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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त पुण्डरीक Bhakt Pundrik

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बहुत प्राचीनकाल की बात है। एक धर्मपरायण ब्राह्मण कुल में पुण्डरीक नाम का बालक उत्पन्न हुआ। जन्म से ही उसके मुख पर तेज था। अल्पकाल में ही उसे विद्या में अनुराग हुआ। वेद, शास्त्रा, पुराण छन्द-शास्त्रा आदि का उसने सोलह वर्ष की आयु तक अध्ययन कर लिया। अपने जीवन को वर्ण आश्रम-धर्मानुकूल बनाने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। त्रिकाल संध्या करना, सायं अग्नि होम करना, गुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करना तथा सदैव ही भगवान विष्णु का एकाग्रतापूर्वक चिन्तन करना उसका स्वभाव था। धर्म के विधिपूर्वक अनुष्ठान से पुण्डरीक जी में विरक्ति उत्पन्न हुई। सांसारिक विधियों से असंग होकर उन्होंने माता-पिता, बन्धु-बान्धवों आदि का मोह बन्धन भी तोड़ डाला। उनके हृदय में भगवान का अनन्य प्रेम जाग्रत हुआ। वह अपने सब विधि समृद्ध परिवार को तृणवत् त्याग कर भगवत्प्राप्ति का लक्ष्य लेकर घर से निकल पड़े। लक्ष्य भगवत्प्राप्ति हो, भाव मन के तप से शुद्ध हो गए हों और प्रकाश अर्थात समझ, समय, सामथ्र्य और सामग्री मंे साधक अपनी ओर से कोई भी अभाव न होने दे तो निश्चय ही भगवद्दर्शन हो जाता है। भक्त पुण्डरीक कन्द, मूल, फल, शाक जो मिल जाता उसी से उदर पू£त करते हुए तीर्थटन पर निकल गए। उनका लक्ष्य उदर पू£त नहीं था, भगवत्प्राप्ति था। तीर्थों में विचरते हुए वह शालग्राम नामक स्थान पर पहुँचे। वहाँ पवित्रा जलाशय थे। घने फलदार वृक्षों से घिर वह स्थान किसी प्राचीन ऋषि के आश्रम जैसा ही प्रतीत होता था। तत्त्व ज्ञानियों के निवास से वहाँ का वातावरण सहज ही पवित्रा करने से उनके हृदय में बड़ी शान्ति हुई। भगवद् भजन में तल्लीन होकर वह वहीं एकान्तवास करने लगे। अपने निर्मल उर में प्रभु का दर्शन पाकर वह आनन्दविभोर हो जाते। 
भक्ति की महिमा अनन्त है। संसार सागर से पार कराने के लिए तो वह सुदृढ़ नाव है। पुण्डरीक जी पर भगवान की ऐसी कृपा हुई कि उन्होंने नारद जी को यह आदेश दिया कि ‘मेरे भक्त पुण्डरीक के पास जाकर तुम उनमें भक्तिभाव को और पुष्ट करो।’ नारद जी तो भगवान नारायण के हृदय-स्वरूप ही हैं। पुण्डरीक जी अपने समक्ष एक अत्यन्त तेजस्वी पुरुष को वीणा बजाकर हरि गुणगान करते देख बहुत प्रसन्न हुए। ऐसा देवोपम तेज मनुष्यों में सुलभ कहाँ! पुण्डरीक जी ने उनका परिचय प्राप्त किया। देव£ष नारद जी का नाम सुनते ही तो उनके हर्ष का पारावार नहीं रहा। उन्होंने नारद जी की प्रार्थना करते हुए कहाµ प्रभु! आज मेरी अनेक पीढ़ियों का उद्धार हो गया। आपने कृपापूर्वक दर्शन दिए, इससे बढ़कर और सौभाग्य ही क्या हो सकता है? आप तो भक्त की एकमात्रा गति हैं। मुझ पर दया करके ऐसा उपदेश करें, देव£ष! कि मेरा इस मृत्यु रूपी संसार-सागर से उद्धार हो जाए।” देव£ष नारद ने उस रमणीक तीर्थ में पुण्डरीक को कृपा कर उपदेश किया। उन्हें अव्यक्त, कूटस्थ, सर्व-अन्तर्यामित् भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप का रहस्य समझाया। उन्होंने कहा- “यह विश्व, तेजस, प्राज्ञ-त्रिविध आत्मा नारायण ही हैं। वे ही सबके अधीश्वर और एकमात्रा सनातन देव हैं।” परात्पर पुरुष का विस्तार से विवेचन करने के उपरान्त नारद जी ने कहा “एक ¬ नमो नारायणाम्’ मंत्रा ही समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला है। नारायण-परायण मनुष्य भगवान के परमधाम को प्राप्त कर लेता है।..... मैं हरि भक्तों का दास हूँ। ऐसी सद्बुद्धि तो जन्म-जन्मान्तरों के पश्चात साक्षात् भगवत्कृपा से ही प्राप्त होती है।..... इसलिए सदा-सर्वदा अनन्य भाव से उस सनातन परम पुरुष नारायण का ही स्मरण-कीर्तन करना चाहिए।” देव£ष नारद जी के उपदेश से पुण्डरीक कृतकृत्य हो गए। उनकी भक्ति पुष्ट हो गई। आचरण से अपने को ‘हरि भक्तों का दास’ बताकर वह ‘नारायण’ का अखण्ड जप करने लगे। उनके हृदय-पुण्डरीक पर भगवान विष्णु सदा विराजमान रहने लगे। भगवान की अनोखी कृपा हुई पुण्डरीक पर। भगवान ने अभी तक अपनी दिव्यता से किसी स्थूल देह को कृतार्थ नहीं किया था। पुण्डरीक ही प्रथम महाभागवत हैं जो भगवद्रूप मंे परिणत हो गए। उनका निष्कलंक शरीर नील जलदसम श्याम हो गया, चार भुजाएँ प्रकट हो गईं और शंख, चक्र, गदा, पद्म से अलंकृत हो गईं। पुण्डरीक से वह पुण्डरीकाक्ष हो गए। वन्य प्राणी भी उनके समीप वैर-भाव छोड़कर विचरने लगे। इतना होने पर भगवान अपने उस परमप्रिय भक्त के समक्ष स्वयं प्रकट हो गए। उन करुणासागर के अ¯चत्य स्वरूप का दर्शन कर पुण्डरीक प्रेम-विह्नल हो उनके चरणों में झुक गए और आर्द्रकण्ठ से उनकी प्रार्थना करने लगे। भगवान तो दया के सागर हैं। पुण्डरीक से वरदान माँगने के लिए कहा। पुण्डरीक भगवान की करुणा से विगलित हो बोले- “मैं अबोध हूँ प्रभु! आप करुणासागर हैं, मेरे लिए जो कल्याणकारी हो, आप वही वस्तु मुझे प्रदान करें....”
भगवान ने निःस्पृह भक्त को कण्ठ से लगा लिया। कोमल वाणी में बोले “पुण्डरीक! मेरी लीला के सहयोगी बनो....” पुण्डरीक भगवान के साथ गरुड़ासीन हुए। उन्होंने भगवद्रूप से ही परमधाम को प्रस्थान किया। समस्त कार्यों से सुफल से भगवान विष्णु को उन्होंने प्राप्त कर लिया था।

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