


हम अहिंसक हैं, कायर नहीं
जो सनातनियों को हमेशा उनके धर्म वाक्य अहिंसा परमो धर्मः की याद दिलाकर उग्र हिंदुत्व की भर्त्सना करते रहते हैं, असल में आप देखें तो पायेंगे कि उनका खुद का अहिंसा के प्रति कोई रुझान नहीं है। यह शास्त्रोक्त वाक्य कहकर वे केवल यह चाहते हैं कि सनातनी उनसे मार खाते रहे और उफ्फ तक न करें जबकि हिंदुत्व में उम्र और सॉफ्ट का कोई कॉन्सेप्ट है ही नहीं। किसी को चोट पहुँचाना अधर्म बताया गया है। लेकिन कोई तुम्हें चोट पहुँचाये तो तुम आत्म रक्षा करने में सक्षम न होओ, ऐसी कायरता तो भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में कहीं सिखायी ही नहीं गई। हम भारतीय, विजेताओं की संततियाँ हैं। विजय किसके ऊपर? अत्याचारियों के ऊपर। रुद्र पूजक भारतीय ।
हिरण्यकश्यप का कलेजा चीर देने वाले नरसिंह के आराधक! रावण का संहार करने वाले राम, कस का वध करने वाले (चाहे वह मामा ही क्यों न रहा हो) कृष्ण, महिषासुरमर्दिनी प्रचंड चंडिका, रक्तबीज का लहू पीने वाली कालिका की परंपरा के हैं हम भारतीय । यह भ्रम कब फैल गया कि हम अहिंसक हैं तो हम लात खाकर चुप बैठेंगे? न हम अहिंसक हैं, क्योंकि हम हिंसकों को जन्म-जन्मान्तरों के लिए हिंसा भुलवाने का हुनर और दमखम रखते हैं। हम शांतिप्रिय हैं, क्योंकि यह शांति हमें शर की दीप्ति से उत्पन्न देवी विजया ने दी है। पराक्रमी, वीर, विजेताओं की संतान हैं- इसी से शांतिप्रिय हैं
वरना तो जो हम युद्ध भूमि में पराजित होकर गुफा में छिपे हुए निर्वीर्य योद्धाओं की, पानी की बूँद बूंद को तरसते हुए मरने वालों की संतान होते तो हमेशा हमें हमारी जातीय चेतना अपनी उस पराजय का बदला लेने के लिए उकसाती रहती। हमारी सामूहिक संचित चेतना में यह स्मृति तो होती किं हमें अपनी पराजय का बदला लेना है, लेकिन किससे? यह विस्मृति हमें हर किसी के प्रति क्रूर और पाशविकता की हद तक हिंसक बनाये रखती। निर्वीर्य पुरुष अपनी कायरता और पराजय के अपमान का बदला स्त्रियों और निर्बल पशुओं के प्रति आक्रामक होकर उतारते हैं। कापुरुष सामने से लडने की ताकत न होने के कारण षड्यंत्रों का सहारा लेकर जय की लालसा रखते हैं।
हम उस तरह के षड्यंत्रकारी पूर्वजों की परंपरा से नहीं आते। विजयी योद्धाओं की संतान हैं। इसीलिये प्रेम धैर्य क्षमा सहनशीलता को अपना आभूषण मानते हैं मानते हैं, लेकिन भारतीय निर्वीर्य नहीं। वे अपने देश, अपने गौरव, अपनी अस्मिता और अपनी स्त्रियों की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना जानते हैं।
इसीलिए बात-बात में हमें अहिंसक होने की दुहाई देने वालों की भलाई इसी में है कि वे शेर से खिलवाड न करें।
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साभार:- सुधा त्रिवेदी एंव कॉशुर समाचार 2023 , मार्च