


बड़शाह की पुकार
दिल महुक जो उठती हैमन सेसगं ीत फुटतो कभी प्रि पार नहंछि प सके ऐसा हैयह बन इसका उपयोग नहं करता जो इसेगवं ा देता है। नहं रहा या ऐसा कोई नील हि तषे ी जि सक रणरण मदौड़ रहा हो यह खनू हाथ यार के वेकुनपी पं ी कि स क ओट लि ए कहंछि पेबठै ेह0 यह हवा हैजमीन यह सोतेवह आज भी पहले जसै ेउफन रहेनदि याँवह बह रहा पानी इनमयह देख रहा हूँवेह सीनेठंडेहुए बर्फ सेयादा जो अपनेभीतर क लय म(गरजा करत)े उबला करतेय कड़ाह ऐ मेरेहमवतन, नहंया जाग जाओगेअब भी गभं ीर नींद से? सर्वर्व व तरेा तो गया जान भी अब या यर्थ गँवा दोगेयह कौन यार क यानर हैजि नमखामोश रने बठै ेओ पजं ी बोलो तो या गम हैतमु को भीतर-ह-भीतर कार हो दखु सेबेखबर प ह अचेत पीड़ा सेभी काश होश मआए दूअपनी पीड़ा का खदु कोई उपचार करेमन ेदेखेहअधिं धियारेके हि सकार, योति मौन मशाल से शीशमहल के वर्पणर्प , आदि मफूटेअयाचार। कैसी आग लगाई तमु नेकबतू र के पखं जलाकर राख कि ए (फि र भी देखो) देख रहा हूँअब भी इनसेतो हैबाज भी करेजगह जगह बड़ा लाडला ललूहैजो बदं ा नहंसमझ सकता वह गति , आजाद क वह अगं हमारा केवल जलन आग क समझझेजो गि रता हैआग के अदंर।
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साभारः अब्दुल अहद आजाद ,डॉ रतनलाल शांत "कोशुर समाचार" - 2025, जुलाई