शिवलिङ्गोपासना-रहस्य


515 ब्रह्मांलीन स्वामी श्री करधात्रीजी महाराज   Sh-KAL-00022012   शिवलिङ्गोपासना-रहस्य

(अनन्तश्री पूज्यपाद धर्मसप्राद ब्रह्मांलीन स्वामी श्रीकरधात्रीजी महाराज)

 

सर्वाधिष्ठान, सर्वप्रकाशक, परब्रह्म परमात्मा ही शान्त शिवं चतुर्थम्मन्यन्ते' इत्यादि श्रुतियोंसे शिवतत्त्व कहा गया है। वही सच्चिदानन्द परमात्मा अपने-आपको ही शिव शक्ति-रूपमें प्रकट करता है। वह परमार्थतः निर्गुण निराकार होते हुए भी अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्दघनरूपमें भी प्रकट होता है। वही शिव शक्ति, राधा-कृष्ण, अर्धनारीश्वर आदि रूपमें प्रकट होता है। सत्ताके बिना आनन्द नहीं और आनन्दके बिना सत्ता नहीं। स्वप्रकाश सत्तारूप आनन्द' ऐसा कहनेसे आनन्दको वैषयिक सुखरूपताका वारण होता है, सत्ताको आनन्दरूप कहनेसे उसकी जड़ताका वारण होता है। जैसे आनन्दसिन्धुमें माधुर्य उसका स्वरूप ही है, वैसे ही पार्वती-शिवका स्वरूप किंवा आत्मा ही है। माधुर्यके बिना आनन्द नहीं और आनन्दके बिना माधुर्य नहीं। दूसरी दृष्टिसे

 

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

(गीता १४। ४)

 

समस्त प्राणियों में जितनी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि अर्थात् उत्पन्न करने वाली माता प्रकृति है और बीज देनेवाला शिव (लिङ्ग) पिता मैं हूँ। अर्थात् मूल प्रकृति और परमात्मा ही उन माता-पिता (योनि-लिङ्ग)- रूपमें उन-उन मूर्तियों (वस्तुओं) - का उत्पादन करते हैं। 'एकोऽहं बहु: स्याम् प्रजायेय' इत्यादि श्रुतियों के अनुसार एक ब्रह्मतत्त्व ही प्रजोत्पादन या बहुभवनके संकल्पमात्र से अनन्त रूपों में विवर्तित हो जाता है। 'सोऽकामयत' यह प्रजा की सिसृक्षारूप संकल्प ही प्राथमिक आधिदैविक काम है। इसी के द्वारा प्रकृतिसंसृष्ट होकर भगवान् अनन्त ब्रह्माण्डों को उत्पन्न करते या कराते हैं

 

सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया । पाइ जासु बल बिरचति माया॥

-यह काम भी भगवान्का ही अंश है-'कामस्तु वासुदेवांशः' (भागवत)। लोक में भी प्रेम, काम या इच्छा का मुख्य विषय आनन्द ही है। सुख में साक्षात् कामना और उससे अन्य में सुख का साधन होनेसे इच्छा होती है, इसीलिये आनन्द और तद्रूप आत्मा निरतिशय, निरुपाधिक पर प्रेम का आस्पद है, अन्य वस्तुएँ सातिशय सोपाधिक अपर प्रेम के आस्पद हैं। जैसे विषयके प्रभाव से कटु निम्ब में मिठास प्रतीत होती है, वैसे ही भान्ति या मोह के प्रभाव से मांसमयी कान्ता में आनन्द का भान होता है। परंतु इसके अतिरिक्त शुद्ध आनन्द या आत्मा में जो प्रेम, आनन्द, कामना है, वह तो स्वाभाविक है, आत्मा का अंश ही है, इसीलिये अद्वैत आत्मा ही निरुपाधिक प्रेम का आस्पद कहा जाता है, परंतु वहाँ प्रेम और उसके आश्रय तथा विषय में भेद नहीं है

 

प्रेम, आनन्द, रस-ये सभी आत्मा के ही स्वरूप हैं। रसरूप आनन्द से ही समस्त विश्व उत्पन्न होता है, अतः सब में उसका होना अनिवार्य है। इसीलिये जिस तरह सोपाधिक आनन्द और सोपाधिक प्रेम सर्वत्र है ही, उसी तरह कान्ता भी सोपाधिक आनन्दरूप कही जा सकती है। अतएव वह सोपाधिक प्रेम का विषय भी है। परंतु निरुपाधिक प्रेम तो निरुपाधिक आत्मा में ही होता है। जैसे सत्के ही सविशेष रूप में अनुकूलता, प्रतिकूलता, हेयता, उपादेयता होती है, निर्विशेष तो शुद्ध आत्मा ही है, वैसे ही सविशेष आनन्द और प्रेम में भी हेयता, उपादेयता है।

 

सुन्दर, मनोहर देवता और तद्विषयक प्रेम आदि उपादेय हैं, सुन्दरी वेश्यादि की आनन्दरूपता और तद्विषयक प्रेम हेय । है। जैसे अति पवित्र दुग्ध भी अपवित्र पात्र के ससर्ग से अपवित्र समझा जाता है, वैसे ही आनन्द और प्रेम भी अपवित्र उपाधियों के संसर्गसे दूषित हो जाता है। शास्त्रनिषिद्ध विषयोंमें आनन्द और प्रेम दोष है, हेय है। शास्त्रविहित विषयोंमें आनन्द और प्रेम पुण्य है, उपादेय है। परंतु निर्विशेष, सर्वोपाधियुक्त प्रेम, आनन्द तो स्पष्ट आत्मा या ब्रह्म ही है। इतने पर भी आनन्द और प्रेम सभी है। आत्मा के ही अंश अपवित्र विषय के दूषण से ही कामिनी आदि विषयक प्रेम को मन या राग आदि कहा जाता है, देवताविषयक प्रेम को भक्ति आदि कहा जाता है। सजातीय में ही सजातीय का आकर्षण होता है। बस, यह आकर्षण ही प्रेम या काम है। कान्ताकान्त दोनों ही में रहने वाले तत्तदवच्छिन्न रस या आनन्द में ही जो परस्पर आकर्षण है, वही काम है।

 

समष्टि ब्रह्म का प्रकृति की ओर झुकाव आधिदैविक काम है। परंतु जहाँ शुद्ध, सच्चिदानन्दघन परब्रह्मका स्वरूप में ही आकर्षण होता है, किंवा आत्मा को अपने ही अत्यन्त अभिन्न स्वरूप में ही जो आकर्षण या निरतिशय निरुपाधिक प्रेम है, वह तो आत्मस्वरूप ही है। यही राधा कृष्ण, गौरी-शंकर अर्धनारीश्वर का परस्पर प्रेम, परस्पर आकर्षण है और यह शुद्ध प्रेम ही शुद्ध काम है। यह कामेश्वर या कृष्ण का स्वरूप ही है। अनन्त ब्रह्माण्ड में विस्तीर्ण कामविन्दु मन्मथ है। अनन्त ब्रह्माण्डनायकका प्रकृति में वीर्याधान का प्रयोजक कामसागर साक्षात् मन्मथ है। परंतु, सौन्दर्य-माधुर्यसार-सर्वस्व निखिलरसामृतमूर्ति कृष्णचन्द्र का जो अपनी ही स्वरूपभूता माधुर्याधिष्ठात्री राधा में आकर्षण है, वह तो साक्षान्मन्मथमन्मथ ही है। उनका पूर्णतम सौन्दर्य ऐसा अद्भुत है कि उन्हें ही विस्मित कर देता है। काम उनकी पदनखमणि-चन्द्रिका की रश्मिच्छटा को देखकर मुग्ध हो गया। उसका स्त्रीत्व-पुस्त्वभाव ही मिट गया, उसने अपने मनमें यह ठान लिया कि अनन्त जन्मोंतक भी तपस्या करके ब्रजाङ्गनाभाव प्राप्तकर श्रीकृष्णके पद- नख-मणि-चन्द्रिकाका सेवन प्राप्त करूँगा। परंतु यहाँ तो कृष्णने ही अपने स्वरूपपर मुग्ध होकर उस रसके समास्वादनके लिये व्रजाङ्गना-भावप्राप्त्यर्थ तपस्याका विचार कर लिया। यहाँ शुद्ध परमतत्त्वमें ही शिवशक्तिभाव, अर्धनारीश्वरभाव और शुद्ध आकर्षण प्रेम या काम है। सद्रूप गौरी एवं चिद्रूप शिव दोनों ही जब अर्धनारीश्वरके रूप में मिथुनीभूत (सम्मिलित) होते हैं, तभी पूर्ण सच्चिदानन्दका भाव व्यक्त होता है, परंतु यह भेद केवल औपचारिक ही है, वास्तव में तो वे दोनों एक ही हैं।

 

कुछ महानुभावों का कहना है कि पूर्ण सौन्दर्य अपने में ही अपने प्रतिबिम्ब को अपने-आप देख सकता है, भगवान् अपने स्वरूप को देखकर स्वयं विस्मित हो जाते हैं

 

'विस्मापनं स्वस्य च सौभगद्द्धे:

परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्।'

 

(श्रीमद्भा० ३। २। १२)

 

बस, इसी से प्रेम या काम प्रकट होता है। इसी से शिव-शक्ति का सम्मिलन होता है। वही शृंगाररस है। कामेश्वर-कामेश्वरी, श्रीकृष्ण-राधा, अर्धनारीश्वर वही है। पूर्ण सौन्दर्य अनन्त है अप्सराओंका सौन्दर्य उसके सामने नगण्य है। उसी सौन्दर्य के कणमात्र से भगवान् विष्णु ने मोहिनीरूप से शिव को मोह लिया उसीके लेश से मदन मुनियों को मोहता है। वही सगुणरूप में कहीं ललिता, कहीं कृष्णरूप में प्रकट होता है

 

'षोडशी तु कला ज्ञेया सच्चिदानन्दरूपिणी।'

(सुभगोदय)

नित्यं किशोर एवासी भगवानन्तकान्तकः ॥

 

कभी आद्या ललिता ही पुंरूपधारिणी होकर कृष्ण बनती है, वही वंशीनाद से विश्व को मोहित करती है

 

कदाचिदाद्या ललिता पुंरूपा कृष्णविग्रहा।

बंशीनादसमारम्भादकरोद्विवशं जगत् ॥

 

(तन्त्रराज)

 

प्रकृतिपार, सौन्दर्य-माधुर्यसार, आनन्दरससार परमात्मा में ही शिव-पार्वती-भाव बनता है। अनन्तकोटिब्रह्माण्डोत्पादिनी अनिर्वचनीय शक्तिविशिष्ट ब्रह्ममें भी शिव-पार्वती- भाव है। उसी परमात्मा लिङ्ग-योनिभाव की कल्पना है।

 

निराकार, निर्विकार, व्यापक दृक् या पुरुषतत्त्व का प्रतीक ही लिङ्ग है और अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनि, अर्घा या जलहरी है। न केवल पुरुषसे सृष्टि हो सकती है, न केवल प्रकृतिसे। पुरुष निर्विकार, कूटस्थ है, प्रकृति ज्ञानविहीन, जड़ है। अत सृष्टि के लिये दृक्-दृश्य, प्रकृति-पुरुषका सम्बन्ध अपेक्षित होता है। 'गीता में भी प्रकृति को परमात्माकी योनि कहा गया है

 

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् ।

संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥

 

(१४। ३)

 

भगवान् कहते हैं-महद्ब्रह्म-प्रकृति-मेरी योनि है, उसी में मैं गर्भाधान करता हूँ, तभी उससे महदादिक्रमेण समस्त प्रजा उत्पन्न होती है। प्रकृतिरूप योनि में प्रतिष्ठित होकर ही पुरुषरूप लिङ्ग का उत्पादन करता है। अतएव बिना योनि-लिङ्ग-सम्बन्ध के कहीं भी किसी की सृष्टि ही नहीं होती। हाँ, यह बात अवश्य समझ लेनी चाहिये कि

लोकप्रसिद्ध मांसचर्ममय ही लिङ्ग और योनि नहीं है, किंतु वह व्यापक भी है। उत्पत्ति का उपादान कारण पुरुषत्व का चिह्न ही लिङ्ग कहलाता है। दृश्य अण्डरूप ब्रह्म ही अदृश्य पुरुष-ब्रह्म का चिह्न है और वही संसार का उपादान भी है, अतः वह लिङ्गपदवाच्य है। लिङ्ग और योनि पुरुष-स्त्री के गुह्याङ्गपरक होने से ही इन्हें अश्लील समझना ठीक नहीं है। गेहूँ, यव आदि में भी जिस भाग में अङ्कुर निकलता है, उसे योनि माना जाता है, दाने निकलने से पहले जो छत्र होता है वह लिङ्ग है । ब्रह्मा या देवताओं के सकल्प से उत्पन्न सृष्टि का भी लिङ्ग-योनि से सम्बन्ध है, अर्थात् शिव-शक्ति ही यहाँ लिङ्ग-योनि शब्द से विवक्षित हैं।

 

जैसे दृक्तत्त्व व्यापक है, वैसे ही दृश्य प्रकृतितत्त्व भी। तभी तो कभी लोकप्रसिद्ध योनि-लिङ्ग के बिना भी मानसी संकल्पजा सृष्टि होती थी। कहीं दर्शन से कहीं स्पर्श से, कहीं फलादि से भी संतान उत्पन्न हो जाती थी। कहीं भी कैसी भी सृष्टि क्यों न हो, परंतु वहाँ सृष्टि के उत्पादनानुकूल शिव शक्ति का सम्बन्ध अवश्य मानना पड़ता है। वृक्ष, लता, दूर्वा, तृणादि सभी तत्त्वों की उत्पत्ति में तदुपयुक्त शिव-शक्ति का सम्बन्ध अनिवार्य है। योगसिद्ध महर्षियों का प्रकृति पर अधिकार होता था। अतः ये सकल्प स्पर्श अवलोकन आदि से ही सृष्टि करने की क्षमता रखते थे।

 

जिस प्रकार सर्वसाधारण लोग जिसे नेत्र समझते हैं वह नेत्र नहीं है, किंतु वह तो अतीन्द्रिय नेत्र इन्द्रिय की अभिव्यक्ति का स्थान गोलक है, इन्द्रिय उससे पृथक् सूक्ष्म वस्तु है। प्रसिद्ध नासिका या कान ही घ्राण और श्रोत्र नहीं, किंतु ये सब तो गोलक हैं। घ्राण, श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ तो अतिसूक्ष्म हैं, वे नेत्रादिके विषय नहीं हैं। फिर भी विशेषरूपसे उनका इन गोलकोंमें प्राकट्य होता है, अतएव कभी जब इन गोलकों के ज्यों-के-त्यों बने रहने पर भी इन्द्रियशक्ति क्षीण हो जाती है, तब दर्शन, श्रवण, आघ्राण आदि नहीं होते। योगियोंको घ्राण, श्रोत्र, नेत्र-सम्बन्ध बिना भी दूरदर्शन-श्रवणादि होते हैं । उसी तरह लौकिक प्रसिद्ध लिङ्ग-योनि आदि केवल गोलक हैं, उनमें व्यक्त होनेवाला योनि-लिङ्ग तो अतीन्द्रिय ही है। वैसे ही प्रजनन-इन्द्रिय, वीर्य, रज आदि भी उसके मुख्य रूप नहीं, किंतु उनसे भी सूक्ष्म, उनमें विशेषरूप से व्यक्त दृक् दृश्य ही शिव और शक्ति हैं।

यद्वा जैसे अतादातमापन लीह पिण्ड में दाहकत्व, प्रकाशकत्व हो सकता है, वैसे ही पुरुष प्रतिबिम्बोपेत ही अचेतन प्रकृति चेतित होकर विश्वका निर्माण करती है। गतिपूजा का भी भाव यही होता है कि अदुग्य की पूजा हो। शालयाम विष्णु की भावना होती है। केवल काल, पाषाण, धातु की पूजा नहीं होती, किंतु मंत्र और विधानों की महिमा से आहूत, सुनिहित व्यापक भावनाभावितदैवतत्व ही मूर्तिमें आराध होता है। व्यष्टि के द्वारा ही प्राणियों के मन में समष्टि भाव समष्टिभाव का आरोहण होता है। अतएव समस्त व्यष्टि लिङ्गों एवं अन्यत्र भी व्यापक शिवततत्वकी समष्टि मृर्ति महादेवलिंगहै। जैसे व्यष्टि नेत्त्रों का अधिष्ठाता समष्टि देव सूर्य है, वैसे ही व्यष्टि प्रजननशक्तियवोमें व्याप्त शिवतत्वका समष्टि स्वरूप शिवलिंग है। जैसे व्यष्टि मंत्र की उपासना न 1. होकर समष्टिनेत्र सूर्यकी ही आराधना होती है और प्रतिमा भी उन्हींकी बनती है, वैसे ही समष्टि शिवमूर्तिकी ही उपासना और प्रतिमा होती है। जैसे जाग्रत, स्वप्नकी उत्पत्ति और लय सौषुप्त तमसे ही होते हैं, वैसे ही तमस सबका उद्भव और उसी सबका लय होता है। धमकी वशम रखकर उसके अधिष्ठाता शिव ही सर्वकारण हैं। कार्याको कारणका पता आद्यन्त नहीं लगता।

 

यह कहा जा चुका है कि समस्त यौनियो का समप्टि रूप प्रकृति है, वही शिवलिङ्गकी पीठ या जलहरी है। योनिमें प्रतिष्ठित लिङ्ग आनन्दप्रधान, आनन्दमय होता है। जैसे समस्त रूपोंका आश्रय चक्षु, समस्त गंधक आश्रय- एकायतन प्राण है, वैसे ही समस्त आनन्दोका एकायतन लिङ्गयोनिरूप उपस्थ है। अतएव, प्रकृतिविशिष्ट दृक रूप परमात्मा आनन्दमय कहलाता है। सुषुष्तिमें भी उसी अंशभूत व्यष्टि आनन्दमयका उपलम्भ होता है। प्रिय, मोद, प्रमोद, आनन्द-ये आनन्दमयके अवयव हैं, शुद्ध ब्रह्म इन सबका आधार है। जब अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी प्रकृति समष्टि योनि है, तब अनन्तब्रह्माण्डनायक परमात्मा ही समष्टि लिङ्ग है। और अनन्त ब्रह्माण्ड-प्रपंच ही उनसे उत्पन्न सृष्टि है। इसीलिये परमप्रकाशमय, अखण्ड, अनन्त शिवतत्त्व ही वास्तविक लिङ्ग है और वह परम प्रकृतिरूप योनि

 

जलहरी में प्रतिष्ठित है। तसी को प्रतिकृति पाषाण मुवी, भातु मुवी जलहरी और रूप में बनाई जाती है।

 

अदीर्थदर्शी अज्ञ प्राणी के लिये सांसारिक सुखों में सर्वाधिक सुख प्रिया-प्रियतम-परिष्यक्ञ-मैथुन में है। अतः उसके उदाहरण से भी श्रुतियों ने अनन्त, अखण्ड परमानन्द ब्रह्म और प्रकृति के आनन्दमय स्वरूप को दिखलाया है। कहीं-कहीं जीवात्मा के परमात्मसम्मिलन सुख को इसी दृष्टान्त-सुख से दिखलाया गया है

 

तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्यवतो

न बाह्य किञ्चन वेद नान्तरम् ।

एवमेवायं घुरुष प्राज्ञेनात्मना सम्यरिष्वक्तो

न बाह्य किञ्चन वेद नान्तरम्।

 

(बृहदारण्यक०४।३।२१)

 

जैसे प्रियतमा के परिरम्भण में कामुक को आनन्दोद्रेक से बाह्य, आभ्यन्तर विश्व विस्मृत होता है, वैसे ही जीव को परमात्मा के सम्मिलन में प्रपंच का विस्मरण होता है। श्रुतियों एवं पुराणों में आध्यात्मिक, आधिदैविक तत्त्वों का ही लौकिक भाषा में वर्णन किया जाता है, जिससे कभी-कभी अज्ञों को उसमें अश्लीलता झलकने लगती है। गोलोकधाम में एक पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ने अकेले अरमण के कारण अपने- आपको दो रूप में प्रकट किया-एक श्याम तेज, दूसरा गौर तेज गौर तेज राधिका में श्यामल तेज कृष्ण से गर्भाधान होने पर महत्तत्वप्रधान हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए। यह भी प्रकृति-पुरुष के संयोग से महत्तत्त्वादि प्रपंच का उत्पत्ति-रूपक कहा गया है।

 

इसी को यों भी समझ सकते हैं-जाग्रत, स्वप्न के अभिमानी विश्व, तैजस और विराट्, हिरण्यगर्भ-ये सभी सावयव हैं। किंतु सर्वलयाधिकरण ईश्वर निरवयव है, वह माया से आवृत होता है। अविद्या के भीतर ही रहनेवाला तो जीव है, परंतु जो अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्' के सिद्धान्तानुसार अविद्या का अतिक्रमणकर स्थित है, वही ईश्वर है। निरावरण तत्त्व शिव है। ईश्वरभाव मायासे आवृत और शिवभाव अनावृत है। माया जलहरी है और उसके भीतर आवृत ईश्वर है, जलहरी के बाहर निकला हुआ शिवलिङ्ग निरावरण ईश्वर है। जिसका पृथक्-पृथक् अंग न व्यक्त हो, वह पिण्ड के ही रूप में रहेगा। सुषुष्ति में प्रतीयमान विशिष्ट आत्मभाव का सूचक पिण्डी है। शिव के सम्बन्ध मात्र से प्रकृति स्वयं विकाररूप में प्रवाहित होती है। इसलिये अर्घा गोल नहीं, किंतु दीर्घ होता है। लिङ्ग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, ऊपर प्रणवात्मक शंकर हैं। लिङ्ग महेश्वर, अर्घा महादेवी हैं

 

मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः ।

रुद्रपुर महादेव प्रणबाख्यः सदाशिवः ।।

लिङ्गबेदी महादेवी लिङ्ग साक्षान्महेश्वरः ।

तयोः सम्पूजनान्नित्यं देवी देवश्च पूजितो ॥

 

(लिङ्गपुराण) चैतन्यरूप लिङ्ग सत्ता और प्रकृतिसे ही ब्रह्माण्डकी रचना हुई और उन्हीं के द्वारा वह प्रलय को भी प्राप्त होगा। शुद्ध मोक्ष के लिये भी उसी की आराधना करनी होगी।

 

यद्वा प्रणव में अकार शिवलिङ्ग है, उकार जलहरी है, मकार शिव-शक्ति का सम्मिलित रूप समझ लिया जाता है। शिव-ब्रह्म का स्थूल आकार विराट् ब्रह्माण्ड है, ब्रह्माण्डके आकारका ही शिवलिङ्ग होता है। निर्गुण ब्रह्म का बोधक होने से यही ब्रह्माण्ड लिङ्ग है अथवा उकार से जलहरी, अकार से पिण्डी और मकार से त्रिगुणात्मक त्रिपुण्ड्र कहा गया है। अथवा निराकार के आकाशरूप आकार, ज्योति स्तम्भाकार तथा ब्रह्माण्डाकार आदि सभी स्वरूपों में शक्तिसहित शिवतत्त्व का ही निवेश है। सर्वरूप, पूर्ण एवं 1 निराकार का आकार अण्ड के आकार का ही होता है। मैदान में से खड़े होकर देखने से पृथिवी पर टिका हुआ आकाश अर्धअण्डाकार ही मालूम होता है। पृथिवी के ऊपर जैसे आकाश है, वैसे ही नीचे भी, दोनों को मिलाने से वह पूर्ण अण्डाकार ही होगा। आत्मा से आकाश की उत्पत्ति है, यही निराकार का ज्ञापक लिङ्ग उसका स्थूल शरीर है। पंचतत्त्वात्मि का प्रकृति उसकी पीठिका है। आकाश भी अमूर्त और निराकार होने से विशेष रूप से तो प्रत्यक्ष होता नहीं, फिर भी वह कुछ है-ऐसा ही निश्चय होता है। उसी का सूचक भावमय गोलाकार है। शिवब्रह्म निराकार होता हुआ भी सब कुछ है, निर्विशेष ही सर्वविशेषरूप होता ही है। चिदाकाश में भी इसी तरह शिवलिङ्गकी भावना है। इसी अण्डाकार रेखा से सब अंक उत्पन्न होते हैं। यही किसी अंक के आगे आकर उसे दशगुना अधिक करता है।

 

ज्योति लिंग का स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिए

 

'नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।' (ऋ० १०। १२९ । १)

 

न सन्न चासच्छिव एव केवलः ।

अर्थात् पहले कुछ भी नहीं था, केवल शिव ही था।

 

सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि ।

नैनमूर्ध्व न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभन् ॥

 

अथर्ववेद)

उसी से विद्युत् पुरुष और फिर उससे निमेषादि काल विभाग उत्पन्न हुए। वही विद्युत् पुरुष ज्योतिर्लिङ्ग हुआ। उसका पार आदि, अन्त, मध्य कहींसे किसी को नहीं मिला। वही 'तदण्डमभवद्धैमं सहस्त्रांशुसमप्रभम् ' (मनु०) है ।

अर्थात् सूर्य के समान परम तेजोमय अण्ड उत्पन्न हुआ। तल्लिङ्गमासंज्ञितं साक्षात् तेजो माहेश्वरं परम् ।

 

तदेव मूल प्रकृतिमारया च गगनात्मिका ॥

 

(शिवपुराण)

 

'शिवपुराण' में लिङ्ग शब्दकी व्युत्पत्ति करते हुए कहा गया है

 

लिङ्गमर्थ हि पुरुष शिवं गमयतीत्यदः ।

शिवशक्त्योश्च चिह्नस्य मेलनं लिङ्गमुच्यते ॥

(शिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता)

 

अर्थात् शिवशक्ति के चिह्न का सम्मेलन ही लिङ्ग है। लिङ्ग में विश्वप्रसूति कर्ता की अर्चा करनी चाहिये। यह परमार्थ शिवतत्त्वका गमक बोधक होनेसे भी लिङ्ग कहलाता है। प्रणव भी भगवान्का ज्ञापक होने से लिङ्ग कहा गया है। पंचाक्षर उसका स्थूल रूप है

 

तदेव लिङ्ग प्रथम प्रणवं सार्वकामिकम्।

सूक्ष्मप्रणवरूपं हि सूक्ष्मरूपं तु निष्कलम् ॥

स्थूललिङ्ग हि सकलं तत्पञ्चाक्षरमुच्यते।

 

( शिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता)

 

माघ कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रिके दिन कोटि सूर्यके समान परम तेजोमय शिवलिङ्गका प्रादुर्भाव हुआ है। 'शिवपुराण' में लिखा है कि एकमात्र शिव ही निर्गुण निराकार होनेसे निष्कल हैं, शेष सभी सगुण विग्रहयुक्त होनेसे सकल कहे जाते हैं। निष्कल होनेसे ही शिव का निराकार (आकारविशेषशून्य) लिङ्ग ही पूज्य होता है, सकल होने से ही अन्य देवताओं का साकार विग्रह पूज्य होता है। शिव सकल, निष्कल दोनों ही हैं, अत उनका निराकार लिङ्ग और साकार स्वरूप दोनों ही पूज्य होते हैं। दूसरे देवता साक्षात् निष्कल ब्रह्मरूप नहीं हैं। अतएव, निराकार लिङ्गरूप में उनकी आराधना नहीं होती।

 

शिवपुराण में निष्कल स्तम्भरूप में ब्रह्मा-विष्णु का विवाद मिटाने के लिये शिव का प्रादुर्भाव वर्णित है। श्रीशिवलिङ्ग से समस्त विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और अन्त में सबका उन्हीं में लय होता है। सबके आश्रय होने से और सबके लय का अधिष्ठान होने से भगवान् ही लिङ्ग कहलाते हैं। अथवा कार्य द्वारा कारणरूपसे लिङ्गित- अवगत होने से ही भगवान् 'लिङ्ग'-शब्द वाच्य हैं। इसलिये जब सब सृष्टि का आधार ही शिवलिङ्ग है, तब तो फिर सर्वत्र शिवलिङ्ग की पूजा पायी जाय, यह ठीक ही है। अत यह कहना कि शिवलिङ्ग की पूजा पहले केवल अनार्य ही करते थे और यह उनकी ही देन है, सर्वथा निराधार है। क्योंकि न तो पहले कोई अनार्य थे और न आर्य ही बाहर से आये। सृष्टि तो ब्रह्मा, कश्यप, इन्द्र आदि देवताओं और मनु आदि प्रजापतियोंसे हुई, जो कि सभी शिवके उपासक एवं आर्य ही थे तथा सभी वेद-पुराण आदिमें भी शिवलिङ्गकी ही महिमा निरूपित है, तो फिर विदेशियोंके अटकलपच्चू इतिहासकी कल्पना भला कौन मान सकता है।

 

दूसरी दृष्टि से कूटस्थ स्थाणु परब्रह्म ही शिव है। श्रीपार्वती शक्ति अपर्णा लता के ससर्ग से यह पुराण स्थाणु कैवल्यपदवी देता है, जो कि कल्पवृक्षों के लिये देना भी अशक्य है। स्थाणु (दूंठ) लिङ्गरूपमें व्यक्त शिव है, अपर्णा जलहरी है। शिवलिङ्गका कुछ अश जलहरीसे ग्रस्त है, यही योनिग्रस्त लिङ्ग है, प्रकृतिसंसृष्ट पुरुषोत्तम है-

 

पीठमम्बामयं सर्वं शिवलिङ्ग च चिन्मयम् । ऊपर महान् अंश योनिबहिर्भूत प्रकृति से असंस्पृष्ट है-

 

'पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।'

प्रकृतिविशिष्ट परम ब्रह्म ही सर्वकर्ता, सर्वफलदाता है, केवल तो उदासीन है। शुद्ध शिवतत्त्व त्रिगुणातीत है, त्रिमूर्त्यन्तर्गत शिव परम बीज, तमोगुणके नियामक हैं। सत्त्व के नियमन की अपेक्षा भी तमका नियमन बहुत कठिन है। सर्वसंहारक तम है, पर उसको भी वश में रखने वाले शिव की विशेषता स्पष्ट ही है।

 

एक दृष्टि से सभी चिह्न 'लिङ्ग' शब्द से ही वाच्य हैं। चिह्न शून्य निर्गुण निराकार निर्विकार ब्रह्म अलिङ्ग है। श्रुतियाँ उसे अशब्द, अस्पर्श अरूप बतलाती हैं। परंतु लिङ्ग का अधिष्ठान मूल वही है। अव्यक्त तत्त्व लिङ्ग है। मायाद्वारा एक ही पर ब्रह्म परमात्मा से ब्रह्माण्डरूप लिङ्ग का प्रादुर्भाव होता है। चौबीस प्रकृति-विकृति, पचीसवाँ पुरुष, छब्बीसवाँ ईश्वर यह सब कुछ लिङ्ग ही है। उसी से ब्रह्म, विष्णु, रुद्र का आविर्भाव होता है। प्रकृतिके सत्त्व, रज, तम-इन तीनों गुणोंसे त्रिकोण योनि बनती है। प्रकृति में स्थित निर्विकारबोधरूप शिवतत्त्व ही लिङ्ग है। इसी को विश्व-तैजस-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ-वैश्वानर जाग्रत् स्वप्न-सुषुष्ति, ऋक्-साम-यजु, परा-पश्यन्ती-मध्यमा आदि विकृतियाँ हैं, जो त्रिकोणपीठों में तुरीय, प्रणव, परा वाक्स्वरूप लिङ्गरूप में संनिहित हैं।

 

अ, उ, म्' इस प्रणवात्मक त्रिकोणमें अर्धमात्रास्वरूप लिङ्ग है। परमेश्वर समष्टि-व्यष्टि लिङ्गरूपसे प्रत्येक योनिमें प्रतिष्ठित होकर पंचकोशात्मक देहोंको उत्पन्न करता है

 

अधितिष्ठति योनि यो योनि वाचैक ईश्वरः ।

देह पञ्चविधं येन तमीशानं पुरातनम्॥

 

लिङ्गपु० २ १८। ३९)

वेद, उपनिषद्, महाभारत, रामायण, पुराण, तन्त्र सर्वत्र ही शिवकी महिमा गायी गयी है। राम, कृष्ण, इन्द्र, वरुण, कुबेर आदि देवादिदेवोंने भी शिवलिङ्गार्चासे सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। भगवान् शंकरने जितेन्द्रिय होनेके कारण कामको ही जला दिया। अत: सबके लिये जितेन्द्रिय होना आवश्यक है। यह भी शिवलिङ्गपूजाका एक उत्कृष्ट शिक्षात्मक दृष्टिकोण है।

 

किसी अवसर में दृग् और दृश्य दोनों एक ही रूप होते हैं

 

[भाग ८६

 

'आसीज्ज्ञानमथो हार्थ एकमेवाविकल्पितम्।

 

(श्रीमद्भा० ११॥२४।२)

 

सृष्टि से पहले ज्ञान और अर्थ ( दृश्य) एकमेव हो रहे थे। दृश्यशक्ति के उद्भव बिना सर्वसंद्रष्टा चिदात्मा भी अपने को असत् ही मानने लगता है

 

मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तद्क् ।

 

(श्रीमद्भा०३।५।२४)

 

वह अन्तर्मुख विमर्शरूप सुप्त शक्ति ही 'माया' पद से कही जाती है

 

सा वा एतस्य संद्रष्टु शक्ति सदसदात्मिका।

माया नाम महाभाग ययेदं निर्ममे विभुः॥

 

निरधिष्ठान शक्ति नहीं और अशक्त अधिष्ठान नहीं अतः उभयस्वरूप ही है। इसीलिये शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव, इस दृष्टि से योनि लिङ्गात्मक एवं लिङ्ग योन्यात्मक है। फिर भी इस द्वैत में अद्वैत तत्त्व अनुस्यूत है। ईश्वर और महाशक्तिकी अधिष्ठानभूत अद्वैतसत्ता भी निरंजन, निष्कलसत्ताके साथ एकीभूत है । यह सृष्टिका बीज होनेपर भी नि स्पन्द शिवमात्र है। अव्यक्त अवस्था अलिङ्गावस्था भी है। इसे महालिङ्गावस्था भी कहा जा सकता है। अव्यक्तसे तेजोमय, ज्योतिर्मय तत्त्व आविर्भूत होता है। वह स्वयं उत्पन्न होनेसे स्वयम्भू लिङ्ग है। वह अव्यक्त अवस्थाका परिचायक होनेसे लिङ्ग है। परमार्थत द्वैतशून्य तत्त्व है। योनि त्रिकोण है, केन्द्र या मध्यविन्दु लिङ्ग है-

 

मूलाधारे त्रिकोणाख्ये इच्छाज्ञानक्रियात्मके।

मध्ये स्वयम्भूलिङ्ग तु कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥

 

(तन्त्रराज)

 

इस बचन में इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक योनि में कोटिसूर्य- समप्रभ स्वयम्भू चिज्ज्योति स्वरूप शिवलिङ्ग माना गया है। मूलाधार आदि षट्चक्र भी योनि ही है। सर्वत्र यही लिङ्ग भी भिन्न-भिन्न रूपमें विराजमान है। योनिसे अतीत र होकर विन्दु अव्यक्त और लिङ्ग अलिङ्ग हो जाता है। कोई गुण, कर्म, द्रव्य बिना योनि-लिङ्गके नहीं बन सकते। प याज्ञिकोंके यहाँ भी वेदीकी स्त्री-रूपमें, कुण्डकी योनिरूपमें और अग्निकी रुद्रलिङ्गरूपमें उपासना होती है। [ क्रमश: ]

 

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साभारः स्वामी श्रीकरधात्रीजी महाराज एवम्  फरवरी 2012 कल्याण

 

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