दुर्भावना का फल

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दुर्भावना का फल

 

गगा नदी गौमुख से निकलकर उत्तरांचल में कुछ दूर तक जाल्बी के नाम से भी जानी जाती है। उसी जाहयी नदी के किनारे एक महर्षिका गुरुकुल था, जहा धर्मऔर अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा दी जाती यी। वहां अनेक शिध्य आते। गुरुकुल में कड़ा अनुशासन था। गुरु की आज्ञा का पालन करना और आपस में मित्रता का व्यवहार करना वहां का पहला नियम था। गुरुकुल में अपने बच्चों को भेजने के बाद माता-पिता निश्चिंत हो जाते थे। उन्हें गुरु पर विश्वास था किवे बच्चों को अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कार देंगे। उसी गुरुकुल में विभूतिदक्षेस, सुवास और नवीन भी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। विभूतिऔर दक्षेस बहुत बुद्धिमान थे। हर विद्या सबसे पहले सीख लेते। बस एक ही कमी थी किदोनों बहुत ईर्ष्यालु थे। किसी और की प्रशंसा न कर सकते थे, न सुन सकते थे। इसके विपरीत सुवास और नवीन साधारण बुद्धिके थे. पर सबसे मित्रता का व्यवहार करते। सबके गुणों का सम्मान करते। सुवास और नवीन ने अपने साथियों को समझाने का बहुत प्रयास किया, पर सब व्यर्थ। महर्षिको भी बहुत चिंता थी किउन्हें कैसे सुभ तारा जाए? वे दोनों बालकों में अहंकार और ईर्ष्याकी भावना को खत्म करना चाहते थे, पर उचित अवसर नहीं मिल रहा था। जाडवी नदी के दूसरे किनारे पर एक बस्ती थी। वहां एक जमींदार थे, जिनकी शिक्षा-दीक्षा इसी गुरुकुल में हुई थी। उन्हीं दिनों वे गंगोत्री, यमुनोत्री, कंदारनाथ और बद्रीनाथ, जिन्हें उत्तरांचल के चार गाम कहा जाता है, की यात्रा करके लौटे। उन्होंने एक भोज का आयोजन किया। जमींदार ने सबसे पहले गुरुकुल में संदेश भेजा. महर्षिवर, संदेशवाहक के साथ कृपया अपने दो योग्य शिष्य भेज देवें। उन्हें | मोजन कराने के बाद ही मोज आरंभ होगा। साथ ही 80 में उनकी योग्यता के लिए उन्हें सम्मानित भी क चाहता हूं।" गुरु ने कुछ सोचकर विभूतिऔर दक्षेस बुलाया और कहा, "नदी के उस पार रहने हा जमींदार ने आश्रम के दो योग्य शिष्यों को दावा है लिए बुलाया है। दावत के पश्चात वे उनकी योगात के लिए उन्हें सम्मानित करना चाहते हैं। गुरुकुन र तुम्हारी विद्या बुद्धिको देखते हुए मैंने तुम दोनों कर चुना है। आज ही यहा जाना है-क्या तुम जाओगे? "अवश्य" दोनों ने एक साथ कहा। दोनों शिष्य संदेशवाहक के साथ जमींदार के यहा पहुंचे। भोजन की सुगंध वातावरण में फैली में। जमींदार ने उनका स्वागत करते हुए कहा, भोजर तैयार है, आप दोनों दूर से आए है। पास ही कुआ है वहां जाकर हाथ-पैर धो लें, फिर आसन ग्रहण करें। इसलिए कुएं का चबूतरा छोटा है एक समय में एड ही व्यक्तिखड़ा हो पाएगा, अतः आप में से पहले एक जाए फिर दूसरा।" विभूतिझटपट उठा और कुए की ओर चल्ल गया। दक्षेस वहीं बैठा रहा। जमींदार ने दक्षेस में पूछा, "जो कुएं की ओर गए है सुना है वे गुरुकुल के शिष्यों में सबसे श्रेष्ठ हैं और बहुत बड़े विद्वान है। "विद्वान' किसने कहा आपसे किवह विद्वान हैं? अरे वह तो खच्चर है. पूरा खच्चर दक्षेस कोच स बोला। यह सुनकर जमीदार ने कुछ नहीं कहा। बोडी देर बाद दोनों शिष्यों को भोजन के लिए बुलवाया गया। जब वे खाने के लिए बैठ तो उनके सामने जानवरों का भोजन भूसा, हरी घास और चने का दाना परोसा गया। उसे देखते ही दोनों क्रोध से उबल पड़े। "आपने हमें क्या जात्तवर समझ रखा है जो खाने के लिए घास-मूसा दिया है. चिल्लातेहुर दोनों शिष्य क्रोध से पैर पटकते तेजी से वहां से बाहर निकल पडे। वे लगभग दोडते हुए गुरुकुल पहुंचे और सारी घटना महर्षिको बताई। अभी बात पूरी भी नहीं हुई थी किपीछे से जमींदार का संदेशवाहक हांफता हुआ पहुंचा। उसने महर्षिसे हमा मांगते हुए कहा, "गुरुवर क्षमा करें, कहीं कुछ समझने में भूल हो गई। जमीदार स्वयं आते, पर हवातरी मेहमानों से भरी है इसलिए नहीं आ पाए। आप शिष्यों को पुनः भेज दें। मैं उन्हें लेने आया हूं बिना शिष्यों को भोजन कराए अन्य मेहमानों को भोजन नहीं परोसा जाएगा।" महर्षिने इस बार दूसरे दो शिष्यों सुवास और नवीन को संदेशवाहक के साथ भेजा। वे दोनों जमींदार के यहां पहुंचे तो जमीदार ने उनसे भी बारी-बारी कुएं पर जाकर हाथ-पैर धोने के लिए कहा। पहले नवीन कुएं की ओर गया। सुवास को अकेला देखकर जमींदार ने वही बात फिर कही, सुना है किवे जो कुएं की ओर गए हैं. गुरुकुल में सबसे श्रेष्ठ और बहुत विद्वान हैं।" सुवास ने कहा, "आपने ठीक सुना है। गुरुकुल में रहकर गुरुवर से हमें रोज अच्छी बातें सीखने को मिलती है। जमीदार ने फिर पूछा, 'आपने यह नहीं बताया किआप दोनों में श्रेष्ठ कौन है?" "श्रेष्ठ तो नवीन है." सुवास ने बेहिचक कहा। "और आप?" जमींदार ने पुनः पूछा। मैं तो उसके सामने कुछ भी नहीं हूं" सुवास ने उत्तर दिया। तमी नवीन लौटा और सुवास कुएं की ओर गया। जमींदार ने वही प्रश्न नवीन से किया। नवीन ने उत्तर दिया, सुवास तो सूर्यहै. मैं तो उसकी विद्वक्ता के सामने एक दीपक भर हूं।" जमींदार उनके उत्तर से संतुष्ट हुए और दोनों का कोचित सत्कार किया। दक्षिणा में उन्हें पांच-पांच गायें पुरस्कार स्वरूप चांदी की खड़ाऊ भेंट की। वे दोनों जब गुरुकुल लौटे तो बहुत प्रसन्न थे। यह देखकर विभूतिऔर दक्षेस का क्रोध और बढ़गया। वे महर्षिके पास पहुंचे और कहा, "हम दोनों आपके इन शिष्यों से अधिक बुद्धिमान है फिर भी हम अपमानित हुए। आप सब जानकर भी चुप है और नवीन एवं सुवास की प्रशंसा कर रहे हैं गुरु महर्षिने उत्तर दिया, 'यह तो जमींदार ही बता सकते हैं।" "तो आप चलकर उनसे पूछते क्यों नहीं? दक्षेस ने हठ किया। महर्षिअनमने से चारों शिष्यों को साथ लेकर चल पड़े। जमींदार ने दौड़कर गुरु की अगवानी की और चारों शिष्यों को आसन दिया। महर्षिने आने का कारण बताते हुए कहा, "वत्स, आपने शिष्यों के साथ भेदभाव क्यों किया? दक्षेस और विभूतिका कहना है किउनका अपमान हुआ है। आपको इसका उचित कारण बताना ही होगा अन्यथा!" जमींदार ने गंभीर स्वर में कहा, 'महर्षि, मैंने आपसे दो सुयोग्य विद्वान भेजने का आग्रह किया था। पर आपने मेरे यहा बैल और खच्चर भेज दिए। जब मैंने आपके पहले भेजे हुए शिष्यों से प्रश्न पूछा तो इन्होंने एक-दूसरे का यही परिचय दिया। अतः मैंने दोनों के लिए जानवरों वाले प्रिय भोजन परोसे। मुझसे कोई भूल हो गई हो तो में क्षमा..." जमींदार की की बात खत्म होने से पहले विभूतिऔर दक्षेस का सिर शर्मसे झुक गया। उन्हें अपनी मूल महसूस हुई, उन्होंने जमींदार से क्षमा मागी। तब गुरु महर्षिने कहा, "अहंकार और ईष्यों के कारण तुम दोनों में प्रेम नहीं है. पारस्परिक सदभाव नहीं है। इसी कारण तुम दोनों योग्य होकर भी अयोग्य सिद्ध हुए और सभा में अपमानित हुए। वहीं सुवास और नवीन तुम दोनों की अपेक्षा कम योग्य है पर वे विनम्र शिष्ट और एक-दूसरे के प्रतिमित्रता का भाव रखते हैं। इसी कारण आज यहां सम्मानित हुए। सबकी भावना की कद्र करना, सबसे प्रेम करना और सबका सम्मान करना ही शिष्य को योग्य बनाता है। इसे सुनकर वहां उपस्थित लोगों ने गुरु की प्रशंसा की और गुरु को यह विश्वास हो गया किअब उनके चारों शिष्य एक समान योग्य होकर घर लौटेंगे।

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साभारः कुसुमलता सिंह  "कोशुर समाचार" - 2025, फ़रवरी