


जम्मू-कश्मीर और लाखः राज्य का दर्जा अभी क्यों नहीं
भारत के इतिहास में 5 अगस्त 2019 का दिन एक मील का पत्थर है, जब अनुच्छेद 370 और 35A हटाकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को पूरी तरह भारतीय संविधान और तिरंगे की छत्रछाया में लाया गया। यह केवल एक संवैधानिक सुधार नहीं था, बल्कि भारत की अखंडता, एकता और समानता की ऐतिहासिक पुनर्स्थापना थी। आज जब कुछ राजनैतिक दल राज्य का दर्जा तुरंत बहाल करने की माँग कर रहे हैं,तो हमें यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए कि क्या यह कदम इस समय भारत और वहाँ के नागरिकों के हित में है? राष्ट्रीय सुरक्षा ?सर्वोपरि जम्मू-कश्मीर भारत का मुकुट है और साथ ही सबसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र भी। यहाँ पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने तीन दशकों से अधिक समय तक आग लगाई। हजारों निर्दोष नागरिक, सुरक्षाकर्मी और कश्मीरी हिंदू इसके शिकार बने । आज जब आतंकी घटनाओं में ऐतिहासिक गिरावट आई है और सीमापार घुसपैठ पर नियंत्रण पाया गया है, ऐसे समय पर राज्य का दर्जा बहाल करना आतंकियों और अलगाववादियों के लिए नई ऑक्सीजन देने जैसा होगा। भारत की संप्रभुता और सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा नहीं हो सकता। विकास की गाड़ी तेज रफ्तार पर केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद विकास कार्यों की रफ्तार में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। नई सड़कें, बिजली, अस्पताल, विश्वविद्यालय, पर्यटन परियोजनाएँ और रोजगार के अवसर अब तक की सबसे तेज गति से बढ़ रहे हैं। निवेशकों का विश्वास लौटा है और विश्वभर से पर्यटक घाटी का रुख कर रहे हैं। यह माहौल तभी संभव हुआ जब प्रशासनिक निर्णय सीधे केंद्र के मार्गदर्शन में हुए। यदि राज्य की राजनीति फिर से हावी हुई, तो क्षेत्रीय दलों की खींचतान और भ्रष्टाचार विकास की रफ्तार को पटरी से उतार सकता है।अंतरराष्ट्रीय संदेश आज विश्व देख रहा है कि भारत ने एक कठिन समस्या को साहसिक निर्णय लेकर सुलझाया है। पाकिस्तान और उसके समर्थक संगठन लगातार झूठा प्रचार करते रहे कि कश्मीर भारत के नियंत्रण में नहीं है। लेकिन हाल के वर्षों ने सिद्ध किया कि यह क्षेत्र पूरी तरह शांति, विकास और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत है। समय से पहले राज्य का दर्जा बहाल करने की जल्दबाजी हमारे विरोधियों को यह कहने का अवसर दे सकती है कि भारत ने दबाव में आकर कदम उठाया है। यह हमारी राष्ट्रीय छवि और रणनीति दोनों के विपरीत होगा। जनमानस की प्राथमिकताएँ कश्मीरी समाज दशकों तक आतंक और अस्थिरता का शिकार रहा। विशेषकर युवा पीढ़ी अब राजनीतिक नारों और उग्रवाद की जगह शिक्षा, रोजगार और शांति चाहती है। यह पीढ़ी भारत की मुख्यधारा में पूरी तरह से सम्मिलित होने के लिए उत्सुक है। राज्य का दर्जा बहाल करने का मतलब है फिर से अस्थिर गठबंधन, जातीय और क्षेत्रीय राजनीति के बोझ को जनता पर थोपना । यह न तो उनकी आकांक्षा है और न ही भारत की प्राथमिकता । भविष्य का रास्ता राज्य का दर्जा भारत सरकार ने नकारा नहीं है। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री स्पष्ट कर चुके हैं कि यह कदम तब उठाया जाएगा जब हालात पूरी तरह परिपक्व होंगे। लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली एक सतत प्रक्रिया है, लेकिन सुरक्षा, विकास और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। निष्कर्ष आज आवश्यकता इस बात की है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को स्थायी शांति और आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत किया जाए। भारत का हित इसी में है कि जब तक क्षेत्र पूरी तरह आतंकवाद और अलगाववाद की छाया से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक राज्य का दर्जा बहाल न किया जाए। यह समय भारत के लिए "कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत' की वास्तविक भावना को सुरक्षित करने का है लेकिन राष्ट्रहित और सुरक्षा की बलिवेदी पर कोई समझौता करके नहीं, बल्कि उसी दृढ़ निश्चय और राष्ट्रवादी संकल्प के साथ जिसने 2019 में इतिहास रचा था।
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साभारः महाराज शाह कोशुर समाचार" – अक्टूबर, 2025