वरदान और अभिशाप के बीच संघर्षरत कश्मीरी पंडित

- वरदान और अभिशाप के बीच संघर्षरत कश्मीरी पंडित




वरदान और अभिशाप के बीच संघर्षरत कश्मीरी पंडित

पूरे अठारह वर्ष से विस्थापन का दश झेलते हुए कश्मीरी भाषी हिन्दू समाज (आम भाषा में कश्मीरी पू पंडित) मुख्यतः केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार की ढुलमुल नीतियों का खामियाजा भुगत रहे हैं। अपने एक सम्पादकीय में मैंने लिखा हम दो पाटन के बीच में पिस रहे हैं। देश की जनता पर जब भी कोई छोटी बड़ी दुखद घटना घटती है तो शासन तंत्र अलर्ट हो जाता है। किन्तु लाखों देशभक्तों को अपनी हजारों सालों की जन्मभूमि से उखाड़ दिया जाता है, तो बयान बाजियों और कूटनीतिक वक्तव्यों के अतिरिक्त उन अभागों के. पुनर्वास के लिए युद्धस्तर पर कार्रवाई नहीं होती। मूल कारण है-हम लोग वोट बैंक नहीं है।

अभी पिछले दिनों एक चर्चा गोष्ठी में उपस्थित बुद्धिजीवियों ने मातृभूमि कश्मीर से निष्कासित समाज की दुर्दशा के अनेक पहलुओं का बखान किया। विस्थापन के घाव इतने गहरे हैं कि यह शीघ्र नहीं भरेंगे। इस पीड़ा को हमारे नेतागण नहीं समझ पाते हैं। जिस तन लागे सोई तन जाने किसी सज्जन ने बैठक में कहा-हमें अन्य देशवासी शरणार्थी नहीं समझते क्योंकि हम बंगलादेशी शरणार्थियों की भांति कूड़े-कचरे से पनिया इकट्ठी करके बेचने से गुजारा नहीं करते और न ही भीख मांगते हैं। दूसरे सज्जन ने कहा-अजी हम अनपढ़ थोड़े हैं। भीख मांगे या घृणित काम करें हम पढ़े लिखे हैं येन केन प्रकारेण गुजारा करते हैं। अध्यक्ष महोदय ने कहा-इस चर्चा गोष्ठी में मुक्त भोगियों के विचार सुनकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हू कि अपनी जमीन, छोटी-मोटी दुकान गवाकर केवल मात्र रिलीफ पर गुजारा करने वाले बन्धु ही अब कैम्पों में रहते हैं या गौशालानुमा किराया की | कोठरियों में गुजारा करते हैं। अन्य बन्धुओं ने लोन लेकर फ्लैट खरीद लिए। इस प्रकार अपने पाओं पर फिर से खड़ा होने का संघर्ष कर रहे हैं। अस्तु।

हमारा मानना है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हमने अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने का प्रयत्न किया और कर रहे हैं। अपने बच्चों को आज के युग में आवश्यकतानुसार प्रशिक्षण के अवसर उपलब्ध कराए। उन्हें exposure मिला। जो लड़किया घाटी में साईकिल चलाने में झिझकती थीं यह स्कूटर और कारें चलाती हुई फर्राटे से महानगरों की सड़कों पर दौड़ती दिखाई देती है। वहां के दमघोटू (तालिबानी) माहौल से बाहर आकर हमारे युवा आजाद माहौल में सांस ले रहे हैं। शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र है-आई.टी चिकित्सा, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में हमारे नवयुवक आगे बढ़कर चमक रहे हैं। लेकिन यह सब 25 प्रतिशत तक लोगों का हाल है शेष बन्धुओं का हाल-बेहाल है। उनकी सुध लेना शासन के साथ पूरे भारतीय समाज का भी उत्तरदायित्व है। हमारे विधि विशेषज्ञों को सयुक्त रूप से जनहित याचिका दायर करके सर्वोच्च न्यायालय से न्याय मांगना चाहिए। सरकार को सच्चर कमीशन की तरह कश्मीर घाटी के अल्पसख्यकों (अर्थात कश्मीरी पंडितों) की सुध लेनी चाहिए। कमीशन द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर सरकार विस्थापित समाज के पुनर्वास उसकी लुप्त होती संस्कृति के सरक्षण उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारने तथा आवास तथा अल्प संसाधनों वाले प्रतिभा संपन्न समाज के बच्चों को ऊंची से ऊंची शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान करने के अवसरों को ढूंढने के उपाय सुझाने होंगे। इस प्रकार अपने गौरवशाली इतिहास को अक्षुण्ण रखने के लिए विस्थापित देशभक्त कश्मीरी समाज के अस्तित्व को बचाने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए। हम आशा करते हैं हमारी आवाज अनसुनी नहीं होगी। हमारा | मानना है कि कश्मीरी देशभक्त समाज का विस्थापन निश्चय से देश के लिए अभिशाप है किन्तु यह एक प्रकार से वरदान है। विस्थापितों को देश को जगाने और खबरदार करने का अवसर प्राप्त हुआ है। हमें देश के कोने में जाकर कट्टरपंथी इस्लामी अलगाववादी इरादों से देशवासियों को आगाह करना है।

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साभार:-  च.ल. सप्रू  एंव कोशुर समाचार  2008, मार्च