कश्मीरी पंडित और कुंभ का महात्म

- कश्मीरी पंडित और कुंभ का महात्म




कश्मीरी पंडित और कुंभ का महात्म

 

हमारा शरीर पांच तत्वों अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश से मिलकर बना है और मृत्यु के पश्चात इन्हीं पांचों तत्वों में विलीन हो जाता है। ये ही पंच तत्व हमारे शरीर में जीवन का संचार करते हैं और उसको गति प्रदान करते हैं। प्रकृति का यह नियम बिना किसी रुकावट के निरंतर चलता रहता है। प्रकृति के इस क्रम को बनाए रखने के लिए इन पांचों तत्वों में समन्वय बनाए रखना आवश्यक है और जिसकी पूर्ति के लिए कुंभ महापर्व आयोजित किया जाता है। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से ब्रह्मा प्रकट हुए, जिन्होंने इस सृष्टि की रचना की। कुछ अति बहुमूल्य वस्तुएं प्राप्त करने के उद्देश्य से समुद्र मंथन किया गया जिसमें सफेद एरावत हाथी निकला जिसको इंद्र ने ग्रहण किया, विष निकला जिसका पान करके भगवान शिव नीलकंठ बन गए, कामधेनु गाय और कल्पवृक्ष स्वर्ग चले गए पर जब अमृत कलश निकला तो अमृत पान कर अमरत्व प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों में छीना झपटी होने लगी। इस छीना झपटी में कलश से अमृत की कुछ बूंदें हरिद्वार, प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन में गिरीं जिसके कारण यह चारों नगर पवित्र माने जाने लगे और वहां कुंभ महापर्व का आयोजन प्रारंभ हुआ। कुछ ऐसी धारणा बनी कि यदि कुंभ महापर्व के अवसर पर प्रयाग में संगम में, हरिद्वार में गंगा नदी में, नासिक में गोदावरी में तथा उज्जैन में शिप्रा नदी में डुबकी लगाकर स्नान कर लिया जाए तो मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है और वह बिना किसी रुकावट के सीधा स्वर्ग में जाता है। अमृत पान को लेकर देवताओं और असुरों के मध्य हो रही खींचतान को सुलझाने के लिए भगवान विष्णु को मोहिनी के रूप में प्रकट होना पड़ा और उन्होंने दोनों पक्षों को अमृत पान के लिए संयम 82 बरतने को कहा और पूर अनुशासन के साथ पंक्ति में बैठने का सुझाव दिया। फिर अमृत पान तरफ से कराना शुरू किया जिधर देवतागण बैठे थे। राहु को लगा कि कहीं उसका नंबर आते- अमृत समाप्त न हो जाए और वह अमृत पान वंचित रह जाए। इसलिए वह देवताओं के बीच उन रूप धारण कर उनके बीच बैठ गया। जब उस अमृत पान कर लिया तो सूर्य औश्र चंद्रमा जो उस निकट बैठे हुए थे, विष्णु जी को संकेत द्वारा बता कि यह तो डुप्लिकेट है, जिस पर विष्णु जी ने में आकर अपने सुदर्शन चक्र से राहु के गले उसके धड़ से काट दिया, पर तब तक वह अमृत कर चुका था। अतः वह अमर हो गया। पर इस घट से राहु सूर्य और चंद्रमा का शत्रु हो गया और जब वह सूर्य और चंद्रमा को अपना निवाला बनाता है उनमें ग्रहण लगता है। कुंभ महापर्व वास्तव में प्रकृति के पंच महान की रक्षा करता है। यह एक प्रकार से प्रकृति सुखद मानव जीवन के मध्य शुभ-शुभ संभावन को खोजने की प्रक्रिया का नाम है जिसमें विनि संस्कृतियों के मध्य एक समरसता के साथ तार स्थापित करने का मार्ग ढूंढा जाता है ताकि जीव को समृद्ध और शांतिमय बनाया जा सके यह सर्व को दृष्टिगत रखते हुए सबको यथोचित सम्मान के साथ-साथ सदकर्मों को सबल बनाने के लिए में प्रेम और भक्ति की भावना को संचार करने का प्रबल माध्यम है। हमारे धर्मशास्त्रों में इस बात स्पष्ट उल्लेख है कि पवित्र गंगा जो राजा भगी की कठोर तपस्या के कारण भगवान शिव की जटा निकल कर इस धरती पर अवतरित हुई, को प्रदान करने वाली एक कल्याणकारी नदी माना है जिसके कारण संपूर्ण मानव समाज उसकेअपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उसके तटों पर पहुंचा ताकि उसकी पवित्रता निरंतर बनी रहे और उसे हर प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखा जा सके। कुंभ महापर्व का वास्तव में उद्देश्य मानव और प्रकृति के बीच सह अस्तित्व की भावना को जागृत करना है। व्यवहारिक रूप में भी मानज प्रकृति का ही एक अंग है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। परंतु जीवन की जटिलताएं और अनियंत्रित विकास अब जल, जंगल, जमीन और जीवों के लिए संकट उत्पन्न कर रहा है। उनकी रक्षा और संरक्षण के लिए कुंभ जैसे महापर्व का महत्व और अधिक बढ़ गया है। मानवीय लोभ के कारण प्रकृति का स्वरूप तीव्र गति के साथ बदलता जा रहा है। प्रकृति का शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण हमारे लोभ के ज्वलंत प्रमाण हैं। इसका समाधान किसी आधुनिक तकनीक या प्रौद्योगिकी से संभव नहीं अपितु आपसी सूझबूझ से संभच है जो कुंभ जैसे महापर्व के आयोजन में पनपती हैं और जिसके लिए किसी शासन की नहीं अपितु अनुशासन की आवश्यकता है। देवासुर संग्राम के पीछे असुरों द्वारा प्रकृति जन्य वस्तुओं पर अपना आधिपत्य जमाने की भावना अधिक थी। इस कारण इसे धर्म और अधर्म के बीच का संघर्ष भी कहा जा सकता है। कश्मीरी पंडितों का इस कुंभ के महापर्व से क्या नाता है इसको भलिभांति समझने के लिए हमें कश्मीर के इतिहास पर एक विहंगम दृष्टि डालनी होगी। कश्मीर एक सीमांत राज्य है जो अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण आदिकाल से विदेशी आक्रताओं के आक्रमणों और उनकी घुसपैठ को निरंतर झेलता रहा। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह रही कि अनेक विदेशी घुसपैठिये स्थानीय नागरिकों की उदारता और दयाभाव के कारण कालांतर में षडयंत्र रचकर कश्मीर के शासक बन गए। इन विदेशी घुसपैठियों की करतूतों और कारगुजारियों का सविस्तार वर्णन करना इस आलेख में संभव नहीं क्योंकि उससे विषयांतर हो जाने की संभावना अधिक है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि कश्मीर के लंबे इतिहास में कश्मीर पर अधिकतर गैर-कश्मीरी शासक राज्य करते रहे जिनका कभी भी कश्मीर से कोई सरोकार नहीं रहा।सम्राट अशोक 267-232 ईसा से पूर्व जो मगध के मौर्य वंश का था के शासन काल में कश्मीर में बौद्ध धर्म का बहुत बड़े पैमाने पर प्रचार और प्रसार हुआ तथा एक प्रकार से सारा कश्मीर बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया। उस काल खंड में कश्मीर में अनेक बौद्ध मठ और विहार निर्माण किए गए। अनेक विद्वान कश्मीरी पंडित बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अन्य देशों में गए और वहां के नागरिकों का बौद्ध धर्म से परिचय कराया जो उस समय की परिस्थितियों में काफी दुष्कर और कठिन कार्य था। पर जब महापराक्रमी सम्राट ललितादित्य 725 ई. में कश्मीर का शासक बना तो उसने पुनः बौद्ध धर्म में रमें हुए कश्मीरी पंडितों में सनातन धर्म की अलख जगाई और उनको सनातन धर्म के तीज त्योहार मनाने को प्रेरित किया। ललितादित्य स्वयं सूर्यवंशी क्षत्रिय था उसने सूर्य को समर्पित मार्तण्ड मंदिर का निर्माण कराया। वह शिव भक्त था इस नाते उसने कश्मीर में सनातन धर्म की पुनःप्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए उससे जुड़े अनेक आस्था के केंद्रों का कश्मीर में जीर्णोधार कराया ताकि सनातन धर्म को एक नई गति प्रदान की जा सके। ललितादित्य की विजयी सेनाएं तिब्बत को पार कर एक तूफान के समान चीन के बीजिंग नगर तक गईं। उसने दारदिस्तान को पार कर टर्की पर आक्रमण कर दिया और उसको अपने अधीन कर लिया। उसने इरान और अफगानिस्तान को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया। उसने पंजाब, सिंध, मेवाड़, मालवा तथा गुजरात को अपने अधीन कर लिया और कश्मीर के साम्राज्य की सीमा का विस्तार अरब सागर के तट पर स्थित द्वारिका नगर तक कर लिया। हर्षवर्धन ने 606 ई. में कन्नौज का एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया था। ललितादित्य ने 740 ई. में कन्नौज पर आक्रमण कर दिया और वहां के राजा यशोवर्मन को परास्त कर अपने साम्राज्य की सीमा का पूर्व में उड़ीसा तक बिस्तार कर लिया। वह अपने साथ कन्नौज के अनेक विद्धान कान्यकुब्ज ब्राह्मणों को कश्मीर ले गया जिनमें महान कवि भवभूति और शैवाचार्य अत्रिगुप्त भी थे जिनके वंशज वासुगुप्त को कश्मीर के शैवमत का मेरुदंड माना जाता है।ललितादित्य की इन विजयों के कारण हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन तथा नासिक जैसे पवित्र नगर जहां कुंभ महार्य का आयोजन होता था, उसके साम्राज्य के अंग बन गए। जिसके कारण ललितादित्य का कुंभ के महापर्व से साक्षात्कार हुआ और उसने इस प्रकार का मेला कश्मीर में आयोजित करने की एक वृहद कार्य योजना बनाई। अपने इस स्वप्न को मूर्ति रूप देने के लिए उसने दक्षिण कश्मीर में उस स्थान का चयन किया जहां झेलम नदी का सिंधु नदी में संगम होता है, वहां फूलपुर नाम से एक नगर बसाया जो अब शादीपुर के नाम से जाना जाता है और पाक अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद जिले में आता है। ललितादित्य ने इस प्रकार 8वीं शताब्दी में कश्मीर के शादीपुर नगर में कुंभ मेला आयोजित करने की परंपरा का सूत्रपात किया। यह कुंभ मेला भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से लेकर शारदा अष्टमी तक आयोजित किया जाता था और इसमें काफी बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित श्रद्धालु भाग लेते थे जिनके लिए यह किसी तीर्थराज से कम न था। इसमें भाग लेकर पुण्य प्राप्त करने का अपना एक अलग महत्व था। जब आदिशंकराचार्य (788-820) ने शादीपुर के निकट कृष्ण गंगा की घाटी में स्थित शारदा गांव में 9वीं शताब्दी में शारदा सर्वज्ञ पीठ नाम से भारत में प्रथम पीठ स्थापित की और देश में शंकराचार्य पद्धति की परंपरा का शुभारंभ किया तो शादीपुर में आयोजित होने वाले कुंभ मेले का महत्व कई गुणा बढ़ गया। इसका पुण्य प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आने लगे और इसने एक धार्मिक पर्व का रूप ले लिया। कश्मीर के हिंदू शासकों ने भी इस कुंभ मेले के आयोजन में अपना भरपूर सहयोग प्रदान किया। यह कुंभ मेला कश्मीर में बिना किसी व्यवधान के भारत के 1947 में स्वतंत्र होने तक चलता रहा पर 26 अक्तूबर, 1947 को पाकिस्तान के सैनिकों द्वारा कबायलियों के छद्म वेष में कश्मीर पर आक्रमण कर देने के पश्चात राजनीतिक परिस्थितियों में अमूलचूक परिवर्तन हो जाने के कारण इस कुंभ मेले के आयोजन को स्थगित करना पड़ा और अब यह एक बीते हुए कल की स्मृति बनकर रह गया है। 84 समय की पुकार है कि इस अति प्राचीन कुंभ मेले के पुनः आयोजन के लिए एक सार्थक पहल की जाए जिस प्रकार भारत सरकार सिखों के जत्थों को ननकाना साहब के दर्शन करने का प्रबंध करती है हाजियों की मक्का-मदीना की यात्रा की व्यवस्था करती है उस प्रकार कश्मीर पंडितों के दलों को भारत सरक द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में स्थित शारदा पीठ दर्शन करने की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि वे अपने सदियों पुराने आस्था के केंद्र से जुड़ सक जितनी जल्दी इसको एक साकार रूप दिया ज उतना ही अधिक भविष्य में यह इस क्षेत्र के लि लाभकारी सिद्ध होगा। कुंभ के महापर्व में सर्व जन हिताय सर्व सुखाय की मूल भावना निहित है इसलिए इसको ज मानस के उत्थान के लिए शुभ और कल्याणका माना जाता है। यह हमें प्रकृति का संतुलन बना रखने के लिए हमारा क्या दायित्व है उसका कराता है। यह समाज के हर वर्ग में समरसता स्थापि करने का पाठ पढ़ाता है। इसका आयोजन 12 वर्ष अंतराल पर किया जाता है। 6 वर्ष के अंतराल अर्ध कुंभ आयोजित होता है। यहां पर सुधी पाठक के लिए यह बताना और जिसके विचलन और विखंड के कारण देश सांस्कृतिक, भौतिक तथा नैतिक पा की कगार पर जा पहुंचा है अब जिसको उसी स्थ पर पुनः आसीन करने के लिए ज्ञान परंपरा को ि जीवित करने की आवश्यकता है। पंच भूतों की आवश्यक है क्योंकि उन्हीं की योगिक क्रिया ह प्राणों का संचार होता है। जब जल पर ही संकट तो फिर प्राणों की सुरक्षा असंभव है। नदी का जल है और जल से ही इस संसार का सारा जी है। इसलिए इस सृष्टि की रक्षा और संवर्द्धन है किए गए सुर-असुर संघर्ष को कुंभ का रूप दिय गया है जितनी जल्दी हम इस मूल मंत्र को समझ उतना ही यह हम सबके लिए हितकारी होगा। ज की महिमा का गुणगान संत रहीमदास ने कुछ प्रकार किया है:

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साभारः   डा. बैकुण्ठ नाथ शर्मा  कोशुर समाचार – अक्टूबर, 2025