


एक कॉफी हाऊस की जलावतनी
अंग्रेजों के बारे में कहा जाता है कि अगर कही । किसी रेगिस्तान में दो अंग्रेज मिलेगे तो सबसे पहले वे कल्ब खोलेंगे। कश्मीरियों के लिए भी कहा जा सकता है कि वे जहां कहीं भी जाएंगे वहां वे सबसे पहले अखबार खोजेंगे। खबरें जानने की उनकी उत्कट भूख की तुलना उनके गपियाने के शौक से ही की जा सकती है। इसलिए वे मिलने-जुलने के लिए कॉफी- हाऊस जैसी जगह की तलाश करेंगे।
यही कारण है कि आजकल जम्मू में दिन ढलने से घटों पहले ही सभी अखबार और पत्रिकाएं तुरत-फुरत बिक जाती हैं। और तवी के सुरम्य तट पर जम्मू कॉफी-हाऊस सहसा जीवन्त हो उठा है, अन्यथा जो निर्जन और वीरान रहता था।
प्राय इस कॉफी हाऊस की कश्मीरी बहुल भीड़ में साहित्यकार शिक्षक, कवि, पत्रकार, चित्रकार रंगकर्मी, वकील, युवा बुद्धिजीवी और राजनीतिक कार्यकर्ता मिलेंगे जो यहां कश्मीर से आये हैं और जिन्हें माइन्ट जैसी एक असंगत संज्ञा से जाना जाता है। हालांकि वे साफ तौर पर निर्वासित लोग हैं, जिन्हें समूची कश्मीर घाटी, जिसे कभी खुशहाल घाटी के रूप में जाना जाता था, में दूर-दूर छितरे घरों से बेघर किये गये हैं।
इस कॉफी हाऊस में सब कुछ जस का तस है। अंतर केवल इतना है कि इंडिया कॉफी हाऊस यहां श्रीनगर के रेजिडेंसी रोड पर न होकर जम्मू की तवी के किनारे पर है। बाकी सब कुछ वैसा का वैसा है। वो ही चेहरे वो ही लोग, वो ही आवाजें, वो ही जीवन्त बहसें और जिस पर वो ही मसाला डोसा प्याज पकौड़े और वेजिटेबल सेंडविच के साथ कॉफी। यहां तक कि इस कॉफी हाऊस में बैरे भी वो ही है जिन्हें कश्मीर से यहां ले आया गया है। पूरा परिदृश्य वही है। कोई बदला नहीं सिर्फ जगह बदली है। वास्तव में यह कश्मीर से जम्मू आया हुआ एक
निर्वासित कॉफी-हाऊस है। यहां उत्साह में जरूर एक बदलाव दृष्टि गोचर होता है। श्रीनगर में नियमित रूप से कॉफी हाऊस आने वालों के पुर सुकून दमकते चेहरों की बात कुछ और थी। तनाव रहित, विश्रान्त और निश्चित चेहरे। अपने साथ जुड़े या गैर-संबंधित मुद्दों और विषयों पर अन्तहीन बहसों में डूबे रहने वाले लोग। बहस के लिए बहस करते लोग। यहां वो बात नहीं। यहां वे कसे हुए से और तनावग्रस्त दिखते हैं। चेहरों पर उद्वेलित मन की झुर्रिया लिए हुए। उनमें से अधिकांश इतने चिड़चिड़े हो गये हैं कि जरा जरा सी बात पर तुनक उठते हैं। हर बात की धुरी कश्मीर है, वो षड्यन्त्र है जिसके चलते उन्हें वहा से खदेड़ा गया। सोच में कश्मीर है। सांस-सास में कश्मीर है। वे खुली आंखों से कश्मीर के सपने देखते हैं ।
उन्हें माइग्रेन्ट कहलाये जाने से चिढ़ है जो सही भी है। उन्हें अपनी धरती से उखाड़ फेंका गया है। वे अपना सर्वस्व छोड़कर आये हैं। अपना अतीत। उनका नास्ताल्जिया । पुरखों की धरती। अपना भविष्य । उससे जुड़े सपने पूर्वजों की भूमि के सपने। वे निर्वासन में जरूर यहां हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं । परंतु उनकी आत्माएं वहीं है अपने देश में। उन्हें अपने प्राचीन कालिक मूल निवास से खदेडा गया है। उनसे उनका परिवेश खो गया है, जो युगों युगों से उनका अपना था, जिसके इर्द-गिर्द उन्होंने सपने बुने थे, आकाक्षाएं बुनी थीं।
उनमें से प्राय: प्रत्येक की विस्थापन-गाथा लगभग एक सी है। वे घाटी से भाग आये क्योंकि उनके परिवार T का कोई सदस्य या कोई संबंधी या कोई पड़ोसी या । कोई मित्र मार डाला गया। अथवा उसका अपहरण किया गया, यातनाएं दी गई, निर्दयता से उसकी हत्या की गई, बर्बरता से उसकी आंखें फोड़ी गई, उसके हाथ-पाव, घुटने-पसलियां, टांगें तोड़ दी गई, सिर में कीलें ठोकी गई या आरे पर उसके शरीर को चीर डाला गया। घर में बम फेंका गया या पड़ोसी के यहां विस्फोट हुआ। एक गुरीता हुआ फोन या धमकी पत्र आया कि भाग जाओं अन्यथा मरने के लिए तैयार रहो। किसी दोस्त की बेटी या अपनी ही पुत्री के साथ बदतमीजी की गई, सड़क पार का घर जला डाला। एक समाचार-पत्र (दैनिक अलसफा) ने हमारे समुदाय के नाम सुर्खियों में अड़तालीस घंटों में कश्मीर से भाग जाने के आदेश का पालन न करने पर बर्बाद किये जाने की धमकी प्रकाशित की। आदि-इत्यादि ।
पर जो भी हौलनाक परिस्थितिया रही हों जिनके चलते परिवार भाग खड़े हुए, एक सर्वव्यापी दहशत ने उन्हें अपने घरों से बाहर खदेड़ा, अपनी घाटी से निष्कासित किया जहां वे शताब्दियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी लाखों अन्य धर्मावलंबी लोगों के साथ सुख-शांति से रहते बसते आये थे। वे हजारों की संख्या में भागे। अहानिकर और शांतिप्रिय लोग। कभी किसी पडोसी के घर पर कंकर तक नहीं फेंका था। एक अपशब्द तक न कहा होगा। इतने सुसभ्य लोग। सौ के सौ फीसदी शिक्षित । अपराध की कोई दर नहीं। अवैध, असामाजिक, देशद्रोह के किसी उदाहरण का रिकार्ड नहीं, बेमिसाल थी देश प्रेम की भावना और कर्तव्य परायणता ।
ये अहिंसा के पुजारी शांतिप्रिय और सुसभ्य लोग इतिहास के उस मोड़ पर भागे जब उन्हें पूरा यकीन हुआ कि अब अपने घरों में सुरक्षित नहीं ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जब उन्हें परिस्थितिवश अपने मुसलमान दोस्तों ने भाग निकलने को कहा। ज्यों ज्यों सशस्त्र विद्रोह जोर पकड़ता गया सरकारी अधिकारियों ने भी बहुत सारे लोगों को घर छोड़कर सरकार द्वारा श्रीनगर के कई इलाकों में बनाए सुरक्षा जोनों में जाने की सलाह दी।
हर सुबह जब यहां कॉफी हाऊस में इस उजड़े और आतंकित समुदाय के बुद्धिजीवी आ बैठते हैं तो अपने भागने के अनुभव बताने को आतुर होते हैं कि वे किन हालात में यहां पहुँचे। वे अपने आहत मन की पीड़ा और वेदना को कहने के लिए यहां आते हैं। वे बिना आँसू बहाए रोना चाहते हैं। क्योंकि अपने घर और वतन से निकाल दिये जाने से बड़ी कोई त्रासदी नहीं हो सकती।
इस बन्दूक - संस्कृति के शिकार ये बदनसीब लोग घाटी के ऊँचे पर्वतों के इस तरफ उतरते ही बेगाने और अजनबी हो गये हैं। बाहर के लोग। यहां तक कि सरकार भी उनके साथ ऐसा ही बर्ताव करती है। उन्हें घर की याद सताती है। वे उस दिन की राह देख रहे हैं जब वे वापस अपने घरों को जाएंगे
इधर जबकि ये विस्थापित अल्पसंख्यक हिंदू अपनी जन्मभूमि कश्मीर से जुदाई की तकलीफ झेल रहे हैं, कश्मीर घाटी में उनको लेकर एक किस्सा गढ़ा गया है. कि ये लोग खुद ही भाग गये, उन्हें किसी ने भागने को नहीं कहा था, उनके जान-माल को भी कोई खतरा नहीं था।
एक तरह से देखा जाए तो यह सच है कि कश्मीरी पंडित के घर में यह कहने के लिए कोई नहीं आया कि तुम भाग जाओ। परंतु वर्ष 1990 के शुरू होते ही जैसी परिस्थितियां जिस तेजी से बनती जा रही थीं उनके चलते किसी भी व्यक्ति को यह बात बताने की जरूरत भी नहीं रह गई थी। चारों तरफ जो कुछ घट रहा था उसमें निहित संदेश साफ और मुखर थे।
आप किसी के पिता को मारिए, उसके बेटे या किसी संबंधी या पडोसी की हत्या कर डालिए तो उसे भाग जाने के लिए कहने का इससे प्रकट तरीका और क्या हो सकता है! यह उसके लिए चेतावनी है कि अब सूची पर तुम हो उसे धमकाने और आतंकित कर भगाने का दूसरा बेहतरीन तरीका और क्या हो सकता है कि आप उसके घर में बम विस्फोट करते हैं या उसके घर को आग लगाते हैं। उसे भगाने पर विवश करने के लिए उस पर और जुल्म ढाया जा सकता है कि उसकी बेटी, बहन या अन्य किसी संबंधी का अपहरण होता है और बलात्कार के बाद उसे मार दिया जाता है। किसी अन्य व्यक्ति को अगवा कर उसकी कटी हुई नसों से खून निर्बाध बहने दिया जाता है। वह तड़प तड़प कर मर जाता है। दूसरे व्यक्ति की आंखें निकाल दी जाती है या उसके शरीर को गर्म सलाखों से दाग दिया जाता है या उसके माथे में कील ठोक दी जाती है या उसकी आंखों में सुई चुभो दी जाती है। ऐसे भी कई लोग हैं जिनकी जीने काटी गई और हाथ-पांव तोड गये। बस में यात्रा कर रहे किसी अन्य आदमी पर गोलियों की बौछार कर दी जाती है। दूसरे को ऑफिस में काम करते हुए गोलियों से भून दिया जाता है। एक अन्य व्यक्ति को अपने बीमार माँ-बाप को देखने के लिए उनके घर में घुसते हुए ढेर किया जाता है। वहीं दूसरे आदमी को उसके घर में घुसकर उसे खाली ड्रम में छिपकर बैठने की कोशिश करते हुए गोलियों से छलनी किया जाता है।
एक स्त्री दिन दहाड़े अगवा की जाती है। उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है, उसके बाद आरे पर चीरकर उसके टुकड़े कर दिये जाते है। और उन टुकड़ों को यहा वहा फेंक दिया जाता है। दो बच्चों की माँ एक कालेज टीचर उठा ली जाती है, फिर उसका नामो निशान तक नहीं मिलता। एक अन्य कालेज टीचर और उसकी किशोर बेटी के साथ उनके घर में और एक दूसरे की मौजूदगी में बलात्कार किया जाता है। ऐसे ही एक अन्य मामले में एक माँ-बेटी के साथ बलात्कार के बाद उन्हें घर के अन्य सदस्यों सहित बेरहमी के साथ मार दिया जाता है। अपहरण के कई दिनों बाद एक दपति की सड़ी हुई लाशें नदी से निकाली जाती है। घर छोड़कर भाग रहे एक युवक को ढेर कर देने के बाद उसके बूढ़े बाप को घर से घसीटकर बाहर लाया जाता
है, उसके बाद उसका कोई अता-पता नहीं। क्या इस सबके बावजूद भी किसी आदमी या उसके परिवार को कश्मीर से भाग जाने को कहना जरूरी था?
कश्मीरी पंड़ित एक छोटा सा समुदाय है। वे या तो एक दूसरे के रिश्तेदार हैं या फिर आपस में एक दूसरे को जानते हैं। किसी एक परिवार में एक हत्या, या एक अपहरण, या विस्फोट या बलात्कार पूरी बिरादरी में हडकंप मचाने के लिए पर्याप्त है।
कश्मीरी पंडितों को इस बात के लिए भी दोष दिया जाता है कि उनके सामूहिक विस्थापन से कश्मीर के मुसलमान बदनाम हो गये। जब कि सच्चाई यह है कि समूचे कश्मीर और अहिंसा, शांति और सद्भाव की सदियों पुरानी परंपरा को बन्दूकधारी आतंकवादियों ने बदनाम किया है और यह भी सही है कि किसी कश्मीरी पंडित ने अपने मुसलमान पंडोसी को उसके विस्थापन के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया है। वे सभी धार्मिक कट्टरता के उफान और बन्दूक के आगमन को अपनी बर्बादी का कारण मानते हैं। आज कश्मीर मानसिक रूप से आहत है। उसे ऐसा आघात पहले कभी नहीं लगा। यह एक ऐसा सामाजिक- राजनीतिक आघात है जिसकी आग में देश-विदेश की ताकतों द्वारा पोषित धार्मिक कठमुल्लापन आग जुटा रहा है पाकिस्तान की गुप्तचर एजेन्सी आई एस आई लगातार इस कोशिश में है कि कश्मीर का अतीत उसकी सहिष्णुता की संस्कृति उसकी धरोहर और सर्वोपरि एक महान धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र के अंग के रूप में उसकी पहचान कैसे नष्ट हो।
कश्मीर की जनता ने इतिहास के ऐसे अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। तानाशाही की हद तक धार्मिक उत्पीड़न को भोगा है उसे जाना है एग्जोडस उनके लिए कोई नयी बात नहीं है। परंतु वे एग्जोडस, वे अत्याचार उन्मादी शासकों के दिये हुऐ रहे हैं। जन सामान्य के स्तर पर उनके परस्पर सुदृढ एक्य-भाव ने उन्हें हमेशा एक सूत्रता में पिरोये रखा है।
इस बार की बात अलग है। जो आप आदमी के निकटस्थ संबंधी हैं उनके हाथों में क्लाशिन को जैसे प्राणघाती हथियार आ गये हैं। वे उनके बच्चे हैं लेकिन उनके पास शस्त्र हैं, वे युवा हैं इसलिए दुःसाहसी हैं। उन्हें धार्मिक कट्टरता ने पूरी तरह से बदल दिया है. इसीलिए वे अत्यंत उम्र है और तर्क का निषेध करते हैं।
बन्दूक के अकस्मात आने से प्रत्ये कश्मीरी को झटका लगा है। उसे विस्मय हुआ है। ऐसी असामान्य स्थिति में उनमें से किसी की प्रतिक्रिया सहज और नैसर्गिक नहीं। आतंकवादियों के धर्म से भिन्न दूसरे धर्म का होने के दोष में हिन्दु को कश्मीर से भाग निकलने से बचाव दिखा। मुसलमान ने अपनी सुरक्षा उग्रवादियों की आकांक्षाओं के साथ एकात्मता जतलाने में ही समझी। उसने समर्पण किया। वह घाटी से नहीं भागा और दिनोंदिन उग्रवाद के जोर पकड़ने के चलते वह भी आजादी की लहर में वह गया और मोहभंग की स्थिति शुरू होने तक उसे काफी समय लगा। ऐसा स्वाभाविक भी था क्योंकि हिंसा की संस्कृति कभी उसकी विरासत में नहीं रही। यदि परिस्थितियों के दबाव में विस्थापित कश्मीरी हिंदु ने कोई उत्तेजक वक्तव्य दिया या जम्मू दिल्ली में कोई नारजगी भरा प्रदर्शन किया तो ठीक ऐसी ही परिस्थितियों के दबाव में उसके समवर्ती मुसलमान साथियों को भी कश्मीरी आतंकवादियों को घर में शरण देनी पड़ी या आजादी के लिए निकाले जुलूस में शामिल होना पड़ा, या उनकी हडतालों का साथ देना पड़ा।
आचरण के ये दोनों पैटर्न सामान्य नहीं हैं। ऐसी त्रासद और जानलेवा स्थितियों में सहज बने रहना संभव भी नहीं होता। क्योंकि ऐसे में अन्य सभी बातों और मूल प्रवृत्तियों पर जिजीविषा हावी हो जाती है। वर्तमान परिस्थितियों में एक कश्मीरी हिन्दु अपने साथी कश्मीरी मुसलमान के बारे में जैसी भी धारणा बनाए हुए है, वह उसकी नैसर्गिक भावना नहीं है। ठीक यही बात कश्मीरी मुसलमान पर भी लागू होती है।
जब कभी स्थिति सामान्य होगी, और अगर होगी. और दोनों जब पहले की तरह साथ-साथ रहने-बसने लायक होगें, तो दोनों को कितना अचम्भा और शर्मिन्दगी होगी कि रूह कंपा देने वाले आतंकवाद के दौरान उन्होंने एक दूसरे के बारे में कैसी कैसी धारणाएँ गढ़ ली थी। परंतु क्या कभी ऐसा समय आयेगा ?
(अंग्रेजी से अनुवाद अग्नि शेखर)
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साभार:- श्याम कौल कोशुर समाचार 2008, मार्च