साड़ो दखु सेसाझा उदेय तक कमीर पडिं डित के लिए एकता और ष्का आहवान

- साड़ो दखु सेसाझा उदेय तक कमीर पडिं डित के लिए एकता और ष्का आहवान




साड़ो दखु सेसाझा उदेय तक कमीर पडिं डित के लिए एकता और ष्का आहवान

इति हास कभी-कभी ऐसेसमदुाय के बीच गहर समानताएंदि खाता है, जो भौगोलि क प सेभलेह दरू ह, लेकि न उनके दःुख एक जसै ेह। यहूद समदुाय नेसदि य तक अयाचार झले ा - जि सक पराकाठा होलोकॉट महुई - और यह पीड़ा कि सी न कि सी प मकमीर पडिं डित के 1990 के पलायन और उसके बाद के सघं र्षों सेमेल खाती है। परंतुइस समान पीड़ा के बावजदू , दोन समदुाय के सफर मएक अहम अतं र दि खाई देता है: यहूदि य नेअपनेदखु को एकता, पहचान और वश्विैश्वि क समान मबदला, जबकि कमीर पडिं डित आज भी बि खरेहुए ह. एक ठोस और सार्थकर्थ दि शा क तलाश म। यहूद अनभु व हमारेलि ए एक ेरणादायक आदर्श है। उहनेअपनेसबसेबड़ेदखु के बाद भी पीडि त मानसि कता को नहंअपनाया। उहनेशि ा, साकृति क नि रंतरता. वश्विैश्वि क नेटवर्किं ग और राजनीति क सक्रि यता के बल पर खदु को फि र सेखड़ा कि या। उनक एकता ह उनक सबसेबड़ी ताकत बनी। आज इजराइल और वश्विैश्वि क यहूद समदुाय इस बात का तीक हैकि कि स तरह जि जीवि षा पीडा पर वि जय पा सकती है। इसके वि परत, कमीर पडिं डित समदुाय, जो बौधि क और सांकृति क प सेसमृ ध है. आज भी ष्टि कोण और यास मवि भाजि त है। तीन दशक बीत जानेके बावजदू , हमारेपास अब तक कोई सम, सामहिूहिक योजना नहं है। हमार सं थाएंअलग-अलग दि शा मकाम कर रह हऔर कभी-कभी सहयोग के बजाय ति पर्धा मउलझी रहती है। हमार यवु ा पीढ़, चाहेवह कि तनी भी ति भाशाल हो, अपनी जड़ से धीरे-धीरेकटती जा रह है। हमारा वि थापन आज भी केवल एक कण कहानी बनकर रह गया है. जबकि इसे एक सगं ठि त पनु थान क कहानी मबदला जाना चाहि ए। यह कहना गलत होगा कि यास नहं हुए। हमारे कई साथी साहि य, मीडि या, शि ा, वि ान और तकनीक जसै ेे मचमके ह। पर येयक्ति गत उपलब्धि यां ह- जि हअब सामहिूहिक चेतना और दि शा क आवयकता है। तो हम यहूदि य सेया सीख सकतेह? पहला उदेय क एकता। यहद समदुाय नेवचै ारि क मतभेद के बावजदू अपनेअस्ति व और पनु र्नि र्मार्नि र्माण को ाथमि कता द। हमभी अहकार, गटुबाजी और सं थागत सीमाओंसेऊपर उठकर समदुाय के अस्ति व और गौरव को सर्वो परि रखना होगा। दसू रा – सं कृति और शि ा मनि वेश। यहूदि य नेहि ूभाषा को पनु र्जी वि त कि या, परंपराए सहेजी और हर बचेमअपनेइति हास पर गर्व भर दि या। हमभी शारदा और कमीर भाषा, हमार लोककथाएं, रति -रि वाज, दर्शनर्श और साहि य को सरं क्षि त करना होगा और इसेअपनी नई पीढ़ तक ले जाना होगा। तीसरा - वश्विैश्वि क मचं सेजड़ुाव। यहूद समदुाय नेदनिुनिया भर मरणनीति क सबं धं बनाए। हमभी थि कं टक बनानेहगे, अतं रराय मचं सेजड़ुना होगा और हमारेइति हास और अधि कार क कहानी वश्विैश्वि क तर पर कहनी होगी। चौथा और सबसेमहवपर्णू र्ण– ष्टि । ष्टि यह काशतभ है, जो कि सी मी समदुाय को कठि नाइय मराता दि खाता है। हमयह तय करना होगा कि हम सि र्फ अपनेघर क वापसी चाहतेह, या एक ऐसा गरि मामय थान, जहां हमार पहचान, अधि कार और वि रासत सरुक्षि त और समृ ध हो? केवल पीड़ा ह हमार पहचान नहं हो सकती। उसेहमगर्व और उदेय क नींव बनाना होगा। जि स कार यहूद समदुाय ने अपनी मतिृति को सकं प मबदला, हमभी अपनी मतिृतिय को एक सशत आदं ोलन मबदलना होगा ऐसा आदं ोलन जो केवल अतीत का शोक न करे, बल्कि भवि य का नि र्मा ण करे। हमारेपास सोच है, ति भा हैऔर अभतु सहनशक्ति है। हमअब वि भाजन सेऊपर उठकर एक सामहिूहिक याा क शुआत करनी होगी। समय आ गया है- एकता का, नेतृव का और उस ष्टि का, जो हमारेइति हास मनहं, बल्कि हमारेभवि य मगजंू े। इस सपं ादकय के मलू मराजेश रैना जी का अं ेजी मलि खा लेख हैजि सनेमझु ेलि खनेको ेरि त कि या।

 

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साभारः   महाराज शाह  "कोशुर समाचार" - 2025, जून