कमल हाक


जे.एन. कौल - पापाजी

 

अमर रहे पापाजी हमारे  श्रद्धांजली

कमल हाक

मुझे मृत्यु का भय नहीं है पापाजी ने यह  वाक्य दो महीने पहले उस समय कहा था जब मैं दो और साथियों के साथ उनसे मिलने उनका हाल पूछने उनके घर गया था वो पहले की बनिस्बत बहुत क्षीण लग रहे थे। बीमारी ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया था जो साफ दिख रहा था। पर कुछ ही पल बातचीत करने से हम समझ गए थे कि उनकी आत्मा और उनका दिलोदिमाग बीमारी से बेअसर है। उन्हें बीमारी के कारण जो पीड़ा हो रही थी वो उनके चेहरे से नजर नहीं आ रही थी। बल्कि उनका चेहरा काफी प्रभावशाली अब भी दिख रहा था। हालांकि हम समझ गए थे कि उन्हें हर शब्द बोलने में अब प्रयास करना पड़ रहा था परंतु हम उनकी हिम्मत और दिमागी फुरती से चकित थे। हमने बार-बार उनसे आग्रह किया कि वो बिस्तर पर ही लेटे रहें परंतु उन्होंने बड़ी मजबूती से हमारी बात नकार कर बिस्तर से थोड़ा-सा ऊपर उठते हुए और बैठकर हमसे बात की और वो आधे घंटे से ज्यादा समय तक हमसे इसी अवस्था में बात करते रहे। उन्होंने आग्रह किया कि हम लोग चाय पी लें। विशेष रूप से उन्होंने हमको प्रसाद खिलवाया।

मुझे अब पूरी तरह से याद नहीं है कि हमने उस समय क्या वार्तालाप किया। कारण यह नहीं है कि मेरी स्मृति कमजोर है बल्कि कारण यह है कि उस मुलाकात के दौरान पापाजी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि इस मानव का व्यक्ति कितना बहुआयामी है और इनके मन में कितनी करुणा है। यह सोचने पर मजबूर किया कि उनके मन में समुदाय के प्रति कितनी चिंता है और इस अवस्था में भी वह कितनी हिम्मत रखते हैं।

उस दिन मेरे सामने बैठा व्यक्ति जानता था कि उनका अत समीप है। परंतु वो मृत्यु को मुस्कुराते हुए गले लगाना जे.एन. कौल (पापाजी) का चाह रहे थे। इसके लिए श्री वीर मुंशी द्वारा रेखांकित चित्र उन्होंने अपने मन को पूरी तरह से शांत कर दिया था। वो बोल रहे थे पर हमने उनके बोलने में बाधा नहीं डाली। उनके बोलने से आसपास में जो उर्जा फैल रही थी। मुझे उसका आभास हो रहा था। मुझे यह आभास हो रहा था कि इस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन समाज के उन लोगों की भलाई के लिए व्यतीत किया है जिन्हें बहुत ज्यादा अवसर प्रदान नहीं होते।

मुझे आभास हो रहा था कि 1990 में जब हमारा पूरा समाज कश्मीर से पलायन कर आया था तो इस व्यक्ति ने किस तरह से अपनी सेवाओं का विस्तार कर उसमें अपने समाज को भी सम्मिलित कर दिया। और वो यह सेवा 18 साल तक निरंतर करते रहे।

'मुझे अपने समाज की चिंता लगी रहती है उन्होंने कई बार कहा 'हम एक ऐसा समुदाय है जिसे अपने आप पर गर्व है और मुझे तब सबसे अधि क डर लगता है जब मुझे यह विचार आता है कि हमारे समुदाय का कोई व्यक्ति कभी मजबूर होकर हाथ फैलाने पर विवश न हो। शायद लोग मेरी सराहना इसलिए कर रहे हैं कि मैंने कुछ किया है, मैंने कुछ भी नहीं किया है केवल ईश्वर की इच्छा का पालन किया है। मुझे केवल एक चिंता खाए जा रही है कि हमसे किसी एक को भी अपने बच्चों की शिक्षा या अपने किसी प्रिय के इलाज या अपनी पुत्री की शादी के लिए अपना मान-सम्मान गिरवी न रखना पड़े। इन्हीं सारी भावनाओं ने मेरे हर कार्य को करने की मुझे शक्ति दी ।'

पापाजी के ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूंज रहे हैं। उनके चेहरे पर एक मुस्कुराहट उभर आई। थी जब डाक्टर अग्निशेखन ने उन्हें यह बताया था कि पनुन कश्मीर ने उन्हें जम्मू में होने वाली आगामी तीसरी कश्मीरी पंडित काफ्रेंस में शारदा सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। यह बात बहुत स्पष्ट थी कि पापाजी सम्मान मिलने के समाचार से प्रसन्न नहीं थे क्योंकि उन्हें इससे भी बड़े कई पुरस्कार मिल चुके हैं। उनकी प्रसन्नता का कारण यह था कि अपने समुदाय ने उनकी सेवाओं को जाना था, माना था। बल्कि उन्होंने कहा भी कि हमारे समुदाय में लोग आमतौर पर प्रशंसा नहीं करते। अफसोस वो अपना यह वादा निभा नहीं सके कि वो यह सम्मान प्राप्त करने के लिए जम्मू आएगे।

पापाजी का शरीर अब हमारी दृष्टि में नहीं है परंतु उनकी प्रेरणा हमारे साथ सदा रहेगी। उन्होंने जीते जी इस बात को सुनिश्चित किया था कि सहायता की उनकी परंपरा आगे बढ़ती रहे। इसीलिए उन्होंने अॲरुट नाम की फाऊडेशन बनाई जिसका प्रबंध उनकी बेटी श्रीमती गिरिजा भान चला रही हैं।

मैं पापाजी को बहुत निकट से ज्यादा नहीं जातना था परंतु उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व ने मुझे हमेशा मुतासिर किया है। मैं पापाजी को ज्यादातर कश्मीरी पंडित समुदाय के प्रोग्रामों में किए गए उनके भाषणों से ही जानता था। और मुझे यह कहने में आपत्ति नहीं कि मैं अकसर उनके राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं होता था परंतु मेरे हृदय में उनके लिए हमेशा ही इस बात के लिए बहुत आदर बना रहा कि वो अपनी राजनीतिक विचारधारा किसी पर ठोस नहीं रहे थे बल्कि दूसरे के विचारों का आदर करते थे। उनका कहना था कि हमारे समुदाय को क्या राजनीति अपनानी चाहिए उसका निर्णय हालात करेंगे। हमको केवल यह देखना है कि हम समाज के प्रति अपना कर्तव्य निष्ठा से निभाए।

पापाजी अकसर यह कहा करते कि आने वाला समय स्वयं अपना मार्ग निर्देशित करेगा। हमको तो यह काम करना है कि हम अपने समाज को मजबूत बनाएं इतना मजबूत बनाए कि हम उस भविष्य को सवार सकें। पापाजी इस बात की एक भली मिसाल हैं कि आदमी को किस तरह से अपनी निष्ठा और विचारधारा पर कायम रहना चाहिए।

पलायन के कुछ समय बाद ही मैंने अपने समुदाय की एक लड़की से प्रश्न पूछा था कि बेटी तुम क्या कर रही है। उसने मुझे जो उत्तर दिया उससे तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उसने जो कहा वो यूं है-मैं एक यू दिन पुराने फरीदाबाद के बाजार में अपनी मां के साथ कुछ खरीददारी कर रही थी, एक व्यक्ति ने बीच बाजार में हमको रोका और कश्मीरी में हमसे बात करने लगे। उन्होंने मेरे और मेरे परिवार के बारे में जानना चाहा और जब मैंने उनके प्रश्नों का उत्तर दिया तो उन्होंने मुझे कहा कि बेटी तुम नौकरी करना चाहोगी- दूसरे दिन में उनसे मिली और मुझे नौकरी मिल गई।

मैंने अपनी दादी से कश्यप बंधु जी के बारे बहुत सुन रखा था कि उन्होंने किस तरह से हमारे समाज के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया था। आज मुझे इस लेख में अपने विचार प्रकट करते हुए लग रहा है कि पापाजी को जानने वाले उनके प्रशंसक आज वो ही ताज पापाजी को पहनाएंगे जो हमारे समाज ने कश्यप बंधु को उनकी सेवाओं के लिए पहनाया था क्योंकि बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ।

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साभार:- कमल हाक एंव कौशुर समाचार, जनवरी, 2009

 

 




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