


आतंक के विरुद्ध अडिग संकल्प लोकतंत्र को कमज़ोर करने वालों के लिए सख्त संदेश
दिल्ली में हुए ताज़ा धमाकों ने देश की सामूहिक चेतना को झकझोर कर रख दिया है। राजधानी जैसे संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में हुआ यह आतंकी प्रहार न केवल मानवता पर चोट है, बल्कि यह हमारे लोकतांत्रिक ढांचे, आंतरिक सुरक्षा और जनता की मनोवैज्ञानिक शांति को खुली चुनौती भी है। ऐसे हमले हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि आतंकवाद एक निरंतर विकसित हो रहा खतरा है, जो प्रभावी निगरानी, साहसिक निर्णय और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की मांग करता है। धमाकों के बाद सुरक्षा एजेंसियों की फुर्ती सांत्वना देती है। जांच की गति, तकनीकी साधनों का उपयोग,आतंकियों के नेटवर्क की पहचान और मॉड्यूल्स को ट्रेस कर उन्हें कश्मीर घाटी तक पहुँचने वाले सूत्रों से जोड़ना यह साबित करता है कि भारत की सुरक्षा प्रणाली पहले से कहीं अधिक सक्षम और पेशेवर हो चुकी है। आरोपियों की धरपकड़, संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी और उन घरों पर की गई कार्रवाई,जो आतंक को पनपने का सुरक्षित आश्रय बने हुए थे, एक कठोर लेकिन आवश्यक कदम है। यह केवल दंडात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए अनिवार्य सामाजिक संदेश है - आतंकवाद की कीमत बहुत भारी है। परंतु, इस निर्णायक लड़ाई के बीच कुछ आवाजें ऐसी उठीं जिन्होंने देश को हैरान कर दिया। कश्मीर के कुछ राजनेता और कुछ मुस्लिम संगठनों के नेता, जैसे अरशद मदनी और उनके जैसे अन्य, जिसने बिना तथ्यों का इंतज़ार किए, बिना जांच की दिशा समझे, सुरक्षा बलों पर प्रश्नचिह्न लगाने शुरू कर दिए। आतंकवाद जैसे जघन्य अपराध पर भी 'कवर फायर' देना, 'भटकते युवक' जैसी दलीलों में छिपाना या इसे 'राजनीतिक साजिश' कहना यह केवल राष्ट्रहित से विमुख होना नहीं, बल्कि आतंकवाद के नैरेटिव को मजबूती देना है भारत के बहुसंख्यक नागरिक और बुद्धिजीवी यह सवाल पूछने के लिए बाध्य हैं: क्या हमारी राजनीति का चरित्र इतना कमजोर हो गया है कि वह आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी वोट-बैंक के दबाव में जीने लगी है? जब निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं, तब संवेदना और सहानुभूति राजनीति का आधार नहीं बनती, बल्कि कानून और नैतिकता बनती है। आतंकवाद पर किसी भी प्रकार का भ्रम फैलाना या संदिग्धों के बचाव में खड़े होना राष्ट्र की सुरक्षा को सीधे खतरे में डालता है। ऐसे बयानों से न सिर्फ सुरक्षा बलों का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि आतंकियों को यह संकेत जाता है कि देश के भीतर भी ऐसे तत्व मौजूद हैं जो उन्हें वैचारिक संरक्षण देंगे। यह विडंबना ही है कि जब आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट, कठोर और सुसंगत कार्रवाई की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तभी कुछ हिस्सों से राजनीतिक और धार्मिक आवरण तैयार किए जाने लगते हैं। किन्तु भारत अब बदल चुका है। आज की सरकार, आज की जांच एजेंसियाँ और आज का आम नागरिक तीनों की प्राथमिकता एक है:सुरक्षित और शांतिपूर्ण भारत । जिन घरों का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों में हुआ, उन पर कानूनी कार्रवाई का यह संदेश है कि अपराध के दुष्परिणाम सामाजिक स्तर पर भी महसूस किए जाएँगे यह दुनिया भर के देशों में स्थापित तरीका है कि आतंक के सह-अभियोगियों और समर्थकों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। भारत का निर्णय इसी वैश्विक मानदंड के अनुरूप है। आज हमें तीन स्तरों पर दृढ़ता की आवश्यकता है: 1. राजनीतिक इच्छाशक्ति - आतंकवाद के विरुद्ध शून्य-सहनशीलता के सिद्धांत पर अडिग रहना। 2. सामाजिक जागरूकता - कट्टरता और अतिवाद के प्रोपेगेंडा को नकारना। 3. धार्मिक नेतृत्व की जवाबदेही - ऐसे बयान देना जो समाज को जोड़ें, न कि अलग-अलग खेमों में बाँटें। असली बात यह है कि राष्ट्र के विरुद्ध खड़े होने वाले, चाहे वे आतंकवादी हों या उनके वैचारिक संरक्षक, दोनों को यह समझना होगा कि अब देश चुप नहीं बैठेगा। भारत की सामूहिक चेतना और इसकी सुरक्षा एजेंसियाँ पहले से अधिक संगठित, सतर्क और साहसी हैं। जो मानवता के खिलाफ है, जो राष्ट्र के खिलाफ है - वह कानून से बच नहीं सकता। धमाकों की इस पीड़ा के बीच भारत का लोकतंत्र और अधिक मजबूत होकर उभर रहा है। हमारी एकता, हमारी सुरक्षा व्यवस्था और हमारा राष्ट्रीय संकल्प यही आतंकवादियों की सबसे बड़ी हार है।
अस्वीकरण :
उपरोक्त लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं और kashmiribhatta.in उपरोक्त लेख में व्यक्त विचारों के लिए किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है। लेख इसके संबंधित स्वामी या स्वामियों का है और यह साइट इस पर किसी अधिकार का दावा नहीं करती है।कॉपीराइट अधिनियम 1976 की धारा 107 के तहत कॉपीराइट अस्वीकरणए आलोचनाए टिप्पणीए समाचार रिपोर्टिंग, शिक्षण, छात्रवृत्ति, शिक्षा और अनुसंधान जैसे उद्देश्यों के लिए "उचित उपयोग" किया जा सकता है। उचित उपयोग कॉपीराइट क़ानून द्वारा अनुमत उपयोग है जो अन्यथा उल्लंघनकारी हो सकता है।
साभार:- महाराज शाह कॉशुर समाचार नवबर 2025-12-01