ज़ून दयद

- ज़ून दयद




ज़ून दयद

 

दिल्ली की झुलसती गर्मी, ऊपर से लाइट का छुपन छुपाई का खेल हम लोग जानते 'हिन्दुस्तान कश्मीर जैसे ठण्डे प्रदेश के रहने वाले कहा फस गये आकर गर्मी की झुलसन के बाद बरसात का दूसरा ही रंग सीलन और पसीने की बदबू से बेहाल । त्राहि-त्राहि हे त्रिशूलधारी हम को किन पापों की सजा दे रहे हो। दिल बार-बार यही सोचता है और मन मसोस कर रह जाता है।

ऐसे ही झुलसते वातावरण में एक शाम लेटा लेटा अतीत की यादों में झूलने लगा। बाइस्कोप की तरह मेरे समाने बीती यादें परत दर परत आती और चली जाती। अटक गया जब जून मॉज और रमजान चाचा की प्यार भरी नजरें मुझको देखकर अपनी ओर आकर्षित करने लगी। जुव मॉज को सब लोग जून दयद के नाम से पुकारते पर मेरे लिये तो वह जुव मॉज ही थी। जुव मॉज व रमजान चाचा का मुस्कान भरा चेहरा मेरे इरद-गिरद घूमने लगा जब भोज का पुचकार पुचकार कर मुझे बुलाना अपने फिरन के अन्दर ले जाकर अपने सीने से लगाना और बोसों की भरमार से मुझे एहसास कराना कि मैं जब मॉज को सबसे प्यारा बेटा हूँ। जुव मॉज की ममतामई गर्म सासों का आभास मेरे कुरेदे हुए जख्मों पर मरहम का काम करने लगी। मेरी आँखे डबडबा गई और मैं मंत्र-मुग्ध-सा अपनी प्यारी जुव मॉज को निहारता रहा यह किस्सा क्या है? जब मॉज जुव कौन थी? आँसू क्यों टपक पड़े? सुनाता हूँ सुनाता हूँ।

श्रीनगर की नई सड़क पर हमारा घर था यहाँ हिन्दू व मुस्लमान दोनों साथ-साथ रहते थे हमें बिलकुल आभास न था कि हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग फिरके हैं. हमारे बुजर्ग भी हमारे इस प्यार को प्रोत्साहित करते थे। हम सब बच्चे मिलकर छुप-छुपाई या ओकुस बोकुस का खेल खेला करते हम लोग एक-दूसरे के बड़े दिन साथ-साथ मनाते ओर अपने प्यार में चार चाँद लगते। किस्सा-कोताह सब मेल-मिलाप और प्यार से ही रहते।

एक परिवार हमारे प्यार और मेल-मिलाप का खास केन्द्र था। कोई दस घर छोड़कर जून द्यद, रमजान जुव और उनका बेटा गुलामा रहता था। मैं अपनी माँ के पास कम और जुव मॉज के पास ज्यादा रहता। जब भी घर में डांट पडती मैं भागा-भागा जुव मॉज के फिरन के अन्दर जाकर सिसकियाँ लेता हुआ उनसे चिपक जाता। वह सारा काम छोड़कर मेरे अन्दर के सहलाब को थप-थपाती और प्यार भरी नजरों से मुझको बोसे पर बोसे लिये जाती और गुस्से में मेरी माँ से जाके कहतीं अगर इससे उकता गये हो तो छोड़ दो इसे मेरे ही पास। मैं इसका उतरा चेहरा और रोती हुई आँखे बरदाश्त नहीं कर सकती। (जुव माँ के इन वाक्यों को लिखते वक्त अनायास हो मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े और लिखाई का कुछ हिस्सा धूमिल पड़ गया।)

इसी तरह दिन सुख व प्यार से कट रहे थे कि अचानक हमारे प्यार पर शनीश्चर आन बैठा। शेख मुहम्मद अबदुल्ला जो कि उस वक्त पक्का फिरका परस्त था, ने हम भाइयों में भेद-भाव के बीज बोने शुरू कर दिये। धीरे-धीरे नासूर बढ़ता गया जो कि 1931 में फूट पड़ा। मुसलमान हिन्दुओं को मारने लगे। गावकदल और मैसूमा बाजार के मुसलमान कुल्हाडे-डडे आदि लेकर नई सड़के के हिन्दुओं को ललकारने और पत्थर मारने लगे।

तब मैं बहुत छोटा था। हमारा घर सड़क के किनारे पर था। तीसरी मंजिल पर डब (लकडी की एक्सटेन्शन) थी। मैं उसकी छेदों में से यह सारा हाल देख रहा था। मुसलमानों के झुंड़ में जुवमॉज का बेटा गुलामा भी हिन्दुओं पर पत्थर बरसाता और अपना रोष प्रगट कर रहा था। इधर हिन्दुओं के झुंड में जुव मॉज व रमजान चाचा आँखें लाल पीली करके गुलामे को हाथ उठा-उठा कर कोस रहा था और टोकरी में पत्थर ला ला कर हिन्दुओं के आगे रख कर कहता मारो तुम भी तुमने चूडियों नही पहन रखी हैं।

फिर क्या हुआ मुझे याद नहीं। कुछ दिन के बाद हालात सुधर गये। लोगों को कहते सुना शेख ने अपना नफा-नुकसान सोच कर नई पार्टी नेशनल कांफ्रेन्स बना ली है और वह पंडित नेहरू के साथ मिल गया है। 

कुछ दिनों के बाद में महसूस करने लगा कि गुलामा मुझ को पहले से ज्यादा प्यार जता रहा है। मैं अनमना सा उसके प्यार को अपनी मायूस नजरों से परखने की कोशिश करता रहा। एक दिन में जुव मॉज की गोद पर सिर रख कर लेटा था, वह मेरे बालों में उगलियाँ डाल कर सहला रही थी और सामने बैठी मेरी माँ से कह रहीं थी कि अब गुलामा कभी ऐसी गलती नहीं करेगा। उस को अब्बा ने समझा दिया है कि हम सब पहले बटु (कश्मीरी ब्राह्मण) ही थे। पड़ोस के मुल्कों से लालची-दरिदों ने यहां अपना कब्जा जमा कर हमें जबदस्ती मुसलमान बना दिया। हम बुजदिल निकले और उनका मजहब कबूल कर बैठे। यह लोग तो हिम्मत वाले निकले। उनके जुल्म बरदाश्त किये पर मजहब नहीं बदला। क्या तुम इनको महान नहीं समझते। हमारे बुजुर्ग भी बटु ही थे और हम सब उन्हीं की सन्तान हैं। गुलामा रोया और हाथ ऊपर उठाकर खुदा से माफी मागी । हालात बदलते रहे और सियासतदान और फिरकापरस्त गिरगिट की तरह रंग बदलते रहे। उनकी मजहबी और सियासती कुल्हाड़ों की चोटें हिन्दू सहते रहे। उन्हें चैन तब पड़ा जब हिन्दू मार-काट के बाद कश्मीर से निकाले गये।

मैं उन सियासत दानों और मजहब परस्तों से पूछ रहा हूँ क्या उनके हथकड़े जुव मॉज के प्रति मेरा प्यार, मेरी उनके प्रति इज्जत मुझसे छीन सकते हैं। क्या वह नहीं जानते कि कश्मीर में जुव मॉज जैसी कई माँये है जिनकी आंखे खोई-खोई सी हमें ढूंढ रही है और हम ठगे-ठगे से ममतामई माताओं के प्यार को तरस रहे हैं। उस समय तो मैं सिर्फ एक तमाशागीर था। पर आज मेरी भरी हुई आखे जुव मॉज को तलाश रही हैं। मैं आज भी इस वक्त भी जुव मॉज की छाती से चिपटा उनकी गर्म सांसों को महसूस कर रहा हूँ। हाय! वह प्यार, वह शेहजार कहां काफूर हो गया। मैं जुव मॉज के चरणों की रज कब अपने माथे पर लगा कर कुछ राहत महसूस कर सकूंगा। ईश्वर सब को सद्धबुद्धि दे । एल-4 कश्मीरी अपाटर्मेन्ट, पीतम पुरा दिल्ली

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साभार:-    सुरेन्द्रनाथ गुर्टू    कोशुर समाचार  2008, मार्च