


आस्था (यछ पछ)
तुम्हारे लिए कितने नाम खोजे
बन्धु सखा, सहचर-
नहीं
मेरी आस्था के दूत - हां देवदूत
स्मिता की धूल-धूसरित परतों को
हिलाते इतराते इठलाते,
तुम उतरे
नैनों के दो ज्योर्तिमय दीप लिए-
धुंधला मन प्रांगण हो उठा दीपित,
अनदेखे कोने हो गए प्रकाशित।
तेरे स्वागत में,
नैनों से दुलके दो अश्रुकण,
जो बने दिये-
सुनते आए थे
"नीर बने मोती सीपों के बंधन में -
पर
माणिक मन में ही ढले यू
ज्यों नत मुख कमल पाखुरी पर शबनम,
बंधन तो होते सूक्ष्म,
अपनेपन में अत्याधिक सूक्ष्म,
ज्यों स्वर्ण- रशिम छूती शिखर को
प्रफुल्ल विकास देने पंकज को
सशय से परे अह सीमा के पार
दम्भ की चोट से बाहर- एक स्वर्गिक अनुभव ।
विषय कालकूट दूर रहे इससे जिसने
ईश को भी कर दिया नीलकंठ ।
तुम जबसे आए,
अपने को जाना,
दिगदगत में उड़ा था
चिथडे सा विश्वास,
दीप टिमटिमा उठे,
उषा के दूधिया पर्वत
मिट आया बाहों में फिर,
कमलिनी खिल उठी
शुभ्र फेनिल झरने,
नहलाते गाछ खिलखिला उठे
ज्यों विधवा की सूनी मांग में
रथी ने खुद भर दिया सिन्दूर ।
नदियों के रिपटते आंचल में तुमको देखा
लहलहाती हरी वादियों में तुम आए-
केसर क्यारियों में लहराती झीलों में
हम साथ-चलें।
परिचित सूनापन - कैसे
हंस कर खुद पूछा 'अचरज' से
खिल उठा अर्न्तमन ।
न तोडो यह कोमल डोर
बधे रहने दो आत्मा के कोर
फडफड़ाओं पन्ने इस भूली पुस्तक के
रंग दो फीके परिधान को
छुड़ाना न आचल गर उलझे काटों में भी
तोड़ोगे दर्पण तो
खंड-खंड में भी
झांकोगे अपने को ही
यह चुम्बक यह आर्कषण
बनेंगे स्वयं आलम्बन-
लिखेंगे खुद परिभाषा |
प्रार्चाया, प्रिस्टीन चिल्ड्रेन्स हाई स्कूल, मझौलिया रोड, मुजफ्फरपुर (बिहार)-842001
अस्वीकरण:
उपरोक्त लेख में व्यक्त विचार अभिजीत चक्रवर्ती के व्यक्तिगत विचार हैं और कश्मीरीभट्टा .इन उपरोक्त लेख में व्यक्तविचारों के लिए जिम्मेदार नहीं है।
साभार:- डॉ. कौशल्या चल्लू (लाहौरी) एंव कोशुर समाचार 2008, मार्च