


जम्मू-कश्मीर का असली रंग
जम्मू-कश्मीर की राजनीति आखिर कब तक कश्मीर केन्द्रित कुछ एक राजनीतिक परिवारो अलगाववादी संगठनों और इनके मजहबी पैरवकारों के अधीन रह कर लोगों को गुमराह करने में कामयाब हो सकती है ? लोगों ने इस प्रश्न का जवाब इन सबको पहले जम्मू-कश्मीर में हुए निकायों और अब पंचायती चुनावों में इनके मना करने के बावजूद भी भारी तदाद में मतदान में भाग लेकर दिया।
वास्तविकता सामने आते देख कश्मीर के राजनीतिक गुर्गों की समझ में यह बात आते ही इनके होश ठिकाने आते दिखे। अपनी राजनीतिक भूमि खिसकती देख सब एकजुट होकर जिस किसी तरह कुर्सी हथियाने के लिए महागठबन्धन का नाटक करके सरकार बनाने के लिए राज्यपाल सत्यपाल मल्लिक को संपर्क करने लगे।
राज्यपाल ने विधानसभा भंग करके सता के इन लालची और लोलुप दावेदारों के सपनों पर पानी फेर दिया तो ये लामबद्ध होकर राज्यपाल को कोसने लगे। राज्यपाल बोले कि विधानसभा भंग न करता तो तोड़फोड़ कर भाजपा सरकार बनाती क्या यह उच्चित रहता। सबके होश एक बार फिर ठिकाने आ गये और सब राज्यपाल के फैसले की सराहना करने लगे। मतलब साफ है कि 'नाका' 'पीडीपी' और 'इका का मात्र सरकार हथियाना भी उतना ही अनैतिक होता जितना कि भाजपा द्वारा सजाद लोन के साथ मिलकर अन्य राजनीतिक संगठनों में संघ लगाकर सरकार बनाना होता ?
जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों के अवसरवाद और इनके अदूरदर्शी राजनीतिक सोच ने इन सबको नंगा करके रख दिया। कभी पत्थरबाजों के साथ तो कभी अलगाववादियों के साथ और आतंकवादियों के साथ खड़े इन राजनीतिज्ञों की खोखली और लोकहित के विरुद्ध सचालित इन की थोथी और अत्यन्त संकुचित सोच जो इनके तत्कालीन हितों को ही केन्द्र में रखकर बुनी जाती है, ने इनको आम लोगों से दूर कर दिया है। आम लोगों से मजहब के रिश्ते का वास्ता देकर अब सियासत को मजहब के रंग में खुले आम रंगकर वोट मांगे जा रहे हैं और लोगों के मुद्दों को दरकिनार कर उन्हें धर्मिक कट्टरपंथ और धार्मिक ध्रुवीकरण में बांट दिया जाता है।
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साभार:- महाराज शाह एंव कॉशुर समाचार 2018, दिसम्बर