


मजहब के नाम पर फैलता आतंक समय की माँग है वैचारिक साहस और स्पष्ट नीति
आज का युग वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी प्रगति और वैश्विक चेतना का युग है। विश्व चाँद और तारों की सीमाओं को लांघ कर नए ब्रह्मांडों की खोज में संलग्न है। ऐसे समय में भी कुछ कट्टरपंथी विचारधाराएँ मजहब के नाम पर दुनिया को पीछे घसीटने में लगी हैं। यह केवल चिंताजनक ही नहीं, बल्कि समूची मानव सभ्यता के लिए घातक है।
पाकिस्तान की राज्य - प्रायोजित मजहबी आतंकवाद नीत
पड़ोसी देश पाकिस्तान वर्षों से इस्लाम के नाम पर आतंकवाद को न केवल बढ़ावा दे रहा है, बल्कि उसे एक रणनीतिक हथियार के रूप में उपयोग भी कर रहा है। चाहे कश्मीर हो या पंजाब, अफगानिस्तान हो या बलूचिस्तान-पाकिस्तानी नीति का मूल केंद्र आतंक और अस्थिरता फैलाना रहा है। कश्मीर में सक्रिय इस्लामी आतंकवादी संगठन, जिनका उद्देश्य धर्म के नाम पर अलगाववाद और खून खराबा है, इसी एजेंडे के हिस्से हैं।
कश्मीर के भीतर पनपता वैचारिक द्वंद्व
यह एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि कश्मीर में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो एक ओर भारत के संविधान से लाभ लेते हैं,वहीं दूसरी ओर उसकी एकता और अखंडता के विरुद्ध खड़े होते हैं। यह दोहरा रवैया न केवल राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी छिन्न-भिन्न करता है।
समान नागरिक संहिता की अनिवार्यता
भारत जैसे बहुधार्मिक, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में 'समान नागरिक संहिता' की मांग केवल संविधान की आकांक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता की बुनियाद है। जब तक धर्म के आधार पर अलग-अलग कानून चलते रहेंगे, तब तक एक समान राष्ट्रीय चेतना का निर्माण संभव नहीं।
भारत में मुस्लिम समुदाय और राजनीतिक दोगलापन
भारत में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या पाकिस्तान से अधिक है। उन्हें धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक हर क्षेत्र में पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है। इसके बावजूद जब वे अपने को 'असुरक्षित' या 'पीड़ित' बताकर हिंसा को जायज ठहराने लगते हैं, तो यह गहन आत्मावलोकन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
इतिहास के कटु सत्य और वर्तमान की सीख
अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मीर-ये सभी क्षेत्र कभी हिन्दू जीवन, संस्कृति और दर्शन के समृद्ध केंद्र थे। आज इन स्थानों पर हिन्दू नाममात्र को भी नहीं बचे हैं। क्या यह केवल ऐतिहासिक दुर्घटना है? नहीं। यह सुनियोजित मजहबी आक्रोश और विस्तारवाद का परिणाम है।
निष्कर्ष : भारत को चाहिए वैचारिक स्पष्टता और नीतिगत दृढ़ता
इस समय भारत को सबसे अधिक आवश्यकता है। वैचारिक स्पष्टता की। आतंकवाद और मजहबी उग्रता को केवल 'कुछ लोगों की गलती' कहकर टाल देना आत्मघाती होगा। देश की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक समरसता के लिए कठोर नीतियाँ अपनानी ही होंगी। पहलगाम ऐसी नृशंस और अवमाननीय आतंकी घटनाओं को रोकने के लिए इन बातों पर विचार करके आतंक की मूल अवधारणाओं पर चोट करना और आतंवादी संगठनों पर देश में और देश से बाहर कठोर प्रहार करना अति आवश्यक बनता है।
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साभारः महाराज शाह "कोशुर समाचार" - 2025, मई