करें तो क्या करें

- करें तो क्या करें




करें तो क्या करें

 

भाजपा और मोदी जी के आते ही कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और उनके पिछले 27 वर्षों से लटके नरसंहार के मसले के न्यायपूर्वक हल की सम्भावना बहुत हद तक स्पष्ट और साफ दिखने लगी। ऐसा इसलिए लगा क्योंकि यही भारत का एकमात्र राजनीतिक दल है जिसने इस बात को अपने हर एलेक्शन ऐजेन्डे का न केवल मुद्दा बनाया अपितु इस बारे में सख्ती से यह दावा भी किया कि केन्द्र में बहुमत की सरकार आते ही यह पहला काम जम्मू कश्मीर में कश्मीर से इस्लामिक हिंसा के कारण उखाड़े गये इन 5 लाख से अधिक विस्थापितों को मान-सम्मान के साथ पुन वादी में बसायेंगे और इनको नये सिरे से यादी में पुनर्वास के लिए उचित आर्थिक मदद भी देंगें। इनके बच्चों को सरकारी रोजगार दिया जायेगा। इन पर हुए अत्याचारों की तफतीश करके गुनेहगारों को न्याय के कठघरे में खड़ा किया जायेगा।

आज भाजपा के प्रधान सेवक मोदी जी की सरकार केन्द्र में और इनकी गठबन्धन सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य में है। दोनों स्तरों पर इस दिशा में कोई भी प्रयास नहीं किया गया। आज मोदी जी की सरकार उल्टा कश्मीरी पंडितों पर दोष लगा रही है कि इन लोगों के विभिन्न गुट वादी में पुनःस्थापन के मामले में आपस में ही एकमत नहीं है। जब हमारे वादी में पुनःस्थापन की बात आप देश और राज्य के स्तर पर अपने चुनावी प्रचार का एक बहुत बड़ा मुद्दा बनाते हैं और इसे एक समस्या के रूप में स्वीकार करते हैं तो क्या घर-घर कश्मीरी पंडितों से पूछने जाते हो ? तब आज आपकी यह बात कि कश्मीरी पंडित वादी में वापस बसने के मामले में एकमत नहीं हैं क्या औचित्य रखती है? सिवाय इस बात के कि जम्मू का भाजपाई टोला और कश्मीर की पीडीपी टोले को इस मसले में कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती। यही कारण है कि होम मिनिस्टर से मिलने के लिए सोलह से अधिक कश्मीरी पंडित कैम्प सहायक समितियों को मुख्य प्रतिनिधि का दर्जा देकर गृहमंत्री से मिलने के लिए कुल 16 मिनट का समय दिया जाता है ताकि किसी भी समस्या पर उचित चर्चा न हो पाये और जो वापसी का वास्तविक मसला है वह क्षीण पड़ जाये। कैम्पों से आये प्रतिनिधि जाहिर है कि अपनी दैनंदिन समस्याओं से अधिक किसी मूल समस्या को उठाने में इसलिए संकोच करेंगे कि कहीं तत्काल जीवन से जुड़े इनके मसले भी न अनसुने रह पायें। मसले ही इतने उलझे और जानबूझ कर अटके हुए है।

पुरानी कहावत है कि जहा चाह वहां राह, अगर मोदी जी या उनकी जम्मू-कश्मीर की गठबन्धन सरकार चाहती तो कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के मसले को हल करने के लिए पहली दृष्टि में उन्हें किसी एक जगह बसाने के लिए जमीन का बड़े पैमाने पर अधिग्रहन कर उसका विकास करके उनके लिए एक रहने लायक शहर के निर्माण का कार्य शुरू कर देती। यह करना बहुत आवश्यक है, इससे कश्मीरी पंडितों के एक तरह से बहुत बड़े हौसले और यकीन को बल मिलेगा कि सरकार हमारे बारे में बहुत सजीदगी से सोच रही है। जाहिर है कि वादी में ऐसे तत्व जो किसी भी रूप में कश्मीरी पंडितों को पुनः कश्मीर में बसने नहीं देना चाहते हैं इस बात का किसी तरह विरोध करेंगें या इस में विघ्न डालने का प्रयास करेंगे, उनसे निपटना और उनको संभालना आवश्यक है पर उनके आगे घुटने टेक कर इस बात को ही टालना एक बहुत बड़ी हार का ही संकेत होगा। जब तक कि न कोई उचित उपाय निकाला जाता है तब तक कश्मीरी पंडित अब यही कहेगा कि अब इससे आगे करें तो क्या करें।

अस्वीकरण:

उपरोक्त लेख में व्यक्त विचार अभिजीत चक्रवर्ती के व्यक्तिगत विचार हैं और कश्मीरीभट्टा .इन उपरोक्त लेख में व्यक्तविचारों के लिए जिम्मेदार नहीं है।

साभार:-  कोशुर समाचार  2017, अक्तूबर