


असली सच कश्मीर बनाम काफिर
कश्मीर में पीडीपी-भाजपा की मिली-जुली सरकार को अपवित्र अनहोली गठजोड़ क्योंकर कहते थे क्यों प्रजा द्वारा मनोनीत दो प्रजातांत्रिक राजनीतिक पार्टियां विपरीत ध्रुवों पर खड़ी मानी गई। क्यों पहले से अधिक आतकी पैदा हुए क्यों पहले से अधिक पत्थरबाज देखने को मिले? क्यों नहीं एक दिन भी कश्मीर में शांति स्थापित हो पाई? इन बातों की गहराई में जाना आज बहुत आवश्यक हो जाता है।
भाजपा ने जिस अलॉयंस आफ अजेंडा को स्वीकृति दी थी मूल रूप से इस को एक नजर देखने से पहले महबूबा मुफती की पीडीपी और भाजपा के नेता दोनों किस आधार पर और किन बातों को लेकर लोगों के बीच जाकर भारी मात्रा में सीटें जीत कर आये थे यह बात ही विपरीत दिशाओं को इंगित करती हैं।
महबूबा मुफती कश्मीर समस्या का हल अलगाववादियों, पाकिस्तानियों और कश्मीरियों से बातचीत में चाहती है। इसका मतलब क्या है? यह एक गल्य नेरटिव 1990 में कश्मीर में खड़ा किया गया है, जिसके अनुसार कश्मीरी मुसलमान कश्मीर को काफिरों के कब्जे से मुक्त करा के इस्लामी शरिया को इस्लामिक राज्य के रूप में स्थापित करना अपना ध्येय मानता है। इसके लिए हजारों वर्षों से कश्मीर में स्थापित धर्म-संस्कृति की समस्त मान्यताओं रस्मों रिवाजों ऋषियों की परंपराओं मान्यताओं बोलों कथनों इतिहास व मिलीजुली सभ्यता के हर उस प्रतीक को ध्वस्त करना शामिल है जिसमें हिन्दू या काफिरों का स्थान हो।
पाकिस्तान में इस विषैले प्रपंच को रचा गया और कश्मीर की हर राजनीतिक सोच ने इसका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कई तरीकों से समर्थन करना शुरू किया। दुनिया को दिखाने के लिए इस षडयंत्र पर लीपापोती करने के लिए और इस पर पर्दा डालने के लिए बार-बार कश्मीर समस्या का राग अलापा गया जो कि महज एक ढकोसला है। इस षडयंत्र को पाकिस्तान ने खुलकर अपनी सैन्य शक्ति का समर्थन गैर कश्मीरी और कश्मीरी आतंकवादियों को कश्मीर में भेजकर सशस्त्र आतवाद का एक नया दौर शुरू किया। इन आतंकवादियों ने उन सब लोगों को शिकार बनाना शुरू किया जो इनसे सहमत नहीं होते। इस तरह बादी में से स्वतन्त्रता और प्रजातन्त्र को सीधे प्रभावित किया गया और बादी की सारी राजनीतिक सोच आतकी शक्तियों के स्वर में स्वर मिलाने लगी।
इस तरह भारत को कश्मीर में राजनीतिक संकट के एक ऐसे माहौल से दो चार होना पड़ रहा है, जिसको कश्मीर का हर राजनीतिक दल अपने राजनीतिक हित के लिए सामने रखता है।
यह काम महबूबा करती हैं, यही फारूक अब्दुला और उमर अब्दुला करेंगे। यह अलगाववादी करेंगे। जब भी भारत सरकार आतंकवादियों के खिलाफ निर्णायक फैसले लेकर इनके सहार के लिए सैना को छूट देती है, बादी के राजनेता आतंकियों की हिमायत में आगे आते हैं। पत्थरबाजों की पैरवी करते हैं। कभी भी इन्होंने पत्थरबाजों और आतकियों की भरसक निंदा नहीं की कभी उन्हें गलत नहीं ठहराया कभी इस बात पर बल नहीं दिया कि हमारा भारत से विच्छेद कभी सभव नहीं और भारत वैसे ही हमारा देश है जैसे यह अन्य बीस करोड़ मुसलमानों का है। इसके विपरीत इनका प्यार अलगाववादी नेता सैयद अल्ली शाह गीलानी से अधिक है जो कहता है कि कश्मीरियों का पकिस्तान से किलमा का रिश्ता है। क्या भारत के मुसलमान किलमा नही पढ़ते या उनका अलग किलमा है?
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साभार:- महाराज शाह एंव कॉशुर समाचार 2018 , जुलाई