श्रीनगर के वह कूचे

- श्रीनगर के वह कूचे




श्रीनगर के वह कूचे

 

राय खोदा ! बत् म्योन्डा दीतव । अरे! राय खोदा आ गया खाना मांगने । रात होने को आई है, अभी तक खाना तैयार नहीं हुआ। (बाहर से आवाज आती है) बड़ माज्यी, वारय छकबी? बत् म्योन्डा मेल्या? "ठहर, ठहर ! अरे जिगरी ! राम खोदा को ज़रा सुबह का चावल और कल की बची सब्जी देना।" "दग्दी, मैं अभी रात का खाना बनाने में लगी हूँ, खाना समय पर नहीं मिलेगा तो सब लोग शोर मचायेंगे। आपको तो कोई कुछ नहीं कहेगा, मैं पकड़ी जाऊँगी।" "लो हो गई तुम्हारी बहस शुरू। मैंने खाली राय खोदा को बचा हुआ खाना खिड़की से बाहर पकड़ाने को कहा था। दो मिनट लगेंगे। बिचारा इतनी ठंड में बाहर कूचे में खड़ा खाना मांग रहा है।" बहू बड़ बड़ करती, आकर बाहर खड़े भिखारी को खाना दे देती है। खाना देते हुए बड़बड़ाती जाती, "पता नहीं यहीं पर आकर खाना क्यों मांगता है, और भी वो घर हैं, वहां क्यों नहीं जाता।" भिखारी खाना लेकर अपने 'नबी' को याद करता चला जाता है। राय खोदा कहाँ रहता था, कहाँ से आता था किसी को पता नहीं था। वह करुण स्वर में 'राय खोदा' कहता था तो लगता था 'राहे खोदा' कह रहा है। इसीलिए लोग उसे 'राहे खोदा' ही बुलाते थे। राहे खोदा अमूमन रात के अंधेरे में ही खाना मांगने आता था। गली में अंधेरा होने की वजह 78 से किसी ने उसका चेहरा भी नहीं देखा था। एक आवाज आती थी, 'राहे खोदा बत् म्योन्ड इसीलिए उसे सब 'राहे खोदा' ही बुलाते कभी कभी वह अचानक कुछ दिन के लिए भी हो जाता था। घर के लोग, खासकर चिन्ता करती कि पता नहीं वह आया क्यों न कहीं बीमार तो न हो गया हो बिचारा । कभी लोग भी कहीं चले जाते तो वापस आने पर पूछता हम ठीक हैं या नहीं? यह सब गुफ्तगूगली में खड़े होकर और घर के लोग घर अंदर से ही चालू रखते एक बार हम तुलमुल गए थे। पूरा परिवार में बैठकर गया था। वापिस आने पर 'राहे खोद पूछा कि हम कहाँ गए थे। दय्दी ने उसे बताय हम 'अस्तान' गए थे। मैंने हैरान होकर द पूछा कि हम तो तुलमुल गए थे, वह अस्तान कह रही थी। तब दय्दी ने बताया कि 'राहे की भाषा में धार्मिक स्थल को 'अस्तान' ही थे। दय्दी को मौका मिल जाता मुझे डांटने का मैं ठीक से पढ़ाई नहीं कर रही थी। मेरी पढ़ी-लिखी नहीं थीं। उसे बहुत मलाल था कि कभी स्कूल नहीं गई। वह कहती थी कि अगर होता तो 'ननी' की तरह उसे भी अब 'पेंशन रही होती। पूछने पर वह बताती कि ननी स्कूमास्टरनी लगी थी और रिटायर होने पर पेंशनरही थी। हर चीज के लिए बच्चों से पैसा म दय्दी के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाता था। बह 'राहे खोदा' खाना मांगने आता रहा। खाना वह 'राहे खोदा बड़बड़ाता हुआ चला जाता। भी उसकी वह अशरीरी आवाज 'रहे खोदा बत् म्योन्डाह' कानों में गूंजती है। मेरे बचपन की यादों में एक और याद जो उभरकर आती है वह है, 'जान माल दी' की पुकार लगाने वाले सिक्ख मांगने वाले की। 'जान माल दी खैर' पुकारने वाला वह सरदार रिफ्यूजी, विभाजन के बाद ठोकरें खाता खाता सिरीनगर पहुँच गया था। लोगों के बहुत पूछने पर उसने बताया था कि वह पंजाब में एक अच्छे खाते-पीते घर का सदस्य था। विभाजन में उसके घर के अधिकतर लोग मारे गए थे। वह बचता-बचाता सिरीनगर कैसे पहुंचा उसे कुछ खास याद नहीं था। विभाजन के दौरान लोगों की जानें जाते देखकर और उनके मालसम्पत्ति की क्षति देखकर, जान माल की सुरक्षा की भावना उसके जेहन में शायद हमेशा रहती। इसीलिए वह हर एक को 'जान माल दी खैर' की दुआ देता। वह दिन में ही आता और खाना न मांगकर, कपड़े-लत्ते, रुपये पैसे की सहायता की अपेक्षा ही करता । शायद उसके रहने खाने का प्रबन्ध किसी गुरुद्वारे में रहा होगा। वर्षों बाद मुझे कई ऐसे सिक्ख मिले जो वाश्मीर में बस गए थे और कश्मीरी भाषा भी बोल लेते थे। हमारे घर के बड़े दरवाजे के बाहर कूचे में एक मानसिक रूप से विकलांग व्यक्ति यदा कदा दिखाई देता। लोग उसे 'नबिर मोत्' के नाम से पुकारते थे। वह अपने आप से कुछ-कुछ बड़बड़ाता रहता था पर कोई उससे खास डरता नहीं था। कभी कभी दयावश आस-पास के घरों के लोग उसे खाना भी खिला देते थे। गली में अंधेरा होने की वजह से लोग कभी कभी उससे टकरा जाते थे, तब वह एकाध गाली बक देता था। एक बार किसी की शादी थी 'सतराथ' साल से देर से लौट कर आते व्यक्ति ने गलती से उसके सीने को दरवाजे का हिस्सा समझकर उस पर दस्तक देने के लिए मुक्का मार दिया था। ठंड से बचने के लिए वह दरवाजे से चिपक कर सोया था। मुक्का पड़ने पर वह जोर से चिल्लाया और उठ खड़ा हुआ। शोर सुनकर घर के लोग जाग गए और दरवाजा खोलकर आने वाले को अंदर ले आए। गली के बाहर, सड़क के किनारे एक छोटी सी दुकान पर दही, पनीर बेचने वाली 'खतिज' और हब्बा कदल की सड़कों पर सुबह सुबह हाख सब्जी बेचने वालियों को मैंने कभी परदा बुर्का पहने नहीं देखा। घर के बाहर वाली गली में अलबत्ता कभी कभी एक बड़े से तम्बूनुमा सफेद रंग का,सिर से पाँव तक ढकने वाला बुर्का पहने एक औरत को बहुत बार देखा था। नह ज्योंही दिखाई देती, मैं गली के दूसरी तरफ भाग जाती। वह घर के अंदर मेरी दादी से मिलने भी जाती थी। वे क्या बातें करती थीं, मुझे नहीं पता। उसे देखते ही मैं घर के सबसे ऊपर 'कान्थी' में छुप जाती थी। असल में मेरी दादी ने मुझे कई बार धमकाया था कि अगर मैं उसकी बात नहीं सुनूंगी तो वह मुझे उसी 'बुर्क शबनी' को सौंप देगी जो मुझे अपने विशाल बुर्के में छुपाकर ले जायेगी। सर्दी के दिनों में जब बाहर बर्फ गिर रही होती और सर्दी से बचने के लिए हम घर के अंदर कांगड़ी ताप रहे होते वो अचानक बाहर से आवाज आती, 'मिशरी मकाई हा' बर्फ गिरने से कूचे में कीचड़ इतनी होती थी कि कई बार उसमें पाँव धँस जाते थे। घर के कुछ लोग मजाक में उस कूचे के कीचड़ को 'कोचि खम्भीर' (कूचे का मुरब्बा) कहते थे। बहरहाल, पेट की खातिर वह बेचारा मकई बेचने वाला कूचा-कूचा, गली-गली उस कड़ाके की ठंड में फेरी लगाता था। पर उसके गर्म भुने मकई के दाने खाने का मजा ही कुछ और था। मकई के दाने खाते खाते बातचीत चलती रहती। कभी-कभी घर की औरतें बुराई करते हुएकश्मीरी समाचार की चौपाइयाँ बड़े ही करुण स्वर में गातीं। मेरी मां, चाची,ताई कभी स्कूल नहीं गई थीं। मां बताती थी कि वह चौथी जमात तक घर के पास वाले स्कूल में गई थी। मुसलमान पड़ोसियों को लड़कियों का स्कूल जाना पसंद नहीं था। एक दिन कुछ लोगों ने स्कूल पर पत्थर फेंके थे और स्कूल बंद करवा दिया था या मां के घरवालों ने ही उन्हें स्कूल जाने से रोक दिया था। बाद में घर पर ही उन्होंने हिन्दी में रामायण आदि धर्म ग्रन्थ पढ़ना सीखा था। सीता जी की करुण गाथा सुनकर,मुझे समझ न आने पर भी, गाने वाली के करुण स्वर से दुख होता। उदास होकर मैं कम्बल में दुबक कर कांगड़ी को जकड़ लेती और गरमाहट से वहीं पर सो जाती। सोते सोते भी 'मिशरि मकाई हा' की आवाज कानों में गूंजती रहती। अगर सर्दियों में भुने मकई के दाने खाने को मिलते तो गर्मियों में कूचे में बर्फ बेचने वाले की आवाज़ आती: 'कम बन वोलमखो यखो!' वह यख यानि कि बर्फ, एकदम रुई की तरह,नई गिरी हुई बर्फ की तरह सफेद और मुलायम होती थी। बर्फ बेचने वाला उसे पेड़ की हरी छाल और बड़े-बड़े हरे पत्तों में लपेटकर लाता। उस मुलायम बर्फ और यहाँ दिल्ली में मिलने वाली जमी हुई बर्फ की सिल्ली में ही कोई समानता नहीं, सिवाय इसके कि दोनों बर्फ हैं। श्रीनगर के कूचे इतने सकरे, इतने तंग हैं कि एक साथ कई लोग एक दूसरे के आगे पीछे ही चल सकते हैं। मकान पास पास होने पर अपने अपने घरों में खड़े होकर भी बातें की जा सकती हैं। मेरी मौसियां अपने घर की 'डब' पर खड़े होकर सामने वाली 'डब' पर खड़ी अपनी सखी से बातें करती थीं। खिड़कियों पर Grills वगैरह न लगे होने के कारण गर्मियों में खिड़की खुली रखना खतरे से खाली न था। चोर दीवार पर खड़े होकर 80 दूसरे घर में कूद सकते थे। एक रिश्तेदार के चोर घुसकर खिड़की से झाँक रहा था। रिश्तेने पास पड़ा पानी का गिलास उठाकर चोर फेंका, चोर ने गिलास 'कैच' कर लिया और हंसहुआ गिलास लेकर ही चलता बना । उन्हीं कूचों में चलकर हम लोग बचपन स्कूल जाया करते थे। एक हाथ में किताबों बस्ता और दूसरे में लकड़ी की तख्ती पकड़कर से हब्बा कदल स्थित 'वसन्ता गर्ल्स स्कूल शायद Annie Besant के नाम पर बनाया होगा) जाना होता था। गली से गुजरते आस-पास के घरों के 'ठोकुर कुठ' से पूजा घंटियों की आवाज आती थी। वह घंटियों की आवाज आज भी मेरे कानों में बजती है। अधिक घरों में पुश्तैनी गोर (पुरोहित) पूजा करते थे। घर का एक निश्चित पुरोहित होता था। जाता है कि पुराने ज़माने में घर के एक बेटे सरकारी काम मिलने हेतु उचित शिक्षा दी थी और दूसरे बेटे को पुरोहित बनने की रि समय के साथ पुरोहित वृत्ति वाले पुत्र के गरीब और Social hierarchy में कमतर होते यजमान की दान दक्षिणा पर निर्भर रहने के का आर्थिक रूप से गोर परिवार कुछ अच्छी अवस्य नहीं होते थे। अधिकतर गुरु की पूजा-अर्चन साथ-साथ जातुख (जन्म-पतरी) लिखने और ब का काम भी करते थे। हमारे ननिहाल के गुरु घर की स्त्रियों में खासे popular थे। कभी- दोपहर में फुर्सत से बैठकर घर की महिलाओंभविष्य के बारे में चिन्ता, बच्चों के शादी ब्याह बारे में विस्तार से चर्चा करते थे। गौर-त्रय गुरु जी का रंग-बिरंगा calendar लाना मुझे भी याद है। स्कूल की गली में घुसते ही बड़भूजे की दुर थी। उसमें कर मुठ भूनने की महक हमेशा गर्नतैरती रहती थी। दिल्ली आने पर कर (चना) तो मिलता रहा है, पर मुठ किस दाल से बनता था, वह कुछ याद नहीं है। स्कूल के बाहर की गली में एक दाल मसालों की दुकान थी। स्कूल recess में भागकर वहाँ से इमली खरीदकर छुप छुपकर खाना एक बहुत बड़ा adventure था। एक बार सबके बस्तों की तलाशी ली गई (किसी ने चुगली की थी),इमली को confiscate करके फेंक दिया गया। दिल्ली आने पर इमली की जगह स्कूल के बाहर बिकने वाले बेर, कमरक, चूरन वगैरह ने ले ली। स्कूल से आते-जाते रास्ते में कई तरह की दुकानें पड़ती थीं। घर के बाहर की सड़क पर अमिर सौदागर की फलों की दुकान थी। अमिर सौदागर हमारे पिताजी के बचपन के दोस्त थे। स्कूल से आते-जाते देखकर एक आध सेब या नाशपाती पकड़ा देते थे। एक बार एक छोरा सा अनार दिया जिसके दाने इतने खट्टे थे कि खाने के बाद मैं कई दिन तक खांसती रही। बाद में दादी ने जाकर फल देने से मना कर दिया था। उन दिनों मुझे मेरी दादी एकदम Hitler लगी थीं पर आज उनका प्यार और चिन्ता याद कर मन भर आता है। सड़क के दूसरी तरफ एक मीट की दुकान थी जिसके मालिक हज से होकर आये थे। हज करके आने के बाद उन्होंने दाढ़ी रख ली थी। लोग उन्हें हाजी जी बुलाते थे। सुनने से लगता कि हाजी जी कोई बहुत बड़े विद्वान होंगे, पर जानने वाले जानते थे कि वे एक 'पुज' थे। कहा जाता है कि 'पुज' शब्द पूजा से उत्पन्न हुआ। हिन्दुओं को चिढ़ाने के लिए मास बेचने की क्रिया को पूजा से जोड़ा गया। थोड़ा आगे जाकर बर्तन बनाने वाले ठठेरे की दुकान थी। स्कूल से लौटते समय उसकी 'ठक-ठक की आवाज़ सुनकर मन को तसल्ली होती थी कि घर पास आ रहा है। दुकानदार स्कूल जाती लड़कियों पर नज़र भी रखते थे। थोड़ी बड़ी बच्चियों को सिर ढककर न चलने पर टोका भी करते थे। एक बार स्कूल ने कुछ दूंगे किराये पर लिए और लड़कियों को निशात, शालीमार excursion पर ले गए। शाम को वापिस आते हुए देखा कि दुकानदार दुकानों के बाहर खड़े होकर हंसते हुए कह रहे हैं, "ओह हो ! लडकियां आज निशात, शालमार गई थीं।" हमारे ननिहाल के पास के कूचे में एक (आजकल की भाषा में General Store) दुकान थी, जहाँ हाथी को छोड़कर बाकी सब कुछ मिलता था। दुकान जितनी बड़ी थी, उसका मालिक भी उतना ही फैला हुआ लगता था। बहुत गर्मी पड़ने पर जब वह 'फैरन' नहीं पहनता था तो उसके सीने की मांस की हिलती परतों को देखकर लगता था कि कोई मोटी औरत बैठी हुई है। उसका नाम शायद महमूदा या मोहम्मद था पर लोग उसे 'मोम् सौदागर' ही बुलाते थे। ननिहाल में सब लोग बिना शर्म या झिझक के दिन में दर्जनों बार 'मोम् सौदागर' से कुछ न कुछ खरीद कर लाने के बहाने बात किया करते थे। मालूम नहीं उसे अपने उस ridiculous नाम का ज्ञान था कि नहीं पर लोग जरूर उसके नाम को दिन में कई बार बड़ी रुचि से बोला करते थे। ' चा शब्द अलिफ लैला की दास्तानों की तंग गलियों की तरफ इशारा करता है। शायद कश्मीरी भाषा के फारसी शब्द पेपर मैशी की कला, कारपेट बुनने के हुनर के साथ-साथ कूचों में रहने की प्रथा भी हमने बाहर के किसी मुल्क से सीखी है। वह जो कुछ भी हो, उन तंग कूचों में चलने वाले 'राहे खोदा', 'जान माल दी खैर', 'बुर्क बावनि', वह गली के मुहाने पर कुत्तों को कूच - कूच करके बुलाकर रोटी खिलाने वाले 'च् बट', सब यदा-कदा मेरे स्वप्नों में आकर मेरे बचपन की यादों को गुदगुदा जाते हैं।

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साभारः  डॉ० शीला कौल    कोशुर समाचार" – अक्टूबर, 2025