के लिए उनका मनपसंद स्थान तलाश करे इस प्रकार माता ने कश्मीर का चयन किया और हनुमान में की। ने उनकी स्थापना तोलामाला अथवा तुलमुल में की। 

देवी का वर्तमान जलकुड 60 फुट लंबा है। इसकी आकृति शारदा लिपि में लिखित ओंकार जैसी है। जलकुड़ के जल का रंग बदलता रहता है जो इसकी रहस्यमयता / दिव्यता का प्रतीक है। इसमें प्राय गुलाबी दूधिया हरा आदि रंग दिखाई देते हैं जो सुख शांति तथा देश कल्याण के सूचक माने जाते हैं।

काला रंग अपशकुन माना जाता है। मंदिर के पुजारियों का विश्वास है कि चश्मे का पानी अगर साफ हो तो सबके लिए अच्छा शगुन है और वह साल भी अच्छा बीतता है। किंतु अगर पानी गंदला या मटमैला हो तो कश्मीरवासियों के लिए मुश्किलें, यात्रा कष्ट और परेशानी का दुर्योग बनता है। कहा जात है 1990 में चश्मे का पानी काला हो गया था, मानो उसमें धुआ मिलाया गया हो तब कुछ ही महीनों के बाद पंडितों को घाटी छोड़कर जाना पड़ा था। जलकुंड के बीच में जगदम्बा महाराज्ञी का एक छोटा सा किंतु भव्य मंदिर विद्यमान है। आज से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व यहा कोई मंदिर नहीं था। वर्तमान मंदिर का निर्माण डोगरा शासकों के सत्प्रयास से हुआ है। यह मंदिर भारतीय वास्तुकला के आधार पर बनाया गया है। मंदिर का प्रवेश द्वारा पूर्व की ओर है। कुंड के सामने लगे जंगले के बाहर लोग देवी के दर्शन करते हैं।

इस तीर्थ के दर्शन करने युगों युगों से कई योगी तथा महापुरुष कश्मीर आए हैं। कहते हैं कि रावण को जब इस बात का पता चला कि महाराज्ञी उसके दुर्व्यवहार से रुष्ट हो गई हैं तो वे क्षमायाचना के लिए यहां आए किंतु तब तक महाराज्ञी जलकुड में समा गई थी। राजतरगिनी के कई तरंगों में हमें भारत से आए कई योगी जनों का उल्लेख मिलता है जिन्होंने इस तीर्थ पर आकर महाराशी के प्रति अपनी श्रद्धा के फूल अर्पित किए। कल्हण ने इस तीर्थ को कश्मीर की काशी कहा है। सन 1868 ई. में जब स्वामी विवेकानंद कश्मीर आए तो इन्होंने अपनी यात्रा के अधिकाश दिन महाराज्ञी के चरणों में व्यतीत किए। यहां पर वे भाव समाधि में लीन हो जाते थे। अपनी कई रचनाओं में इन्होंने इस सुरम्य तीर्थ की मूरि भूरि प्रशंसा की है। इनकी विदेशी शिष्या भगिनी निवेदिता ने भी अपनी पुस्तकों में इसका उल्लेख किया है। यों तो प्राय प्रतिदिन महाराज्ञी के दर्शनार्थ देश के कोने कोने से यात्रियों का ताता बधा रहता है किंतु प्रति वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को यहां भक्तजन काफी मात्रा में आते हैं। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अष्टमी को जो क्षीर भवानी के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है, यहां विषेष मेला भरता है। जलकुड में अर्पित दूध तथा पुष्प आदि की सुगंध से मन में अपूर्व शांति का संचार होता है। देवी जगदम्बा के भजन कीर्तन रात भर चलते हैं। इस मंदिर के बाहर सदियों से भाईचारे का माहौल देखने को मिलता है। मंदिर में चढने वाली पूजा अर्चना दूध मिश्री आदि सामग्री इलाके के स्थानीय मुस्लिम बिरादरी के लोग बेचते हैं जो भाईचारे का एक बहुत बड़ा उदाहरण है। सामग्री बेचने वाले शौकत का कहना है कि उनके वालिद साहब भी श्रद्धालुओं के लिए पूजा का सामान बेचने का काम करते थे। उनका कहना है कि हमारे बीच हिंदू-मुस्लिम वाली कोई बात थी नहीं। मगर क्या करें? वक्त खराब आया कि हमारे कश्मीरी पंडित भाईयों को यहा से जाना पड़ा। उम्मीद है कि जल्द ही कश्मीर में फिर से कश्मीरी पंडित हम लोगों के साथ अपने पुराने घरों में आ जाएंगे। यो माना यह भी जाता है कि बाबा अमरनाथ के शिवलिंग का पता भी सबसे पहले एक स्थानीय मुस्लिम गडरिए से ही चला था।

अस्वीकरण :

उपरोक्त लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं और kashmiribhatta.in  उपरोक्त लेख में व्यक्त विचारों के लिए किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है। लेख इसके संबंधित स्वामी या स्वामियों का है और यह साइट इस पर किसी अधिकार का दावा नहीं करती है।कॉपीराइट अधिनियम 1976 की धारा 107 के तहत कॉपीराइट अस्वीकरणए आलोचनाए टिप्पणीए समाचार रिपोर्टिंग, शिक्षण, छात्रवृत्ति, शिक्षा और अनुसंधान जैसे उद्देश्यों के लिए "उचित उपयोग" किया जा सकता है। उचित उपयोग कॉपीराइट क़ानून द्वारा अनुमत उपयोग है जो अन्यथा उल्लंघनकारी हो सकता है।

साभार:-  शिवन कृष्ण रैणा  एंव कॉशुर समाचार मई 2018