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नारायण जू खार की खोज करने वाले को साहित्य अकादमी पुरस्कार

कोशुर समाचार संवाददाता Koshur Samachar Team

 

साहित्य अकादमी पुरस्कारों की श्रृंखला में 2008 के कश्मीरी भाषा में लिखने पर दिए जाने वाले पुरस्कार की घोषणा की गई है। इस वर्ष का पुरस्कार वरिष्ठ कश्मीरी लेखक श्री गुलाम नबी आतिश को उनकी पुस्तक बाजयाफत पर मिला है। पुरस्कार चयन मंडली के सदस्यों ने सात पुस्तकों में से इस पुस्तक का चयन किया। जूरी के तीन सदस्य श्री रफीक राज (निदेशक रेडियो कश्मीर, श्रीनगर), वरिष्ठ कश्मीरी लेखक श्री मोहम्मद अहसन और कोशुर समाचार के संपादक श्री बी एन वातल बेताब थे ।

128 पन्नों की बाज़याफत नाम की पुस्तक 2005 में छपी है और इसमें लेखक श्री गुलाम नबी आतिश ने कई गुमनाम कश्मीरी लेखकों को खोज कर लेखक जगत में फिर से जीवित किया है। इनमें और लोगों के अलावा नारायण जू खार भी शामिल हैं जो 1891 में मटन अनंतनाग के सुप्रसिद्ध गांव में जन्मे थे और लेखक के अनुसार 75 साल की आयु में 1966 में स्वर्ग पधारे।

पुस्तक में दी गई जानकारी के अनुसार नारायण जू खार ने कई प्रसिद्ध लीलायें रची हैं जिनमें सबसे लोकप्रिय गणेश स्तुति है जिसका कश्मीरी हिंदू समुदाय आज भी नित्य पाठ करता है। ये स्तुति यू है:

आसय शरण करतम क्षमा

ओम श्री गणेशाय नमः

गणपत गणेश्वर ही प्रभु

कलराज राजन हुद विभु

पजि लोलु पादन तल न्यमा

ओम श्री गणेशाय नमः

जगतुक महेश्वर छु पिता

सतरूप सतधर्मच सत्ता

माता छे गौरी श्री उमा

ओम श्री गणेशाय नमः

बाह नाव सुंदर शुबवनय

स्वर्गस गछन तिम बोलवुनय

पूरन करुम पूरन तमाह

ओम श्री गणेशाय नमः ।

आमुत 'नारायण' छुय शरण

पियोमुत खोरनतल छुय परन

वरदिथ पनुन कासुस गमा

ओम श्री गणेशाय नमः

कई प्रसिद्ध लीलायें लिखने के अलावा श्री नारायण जू खार ने राजा द्रू के जीवन की घटनाओं को भी कश्मीरी में छंदबद्ध किया है। इसका नाम उन्होंने द्रू चरित रखा है। श्री गुलाम नबी आतिश के अनुसार नारायण जू खार ने इस द्रू चरित को इसलिए अपनी मधुर वाणी में डाला था कि उनका स्वय भी कोई पुत्र नहीं था। हालांकि उन्होंने तीन विवाह किए थे परंतु उन्हें केवल पुत्री प्राप्ती हुई थी और राजा द्रू के जीवन के हालात भी कुछ ऐसे ही थे कि उनके भी कोई पुत्र नहीं था। नारायण जू खार को राजा के जीवन की घटनाओं को अपनी वाणी में प्रस्तुत करने में इसलिए भी आनंद आया होगा कि उन्होंने ऐसा करके अपने मन की पीड़ा को भी व्यक्त किया होगा जो निपुत्र होने के कारण उनके अंतरमन को कुरेदती रही होगी।

कहते हैं कि नारायण जू खार भारत के कई प्रांतों में घूमे हैं और हर जगह उनके अनुयायी थे। उन्होंने द्रू चरित नाम की अपनी मसनवी में भारत के सभी बड़े और प्रसिद्ध और मुख्य तीर्थस्थानों का उल्लेख बहुत ही शानदार तरीके से किया है। मसनवी में एक खंड ही भारत देश की शोभा नाम से दर्ज है जिसमें गंगा, काशी, गंगोत्री, वृंदावन, प्रयाग, कावेरी, पुष्कर, आयोध्या जैसे तीर्थस्थानों का वर्णन है।

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साभार:-  कौशुर समाचार, जनवरी, 2009

 

 




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