बृजनाथ वातल बेताब


एक बेटा ये भी है मेरे उस कश्मीर का - अशोक जेलखानी

 

बृजनाथ वातल 'बेताब'

परिचय

21वीं शताब्दी में टेलीविजन हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है और आज देश में हर भाषा का और हर क्षेत्र में अलग-अलग टेलीविजन चैनल कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। टेलीविजन के इस नए माध्यम में कई ऐसे नाम शिखर पर पहुचे हैं जो आगे चलकर हमारे समुदाय के इतिहास में हम सबको गौरवान्वित करने वाले महान व्यक्ति कहलाएंगे।

ऐसे ही एक कश्मीरी पंडित का आज आपसे परिचय कराने का प्रयास कर रहा हू जिन्होंने नाटक और टेलीविजन कार्यक्रमों में अपनी लगन और मेहनत और काबलियत से अपनी अलग पहचान बना रखी है। और दूरदर्शन प्रशासन में उस पद पर पहुंचे हैं जहा पहुचने वाले वे न केवल पहले कश्मीरी पंडित हैं बल्कि जम्मू-कश्मीर राज्य के पहले नागरिक। हम सबको गौरवान्वित करने वाले इस महान व्यक्ति का नाम है श्री अशोक जेलखानी ।

सर्वप्रथम यह जानना चाहूंगा कि जेलखानी शब्द आपके परिवार के साथ कैसे जुड़ गया?

हम वास्तव में राजदान हैं। जेलखानी तो एक उपनाम है। जो हमारे खानदान के साथ इसलिए जुड़ गया कि हमारा कोई पूर्वज कश्मीर में जेलर था। पर अब हम इसी नाम से पहचाने जाते हैं। कश्मीर में आप कहां रहते थे?

हम श्रीनगर के आलीकदल क्षेत्र में ऋषि पीर के पास बुद्धगीर इलाके में रहते थे। मेरे पिता का

नाम श्री मोहनलाल जेलखानी है और वह आजकल जम्मू में हैं। मेरी मा का कुछ समय पहले स्वर्गवास हो गया। मेरे पिता 1985 में ए.जी. ऑफिस से सीनियर ऑडिटर के पद से सेवानिवृत्त हो गए।

आपकी माता श्रीमती कुंती जेलखानी एक वैभवशाली नारी थीं, उनका कश्मीर में काफी दबदबा था, वो अनुशासन के लिए काफी प्रसिद्ध थीं। क्या आप पर उनका ज्यादा असर था?

जैसा आप जानते हैं कि मा इंस्पेक्टरस ऑफ स्कूल्स थीं। चूंकि वो नौकरी करती थीं। इसलिए उन्हें अकसर घर से दूर रहना पड़ता था। वो तकरीबन कश्मीर के हर क्षेत्र में रहीं। उनके बारे में यह बात काफी लोग जानते हैं कि वो स्कूलों में बच्चों के जीवन में अनुशासन लाने और उन्हें अच्छे संस्कार देने पर बल देती रहीं। उन्होंने सारा जीवन ही दूसरे बच्चों को अच्छे नागरिक बनाने में व्यतीत किया। जाहिर है कि हमको भी उन्होंने अच्छे संस्कार दिए। मां का तो बच्चे पर असर होता ही है, पर मुझ पर ज्यादा असर मेरे चाचा जी श्री चुनीलाल जेलखानी का था। वो दरअसल अंग्रेजी लिटरेचर के माहिर थे। योगा और आध्यात्म में उनकी काफी रूचि थी। स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती का उन पर काफी प्रभाव था और उनके पास में इन विषयों पर काफी सारी पुस्तकें हुआ करती थीं। मैं चूंकि दूसरी कक्षा से ही बिस्को स्कूल में पढ़ता था। इसलिए मुझे शुरू से ही अंग्रेजी पढने की आदत रही और 18-19 साल तक की उम्र में चाचा जी के ही साये में रहा। और उनके पास की सारी किताबें पढने का अवसर मिला।

आपने रंगमंच में काफी नाम कमाया। कलाकारी और निर्देशन के लिए कई पुरस्कार मिले। रंगमंच में आपकी रूची कैसे बनी?

1974 से 1977 तक का समय कश्मीर में रंगमंच के लिए एक सुनहरी समय था। ये पूरे समय घाटी में हर जगह थियेटर ग्रुप बने और थियेटर ग्रुपों ने अपनी एक फेडरेशन बनाई जिसके अध्यक्ष श्री प्राण किशोर थे। इस थियेटर फेडरेशन ने लगातार ड्रामा फेस्टिवल कराए। रियासत की सांस्कृतिक अकादमी तो करा ही रही थी और ये सारे फेस्टिवल के नाटक टैगोर हाल में होते और जज बाहर से भी आते। पर मैंने पहला नाटक श्री मोतीलाल क्यमू का लिखा हुआ 'मागय' 1970 में खेला। नाटक लोगों को पसंद आया। मुझे इसके लिए राज्य सरकार के युवा विभाग से बेहतरीन निर्देशक का अवार्ड मिला। फिर उसके बाद 1973 में जे.सी. माथुर का नाटक 'कोनार्क खेला जो हिंदी में था। इसके लिए भी मुझे बेहतरीन निर्देशक और सबसे अच्छी प्रोडक्शन का अवार्ड मिला। फिर 1974 में एवम इंद्रजीत नाटक किया। बादल सरकार के इस नाटक को रंगमंच पर प्रस्तुत करने के लिए मुझे बेहतरीन कलाकार और निर्देशक का अवार्ड मिला। 1975 में 'मधु का हिंदी नाटक 'किसी एक फूल का नाम लो प्रस्तुत करने के लिए बेहतरीन निर्देशक का अवार्ड मिला और 1976 में अली मोहम्मद लोन साहब का नाटक किया 'चिनार'। इसके लिए भी बेहतरीन कलाकार और निर्देशक का अवार्ड मिला।

अवार्ड तो आपको बाद में टेलीविजन में भी मिले। जालंधर केंद्र में, चैन्नई दूरदर्शन में जहां आप डायरेक्टर थे, और सबसे अच्छे केंद्र होने का अवार्ड आपको मिला। परंतु आपने थियेटर के लिए जो काम किया उनमें आपने क्या नई चीज लाई कि हर व्यक्ति ने उसे सराहा ?

अगर सक्षेप में कहू तो मैंने कश्मीर में कटेंपरेरी थियेटर को इंटरोड्यूस किया। मैंने कश्मीर में न सिर्फ वो नाटक खेले जो बाहर के बड़े-बड़े नाटककारों ने लिखे थे, बल्कि यहां उनमें एक नई तकनीक का प्रयोग किया जैसे मैंने लाइटिंग की तरफ ज्यादा ध्यान दिया। यहां ऐसा पहले नहीं होता था ।

फिर आप दूरदर्शन में कब और कैसे आए?

दूरदर्शन में मुझे उस समय नौकरी मिली जब मैंने अभी ग्रेजुएशन नहीं की थी। हुआ यूं कि मैंने रेडियो नाटकों और थियेटर में जो थोड़ा-बहुत नाम कमाया था उसका मुझे लाभ मिला। क्योंकि जब यहां दूरदर्शन केंद्र बना तो यहां के स्थानीय कलाकारों को ही प्राथमिकता दी गई।

उस समय वहां श्री प्राण किशोर साहब और स्वर्गीय श्री बशीर भट्ट साहब थे और दिल्ली से एक ओ.एस.डी. आए थी श्री राजशेखर ये लोग मुझे जबरदस्ती गए क्योंकि वो मेरी कला प्रदर्शनी और रूचि दोनों देख चुके थे। हालांकि मैंने अभी ग्रेजुएशन नहीं की थी और मेरे घर वाले भी कह रहे थे कि अभी तुम पढाई पूरी करो नौकरी की क्या आवश्यकता है। परंतु दूरदर्शन के अधिकारी मुझे दूरदर्शन लाना चाह रहे थे।

टेलीविजन आने के साथ ही कश्मीर में थियेटर का पतन आरंभ हुआ?

हां कह सकते हैं टेलीविजन ने रंगमंच को पीछे कर दिया मगर फिर टेलीविजन ने अपना । कमाल भी दिखाया। आपको याद होगा उन दिनों पाकिस्तान टेलीविजन से एक बहुत ही मशहूर प्रोग्राम आता था नीलाम घर। जिसे कश्मीर के लोग भी देखते थे। परंतु कश्मीर टेलीविजन के हर व्यक्ति ने बड़ी मेहनत की और कुछ बहुत ही अच्छे कार्यक्रम प्रस्तुत किए जैसे कृषि कार्यक्रम बुतराथ और भी कई अच्छे कार्यक्रम थे और मैंने व्यक्तिगत रूप से जो प्रोग्राम किए उनमें एक प्रोग्राम था देखने वालों के पत्रों के उत्तर देने का, जो मैं एक दूसरे साथी के साथ किया करता था और यह कार्यक्रम न सिर्फ कश्मीर में बल्कि सरहद के पार भी इतना लोकप्रिय हुआ कि मुझे वहा से पत्र आते थे जिसमें लोग यह लिखते थे कि आपका यह प्रोग्राम जिस समय प्रसारित होता है उसी समय हमारे यहां नीलाम घर प्रसारित होता है परंतु हम नीलाम घर को छोड़ कर आपका कार्यक्रम देखते हैं। ये एक पहलू था। दूसरा पहलू यह कि दूरदर्शन ने कई अच्छे सीरियल और नाटक किए। मैंने खुद अकेले ही करीब 500 एपिसोड का निर्माण किया जिनमें नाटक और सीरियल भी थे। इनमें मेरा पहला ही सीरियल 'हरूद' बहुत मशहूर हुआ। मैं करीब नौ-दस साल ड्रामा प्रोड्यूसर रहा और हर महीने कम से कम दो नए ड्रामा प्रस्तुत करने होते थे। और मेरे शुरूआत दौर का एक ड्रामा था 'दस्तार जिसे लोग आज तक नहीं भूले हैं। फिर फारूक नाजकी साहब जो 'शबरंग' नाम का सीरियल करते थे। वो उसे बीच में छोड़कर जर्मनी चले गए और इसके मैंने साठ से अधिक एपिसोड का निर्माण किया। मैंने अख्तर महयूदीन साहब का लिखा एक नाटक अंग्रेजी में किया और आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी कि उसमें दो मुख्य कलाकारों सुदामाजी कौल और नबला बेगम ने अंग्रेजी में डायलोग बोले थे। हमने यह नाटक अंग्रेजी में इसलिए किया था कि हम इसे विदेश भेजना चाह रहे थे।

आपने दूरदर्शन के ड्रामा में भी एक बदलाव, एक नयापन लाया?

दरअसल जब श्रीनगर में टेलीविजन सेंटर खुला तो लिखने वाले वही थे जो रेडियो के लिए लिखते थे और टेलीविजन तो एक नया मीडियम था। पर लिखने वाले वो लोग थे जो रेडियो नाटक लिखने के आदी थे। उन्हें टेलीविजन माध्यम को अपनाने में दिक्कत आ रही थी। और वो इस बात को स्वीकार भी करते थे। तो मुझे सब नाटक लिखने वालों के साथ में तालमेल के साथ काम करने में आनंद आता था विशेष रूप से इसी कारण से कुछ नए लिखने वालों ने जल्दी से टेलीविजन के मीडियम को समझा।

फिर 1984-85 में ए. एस. डी. बने और वहां से अब डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर कार्यरत हैं। कभी मन में विचार आता है कि फिर से नाटक खेलूं?

विचार तो आता है पर समय का अभाव है। परंतु मन में यह तसल्ली है कि जो भी काम किया उसे लोगों ने काफी सराहा।

इस बीच आपने टेलीविजन कार्यक्रम निर्माण पर पुस्तक भी लिख डाली ?

वो तो दूसरी पुस्तक थी। पहली पुस्तक तो मैंने 1981-82 में लिखी थी थियेटर एक परिचय नाम से यह इस विषय पर लिखी गई अपनी तरह की पहली विस्तृत पुस्तक है। इसमें अलग-अलग तरह के थियेटर के बारे में अध्याय हैं जैसे नाट्यशास्त्र पर लिखा है, जापान के काबुकी पर लिखा है, दुनिया के अलग-अलग थियेटर का उसमें वर्णन है और इस पुस्तक पर विदेशों में भी समीक्षा हुई है। फिर पिछले साल मैंने और श्री महाराज शाह ने मिलकर एक और किताब लिखी-टेलीविजन कार्यक्रम निर्माण प्रक्रिया। यह पुस्तक लिखने का एक खास उद्देश्य था। बात दरअसल यह है कि आजकल टेलीविजन प्रोग्रामों में लोगों की काफी रूचि है। दर्शकों में युवा वर्ग सबसे ज्यादा रूची रखता है और वे न केवल कार्यक्रम देखना चाहते हैं परंतु उनमें भाग लेना चाहते हैं। इस धुन में कोई उनका शोषण न करे इसलिए उनका सही मार्गदर्शन करने हेतु हमने यह प्रयास किया है।

जम्मू-कश्मीर में टेलीविजन ने काफी टेलेंट पैदा किया परंतु फिल्म उद्योग पनप नहीं सका। क्या दूरदर्शन इसमें कोई रोल अदा नहीं कर सकता?

मूल बात यह है कि फिल्म उद्योग का सीधा संबंध फिल्म में पैसा लगाने से है और कोई यह खतरा मोल नहीं लेना चाहता। रहा सवाल दूरदर्शन तो हमने एक नया प्रयोग किया है वह यूं है कि हमने गौतम घोष से बंगाली में दूरदर्शन के लिए एक सीरियल बनवाया। फिर एन.एफ.डी.सी. के साथ सहयोग करके गौतम घोष से कहा कि वह इस सीरियल को एडिट करके एक फिल्म बनाए। | फिल्म बन चुकी है और मैं 15 तारीक को इस फिल्म को रीलीज करने के लिए जा रहा है। देखते हैं लोगों की क्या प्रतिक्रिया रहती है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो मुझे आशा है कि दूरदर्शन इसे दूसरी भाषाओं में भी करना चाहेगा।

क्या दूरदर्शन नए साल में जम्मू-कश्मीर राज्य के प्राईवेट प्रोड्यूसरों को कोई तोहफा देने वाला है?

आशा तो है। हो सकता है मार्च से पहले हो। हम भी इस आशा में बैठे हैं कि हमारे पास पैसा कब अलॉट होता है। नव वर्ष का तोहफा तो हम अवश्य देना चाहेंगे।

मैं श्री अशोक जेलखानी साहब से इस विषय पर शायद और विस्तार से बात करना चाह रहा था परंतु इस बीच उनके मोबाइल की घंटी बजी और वह बात करना चाह रहे थे मैंने इसीलिए इस साक्षात्कार को विराम दिया। वो जब बात कर रहे थे तो मुझे ऐसा लगा कि शायद उनकी बिटिया का फोन है। हालांकि मैं यह तो नहीं समझ पाया कि फोन उनकी बड़ी बेटी जननी का था जो मुंबई में डाक्टर हैं या छोटी बेटी आँही का था जो अभी पढ़ ही रही है परंतु उनके बात करने के ढंग से और उनकी आंखों में उभरने वाली चमक से मुझे विश्वास हुआ कि फोन उनकी बिटिया का ही था। क्योंकि यह चमक एक पुत्री के प्यार से अपने पापा के अंतरमन से उभरने वाली प्रसन्नता की चमक थी। खैर मैं वहा से चल दिया परंतु दूरदर्शन भवन की सीढ़ियों से उतरते समय सोच रहा था कि जिस व्यक्ति का इतना योगदान है उसे एक दिन अवश्य सी.ई.ओ. के पद पर विराजमान होना चाहिए। और जिस दिन यह होगा उस दिन हम सबका सर गर्व से कितना ऊंचा हो जाएगा। इसी सोच में मेरे हाथ प्रार्थना के लिए उठे ।

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साभार:- बृजनाथ वातल 'बेताब' एंव कौशुर समाचार, जनवरी, 2009

 




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