


कश्मीरी पंडित विधेयक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण, परंतु अधूरा कदम
राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा द्वारा प्रस्तुत कश्मीरी पंडित (आश्रय, प्रतिपूर्ति, पुनर्वास और पुनर्स्थापन) विधेयक 2022 निर्विवाद रूप से एक ऐतिहासिक प्रयास है, जो पिछले तीन दशकों से विस्थापन और पीड़ा झेल रहे कश्मीरी पंडित समुदाय को न्याय दिलाने की दिशा में लाया गया है। यह विधेयक उनके सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्वास का एक सुव्यवस्थित प्रारूप प्रस्तुत करता है। परंतु, जैसा कि लोकतंत्र की प्रकृति है, आलोचनाएँ भी समानांतर चलती हैं और इन्हें पूरी गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
सकारात्मक पहलू: एक मजबूत नींव इस विधेयक में कई प्रगतिशील और ठोस प्रावधान शामिल हैं : 21 सदस्यीय सलाहकार समिति, जिसमें प्रवासी और महिला प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। कश्मीरी पंडितों को 'आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्ति' और Genocide (जातीय संहार) के शिकार घोषित करने की मांग । न्यायिक आयोग और ट्रिब्यूनल की स्थापना । धार्मिक स्थलों की पुनर्स्थापना और कश्मीरी हिंदू श्राइन बोर्ड की स्थापना। • आर्थिक पुनर्वास के लिए उद्योगों, स्वरोजगार, नौकरियों और कर छूट की व्यवस्था । सामूहिक पुनर्वास क्षेत्र की परिकल्पना । सुरक्षा के लिए विशेष टास्क फोर्स, हथियार लाइसेंस और 'जोखिमग्रस्त आबादी' का दर्जा ।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण: कुछ मूलभूत मुद्दों की अनदेखी हालाँकि विधेयक कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को संबोधित करता है, लेकिन विपक्ष का यह तर्क उचित है कि विधेयक दो सबसे केंद्रीय मुद्दों पर मौन है : 1. Genocide की आधिकारिक मान्यता का स्पष्ट अभाव : यद्यपि विधेयक में 'Genocide' शब्द प्रयुक्त हुआ है और जांच आयोग तथा ट्रिब्यूनल के गठन का उल्लेख है, परंतु इसे भारतीय संसद या सरकार द्वारा संवैधानिक रूप से 'Genocide' घोषित करने का सीधा और अनिवार्य प्रावधान नहीं है। यह एक कानूनी और नैतिक कमी मानी जा सकती है। कश्मीरी पंडितों की मांग रही है कि 1990 के पलायन और उससे पहले की घटनाओं को संयुक्त राष्ट्र Genocide कन्वेंशन 1948 के तहत मान्यता मिले। केवल आयोग बना देना पर्याप्त नहीं, जब उसकी रिपोर्ट को विधायी संप्रेषण और कार्यान्वयन का स्पष्ट मार्ग न दिया जाए। राजनीतिक सशक्तिकरण का सीमित दृष्टिकोण - पृथक 'होमलैंड' की उपेक्षा : कश्मीरी पंडित संगठनों विशेषकर पैनुन कश्मीर का वर्षों से यह स्पष्ट और मुख्य प्रस्ताव रहा है उत्तर और पूर्व कश्मीर में एक पृथक, पूर्ण-संवैधानिक अधिकार संपन्न, केंद्रशासित प्रदेश स्था किया जाए,जहाँ कश्मीरी पंडित सुरक्षित, संगठित और गरिमापूर्ण जीवन जी सकें। इस विधेयक में सामूहिक पुनर्वास क्षेत्र की बात तो है,परंतु राजनीतिक और प्रशासनिक स्वाय की कोई स्पष्ट कल्पना नहीं की गई है। यह उस लंबे संघर्ष और आकांक्षा की अनदेखी है, समुदाय के एक बड़े वर्ग की बुनियादी मांग रही है। कुछ आलोचकों का मानना है कि यह अधिनियम केवल एक 'सेटलमेंट पैकेज' बनकर रह जाता जबकि जरूरत है राजनीतिक पुनःस्थापन (political re-establishment) की निष्कर्ष: अधूरी परंतु आवश्यक पहल यह कहना गलत होगा कि विधेयक में कुछ नहीं है बल्कि इसमें बहुत कुछ है, लेकिन शायद नहीं जो सबसे मूल है। यह विधेयक एक नींव अवश्य है, लेकिन मंजिल नहीं। जिन लोगों ने पिछले वर्षों में एक तिनका भी नहीं हिलाया, उनका विरोध तो राजनीतिक है, किंतु सच्चे हितचिंतक भी पूछने में हिचक नहीं करते कि क्या यह विधेयक कश्मीरी पंडितों की आकांक्षा को पूरी तरह अभिव्य करता है? यह आवश्यक है कि संसद इस विधेयक पर गहन चर्चा करे, उसमें संशोधन सुझाए और विशेष से इन दो बिंदुओं को शामिल करे: • Genocide की संवैधानिक मान्यता पृथक होमलैंड (Union Territory) के प्रस्ताव की समीक्षा श्री दीनानाथ कौल 'नदीम' के शब्दों में गूंजता वह स्वप्न- "म्यों वतन, ह्योन वतन, सोन वतन नंदवोन वतन" - तभी पूर्ण होगा जब न्याय केवल राहत से नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और भविष्य क सुरक्षा के रूप में सामने आए । इसलिए, यह विधेयक आधारशिला बने, पर उस पर एक न्यायमूर्ति और आत्मनिर्भर भविष्य का भवन खड़ा किया जाए
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साभारः महाराजा शाह "कोशुर समाचार" - 2025, अगस्त