#

#

ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
professional logo

भक्त परमेष्ठी दर्जी Bhakt Parmeshti Darzi

1

अवश्य ही मनुष्य इस जन्म में नीच वर्ण से उच्च वर्ण नहीं बन सकता; परंतु भक्ति के प्र्रताप से भगवत्प्रेम को अथवा भगवान् को प्राप्तकर वह सर्वपूज्य महान् संत बन सकता है। सामाजिक संबंध दूसरी चीज है और भगवान् के साथ जीव का आत्मिक संबंध दूसरी। यह आत्मिक संबंध सभी का है, जो इस संबंध को पहचान कर भगवान् को अपना परम सुहृद्, परम उपास्य, परम गति, परम आश्रम, परम धन, परम पिता जान लेता है, वही भगवान् का जन है। ऐसा भगवज्जन किसी भी जातिका हो, कुछ भी पेशा करता हो, वह अपनी जाति मे रहता हुआ, अपने उसी पेशे के द्वारा भगवान् की पूजा करता है; न उसे जाति बदलने की आवश्यकता है और न पेशा बदलने की। जाति बदली भी नहीं जा सकती। भक्त का प्रत्येक कर्म भगवर्थ होता है और भगवान् के प्रेम में मस्त हुआ वह उसी में परम संतुष्ट और परम तृप्त रहता है। यह हरिभक्तिरूपी कल्पलता जाति, कुल, विद्या और वैभव आदि विषयों में अपने को पहाड़ से भी ऊँचा मानने वाले मनुष्य के हृदय को स्पर्श नहीं करती। यह उसी को प्राप्त होती है जो कैसी भी बाहरी स्थिति में रहकर भी अभिमानशून्य हो। अकि×चनताकी नीची भूमि में ही इसे आनंद मिलता है। यह वहीं अंकुरित होती और फुलती-फलती है। संसार में ऐसे बहुत ही थोड़े मनुष्य हैं जो इस भक्ति कल्प लता की शोभा देखते और इसे प्राप्त करते है। अधिकांश प्राणी तो इसकी कल्पना ही नहीं कर सकते। आज एक भगवत्-रसिक दर्जी की जीवन-कथा लिखी जाती है।
अब से प्रायः चार सौ वर्ष पहले दिल्ली में परमेष्ठी नामक एक दर्जी रहता था। उसका शरीर कुबड़ा और काले रंग का था, पर गुण में वह पूरा था। हृदय में भगवत भक्ति भरी थी और हाथ में कारीगरी। वह सिलाई का काम करता था। उसमें और भी अनेक संतोचित गुण थ। वह शुद्र होने पर भी जितेन्द्रिय था, दरिद्र होने पर भी उदार था, श्रमजीवी होने पर भी सदा आनंद में रहने वाला था। कभी झूठ नहीं बोलता था। जीवहिंसा भूलकर भी नहीं करता था और सारे जगत् में भगवान् वासुदेव को व्याप्त समझकर सबसे प्रेम करता था।
परमेष्ठी भगवान्    की अपार महिमा पर विचार करता-करता कभी प्रेमा वेश में बेसुध हो जाता। कपड़े सीने के समय ऐसी दशा में उसके हाथ में सुई, सूत और कपड़ा ज्यों-का-ज्यों रह जाता। वह देह से मत्र्य लोक में रहने पर भी मन से पवित्रा वैकुण्ठ लोक में विचरता। उसकी आँखों से आसुओं की धारा बहने लगती। इस प्रकार जल में खिले हुए नवीन कमल की भांति घंटों वह निश्चल बैठा रहता।
परमेष्ठी स्त्राी विमला धर्मपरायणा, रूप-गुण-सम्पन्ना तथा बड़ी ही पतिव्रता थी। उसके एक पुत्रा और दो कन्याएँ थी। पुत्रा-कन्याओं में भी माता-पिता के गुण उतर आये थे। इससे परमेष्ठी के मन के तनिक भी सांसारिक अशांति नहीं थी। इस प्रकार यद्यपि उसे समस्त सांसारिक सुख प्राप्त थे तथापि वह उनमें आसक्त नहीं था। भगवान्, भगवदभक्त तथा भगवन्नाम-स्मरण में उसे अपार प्रेीति थी। भगवान् का नाम-संर्कीन तो उसे बहुत ही अच्छा लगता। उसे जब कभी कुछ समय मिलता, वह तुरंत भगवान् के भजन में रत हो जाता। थोड़ा सा अवसर पाते ही वह भगवान् का पवित्रा कीर्तन करने लगता, गाते-गाते उसका गला रुँध आता, वह स्तम्भित होकर पसीने-पसीने हो जाता और उसकी आँखों से आनंदाश्रु की धारा बहने लगती। प्रेम के इन सात्त्विक भावों से उसका शरीर पूर्ण हो जाता। अहा! उस समय उसकी आनंदमयी मूर्ति देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह दर्जी है। उस समय तो सभी लोग उसे धन्यवाद देते, उसकी प्रशंसा करते तथा उसका कृपापात्रा बनने का प्रयत्न करते।
भगवदभक्त होने केे साथ-साथ वह अपने जातीय धन्धे में भी बड़ा दक्ष था। उसके तैयार किये हुए कपड़े जो कोई देखता अवश्य प्रशंसा करता। वह सिलाई का काम इतना महीन और सफाई के साथ करता था कि उस समय उसकी बराबरी का कारीगर दिल्ली शहर में दूसरा नहीं था। इससे शहर के सभी अमीर-उमरा तथा स्वयं बादशाह उससे हर एक प्रकार के कपड़े सिलवाकर उसे मनचाहा इनाम देते थे।
एक बार ऐसा हुआ कि बादशाह के सुवर्णसिंहासन के ऊपर दोनों ओर दो गलीचे बिछाये गय। बादशाह अपने दोनों पैर उनके ऊपर रखकर बैठता। परंतु वह उसको पसंद नहीं आये। इसलिये उसने दो बढ़िया तकिये तैयार कराने केे लिये बेशकीमती कपड़ा बनवाया तथा उसमें सोने के तारे, हीरे, माणिक और मोतही जड़वाये। बादशाह को वह कपड़ा बहुत पंसद आया और वह उसे बारम्बार देखकर मन-ही-मन कारीगर की प्रशंसा करने लगा।
पहले कहा जा चुका है कि परमेष्ठी एकक सुनिपुण दर्जी था और स्वयं बादशाह का उसके ऊपर विश्वास था, इसलिये उसने शीघ्र ही उसेे बुलवा भेजा। परमेष्ठी बादशाह के पास आया और सलाम करके सामने खड़ा हो गया। बादशाह ने उससे कहा कि ‘ओ दर्जी! तू यह वेशकीमती हीरे-मोतियों से जड़ा हुआ कपड़ा ले जा और इसके दो तकिये बना ला, देखना कारीगरी में किसी तरह की कमी न रहने पावे और इसके ऊपर का एक भी फूल दब न जाय। जा, इसे जल्दी तैयार करके ले आ; यदि मुझे तेरा काम पसंद आया तो मै तुझे निहाल कर दूँगा।
परमेष्ठी ‘जहाँपनाह ! जो हुक्म’ कहकर झुककर सलाम किया और वहाँ से घर आया। स्नान-भोजन से फुरसत पाकर वह बादशाह के तकिये सीने बैठा और थोड़े ही समय में उसने दोनों खोल तैयारकर बढ़िया इत्रा की सुगंध भरी रूई उसमें भर दी और तकिये तैयार कर दिये। बहुत ही बढ़िया इत्रा होने के कारण परमेष्ठी का सारा घर सुगंध से भर गया। उसके ऊपर जड़े हुए सोने के तारे और जवाहिरात खिल उठे, हीरे-माणिकों से वह जगमगा उठे। ऐसे तकियों को रखने के लिये परमेष्ठी के घर में स्थान कहाँ था। वह इन्हें शीघ्र बादशाह के यहाँ ले जाने के लिये उठा, परंतु तुरंत ही एक दूसरे नवीन विचार में पड़ गया।
जैसे-जैसे तकियों में मनोहर सुवास आने लगी और जैसे-जैसे उनके ऊपर की हीरे-माणिक की अपूर्व जगमाहट उसकी आँखों में आने लगी, वैसे-ही-वैसे वह सोचने लगा- ‘अहा ! क्या ऐसे अपूर्व तकिये एक सामान्य मनुष्य उपभोग में आने लायक हैं। उसके उपभोग के अधिकारी तो एकमात्रा देवाधिदेव भगवान् वासुदेव ही हैं। अहा! ऐसी वस्तु जो उन्हें अर्पित न हो तो फिर कारीगरी ही किस काम की? परंतु हे  प्रभो! यह मेरी अपनी चीज तो है नहीं, फिर मैं क्या करूँ?’ इस प्रकार विचार करते-करते वह सुध-बुध भूल गया, उसकी देहात्म बुद्धि विलुप्त हो गयी। इन्द्रियाँ भी शांत हो गयीं। अब वह न तो कुछ देखता था; न कुछ सुनता था और न ही कुछ करता ही था। उसका शरीर इस लोक में था, परंतु आत्मा इस मृत्यु लोक के सुख-दुःख से अतीत किसी और ही लोक में पहुँच गयी थी। ऐसी अवस्था में परमेष्ठी एक चमत्कार देखा। कई वर्ष पहले एक बार वह जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा देखेन के लिये गया था, उस समय उसने श्री जगन्नाथ जी के रथ का दर्शन किया था। आज भी वह उसी दर्शन में लीन हो गया। सेवक गण श्री जगन्नाथ जी को लेकर उल्लसित हुए चले जा रहे हैं,  चारों ओर ‘जय-जय हरि’ की ध्वनि छा रही है, आगे- आगे हजारों उजले घोड़े नाचते-कूदते चले जा रहे हैं, सेवकगण आनंदपूर्वक एक के बाद एक वस्त्रा बिछाते चले जा रहे हैं, श्री जगन्नाथ जी एक वस्त्र से दूसरे वस्त्रा पर पधारते हैं, कठिन आघात से बिछाये हुए वस्त्रा फटे जाते हैं।
देवयोग से इसी दिन रथयात्रा-उत्सव का दिन था और जिस समय परमेष्ठी दिल्ली में बैठा-बैठा श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा का दर्शन कर रहा था; ठीक उसी समय श्री जगन्नाथ पुरी में भी श्री जगन्नाथ जी की उपर्युक्त रथयात्रा  चल रही थी। भगवत्कृपा से भावना के आवेश में परमेष्ठी उस लीला में इतना लीन हो गया कि उस समय वह मानो नीलाचल में बैठा हुआ ही प्रभु का दर्शन करता हो।
इतने में नीलाचल में ऐसा हुआ कि श्री जगन्नाथ जी के नीचे बिछाया हुआ एक वस्त्रा फट गया। सेवक दूसरा वस्त्रा लाने के लिए मन्दिर की ओर दौड़े, परंतु उनको लौटने में बहुत विलम्ब हो गया। दिल्ली में बैठे परमेष्ठी इस दृश्य को देखा, उससे रहा नहीं गया, उसने शीघ्र ही अपने पास के दो तकियों में से ऐ श्री जगन्नाथ जी के अर्पण कर दिया। श्री जगन्नाथ जी ने परम प्रीतिपूर्वक उसे स्वीकार किया, इसे देखकर परमेेष्ठी के आंनद का  ठिकाना न रहा। वह प्रभु के पादपद्मों में दंडवत् करके दोनों हाथ जोड़कर उठ खड़ा हुआ और उन्मत्त की भाँति दोनों हाथों को ऊपर उठा नाचने लगे। श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा में बहुत भीड़ हुई है। धक्का-मुक्की हो रही है। इसी में परमेष्ठी लोगों के झुण्ड से कुछ भारी भीड़ में आगे बढ़ भी नहीं सकता था, बस इसी समय अचानक उसकी स्थिति पलट गयी और वह चैतन्यावस्था में आ गया। चैतन्य होते ही आँखें खोलकर देखता है तो कुछ भी नजर नहीं आया। इससे वह गंभीर विचार में पड़ गया, उसे बहुत ही आश्चर्य हुआ ! वह मन-ही-मन विचार करने लगा- ‘अहा ! क्या वह स्वप्न था? नहीं, नही; ऐसा नहीं हो सकता, स्वप्न होता तो मेरे हाथ का एक तकिया कहाँँ चला जाता? अहा ! सर्वान्तर्यामी जगन्नाथ ! क्या तुमने मेरे हृदय की बात जान ली  थी? क्या तुमने एक तकिया स्वीकार कर लिया? अहो ! मेरा कैसा भाग्य ! कैसा सद्भाग्य है !!’
इस प्रकार विचार करते-करते कुछ समय के बाद जब उसको शरीर की सुधि हुई तो उसे आनंद के साथ-ही-साथ कुछ खेद भी होने लगा। वह तुरंत ही विचार ने लगा- ‘अरे ! मैंने यह क्या किया? यह तो बादशाह का तकिया था। उसे बादशाह को न देकर श्री जगन्नाथ जी को दे डाला। मेरा यह कार्य अनधिकार हुआ ! अरे, अब मैं बादशाह को क्या जवाब दूँगा?’ दूसरे ही क्षण उसने सोचा- ‘छिः, भला श्री जगन्नाथ जी के सामने दिल्लीश्वर किस गिनती में है? जब भगवान् ने स्वयं स्वीकार कर लिया, तब कोई दोष नहीं हो सकता।’
इस प्रकार परमेष्ठी आनंद और खेद के संग्राम में झूल रहा था, इसी समय बादशाह के सिपाही उसके घर के सामने आकर पुकारने लगे- ‘अरे दर्जी ! बादशाह के तकिये तैयार हुए कि नहीं? जहाँपनाह ने दोनों तकिये लेकर जल्दी-से-जल्दी बुला लाने को कहा है, इसलिये चल, जल्दी कर।’
‘हाँ-हाँ, हो गये हैं, चलो, चलो।’ कहता हुआ परमेष्ठी बाहर आया और सिपाहियों के साथ एक तकिया लेकर दरबार में आ पहुँचा और दूर से ही बादशाह को सलाम करके बादशाह के पास जाकर एक तकिया वहाँ रख दिया और दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तकिये की कारीगरी देखकर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ, परंतु उसने एक ही तकिया क्यों दिया, यह बात उसकी समझ में नहीं आयी। वह मुसकराता हुआ बोला- ‘भाई ! तू एक ही तकिया कैसे लाय? दूसरे का क्या हुआ? उसे क्या अब तक तैयार नहीं किया? सच-सच बतला।’
परमेष्ठी बादशाह के पैरों में पर गिरकर कहने लगा- ‘जहाँपनाह ! दोनों तकिये तैयार हुए थे, परंतु उनमें से एक नीलाचलनाथ श्री जगन्नाथ ने स्वीकार कर लिया है। इसलिये यह एक ही आपके पास ला सका हूँ। गरीब परवर! मैं कभी झूठ नहीं बोलता’ इस बात को सुनकर बादशाह हँस पड़ा और कुछ रूष्ट-सा होकर बोला- ‘अरे, पागल की तरह क्या बक रहा है? कहाँ वह नीलाचल और कहाँ दिल्ली। तूने यहाँ से तकिया कैसे दिया और उन्होंने वहाँ से उसे कैसे लिया? अरे, क्या तुझे खबर नहीं कि मैं दिल्लीश्वर हूँ? मेरी दिल्ली में आकर मेरा तकिया ले जाय, ऐसा दूसरा कौन है? यह ढोंग-ढाँग छोड़ दे और जो कुछ दूसरी बात हो सच-सच कह दे, नहीं तो तेरा बुरा हाल होगा।’
बादशाह की इस धमकी पर परमेष्ठी हाथ जोड़कर बोला- ‘जहाँपनाह ! मैं सच कह रहा हूँ। एक तकिया नीलाचननाथ श्री जगन्नाथ जी ले गये हैं और दूसरा आपके लिये लाया हूँ। हूजूर ! मैं सच कहता हूँँ। अब आप मुझे मारिये या जिलाइये, यह आपके हाथ में है। परंतु हे गरीबपरवर ! श्री जगन्नाथ जी ने वहाँ से ही तकिया ले लिया, इसमें आपको आश्चर्य ही क्यों हुआ? इसको आपने असंभव क्यों समझा? श्री जगन्नाथ जी इस अखिल विश्व के नाथ हैैं। क्या आपकी यह दिल्ली जगत् के बाहर है? वे विभु हैं। कोई ऐसा स्थान नहीं, जहाँ वे न हों। उनका निवास और उनका धाम भी सर्वदा सर्वत्रा है। तब दिल्ली म ें उन्होंने तकिया ले लिया, इस बात को आप मिथ्या क्यों मान रहे हैं? बल्कि हे बादशाह ! वे प्राणिमात्रा के भीतर व्याप रहे हैं और सबके हृदय की बात को जानते हैं। उसी प्रकार जो अपने शुद्ध अंतः करण से मन के साथ जिस सामग्री को उल्हें अर्पण करने की इच्छा करता है उसे वे परम आनंदपूर्वक ग्रहण करते हैं। जहाँपनाह ! मैं सच कहता हूँ आपका तकिया देखकर मेरा मन बहुत ही व्याकुल हो गया था, उसे देखकर मैं उसे अपने प्रभु को अर्पण करने के  लिये अस्थिर हो उठा था, इसीलिये उन्होंने दया करके उसे स्वीकार कर लिया। हुजूर ! आपके मन में जैसा रुचे वैसा कीजिये, परंतु श्री जगन्नाथ जी ने आपका तकिया स्वीकार किया, इससे आप बहुत ही भाग्यवान् हैं।’
इस पर बादशाह अत्यंत ही ़क्रोधित हो उठा। वह लाल-लाल आँखे किये अत्यन्त कर्कश स्वर में बोला- ‘रे दर्जी ! मैं तुझे अब भी कहता हूँ कि सोच ले। मैं दिल्लीश्वर हूँ। क्या सारे मुल्क की भक्ति एक तेरे-जैसे मलिन दर्जी में ही आ गयी है? अरे कोई है? इस दुष्ट दर्जी को हथकड़ी-बेड़ी डालकर तुरंत अंधेरी कोेठरी में डाल दो और मेरा हुक्म है कि इसे खाने के लिये भी मत दो और इसकी कोठरी का ताला भी मत खोलो। देखता हूँ कि कौन इसका बाप आकर इसे बचाता है। जो जगन्नाथ आकर इसके पास से मेरा तकिया ले गया है, वही आकर इसे बचावेगा और खाना-पीना भी देगा।’
बादशाह के मुँह से इतना निकलते ही पहरेदारों ने आकर परमेष्ठी को पकड़ लिया और हथकड़ी-बेड़ी देकर कैद खाने में ले जाकर एक अँधेरी कोठरी में डाल दिया और उसके बाहर  ताला देकर वहाँ पहरा बैठा दिया। बेचारा परमेष्ठी इस विपदवस्था में एकमात्रा मधुसूदन का ध्यान करने लगा। उसके सामने न कोई दूसरी बात थी और न दूसरा विचार। चिंतामणि के दरबार में यह बात एक पल में पहुँच गयी। भक्त वत्सल तुरंत ही भक्त क रक्षा करने के लिये तैयार हो गये और नीलाचल से दिल्ली शहर आ पहुँचे।
आधी रात बीत गयी है, कैद खाने के पहरेदार अभी जग ही रहे हैं, इसी समय महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी परमेष्ठी के कैद खाने के दरवाजे पर आ पहुँचे। पहरेदारों  को मोह-निद्रा में डालकर भगवान् ने अन्दर प्रवेश किया। परमेष्ठी की कोठरी का द्वार खुल गया, परंतु परमेष्ठी को इसकी क्या खबर; वह तो तन्मय हुआ भगवान् के नाम का चिंतन करता हुआ रुदन कर रहा था। प्रभु ने उस कोठरी में प्रवेश कर अमृतमय स्वर से परमेष्ठी को पुकारा।
अहा हा ! कैसा मीठा, कैसा मधुर था वह स्वर ! अहा ! शिशु के कंठ से पहले-पहल निकला हुआ- ‘बा-बा, मा-मा’ शब्द भी माता-पिता को उतना प्रिय नहीं लगता ! उस सुमधुर स्नेह-सम्बोधन को सुनकर परमेष्ठी चकित हो उठा। वह आश्चर्य पड़ कह उठा- अहा ! इस दानवपुरी में देवताओं के अमृत का संचार कहाँ से हो गया? वह आँखें खोलकर देखता है तो नीलकांतमणि के दिव्य प्रकाश में उसकी अँधियारी कोठरी प्रकाशमयी हो रही है। देखते-ही-देखते उस दिव्य प्रकाश में से श्री जगन्नाथ जी की मूर्ति दिखलायी देने लगी। परमेष्ठी ने अपने चर्म-चक्षुओं से देखा कि उसके प्राणाराध्य प्रभु प्रसन्नता से अपने एक वरदहस्त के द्वारा अभय मुद्रा से उसे अभयदान दे रहे हैं और दूसरे हाथ से सुदर्शन चक्र फेर रहे हैं। सुदर्शनचक्र भी आज अतिशय घोर भीषण स्वरूप धारण कर रहा है और जैसे-जैसे वह घूमता है, जान पड़ता है कि प्रलयाग्नि बरस रही है। प्रभु की कमनीय मूर्ति को देखकर परमेष्ठी परम आंनद में निमग्न हा गया। सचेत होते ही वह भगवान् के चरण कमलों में लोटने लगा और उनके सामने करुणापूर्ण मुखाकृति से रोने लगा। प्रभु की कृपादृष्टि से परमेष्ठी के बंधन टूट गये, आनंद और विस्मय के तरंगों में वह कौन है और यह क्या हो रहा है, इसकी उसे सुधि न रही। उसका शरीर स्तम्भित हो गया, उसकी सारी गति बंद हो गयी। भगवान् से उसकी कोई बात छिपी नहीं थी। भगवान् के बिम्बोष्ठी की धारा में, कमल-नयन के कानों में मिष्ठ-मधुर हास्य के जो परमाणु खेल रहे थे, वह सब एकत्रित होकर मानों एक बड़े फव्वारे के रूप में फूट पड़े। श्री भगवान् एकाएक हँस पड़े और परमेष्ठी को संबोधित करते हुए बोले- ‘परमेष्ठी ! जिसको मेरी सहायता है उसे क्या भय है? देख, देख हे वत्स ! जब तक मेेरे हाथ में यह सुदर्शन चक्र है तब तक भक्त को लेशमात्रा भी भय नहीं हो सकता। दूसरा कोई कितना ही बलवान् क्यांे न हो; पर याद रख कि मेरा भक्त सबसे बड़कर बलवान् है। आ बेटा ! आ, मेरे पास आ !!’
परमेष्ठी उनके पास क्या आता? वह तो उनकी करुणा की विमल धारा के प्रवाह को देखकर अवाक् हो गया और बारम्बार प्रणाम करके रोने लगा। वह अपनी स्वाभाविक दीनता के वश हो मन में विचार करने लगा कि ‘आह ! मैं तो महापापी, महा-अधम हूँ। क्या मैं भगवान् के समीप जाने योग्य हूँ?’
भक्त की दीनता देखकर भक्तवत्सल को विशेष आनन्द हुआ, इससे वे स्वयं उसके पास जाकर अपना वरदहस्त उसके मस्तक पर फेरने लगे। श्री प्रभु के श्री अंग-स्पर्श से परमेष्ठी का अंग-प्रत्यंग अत्यंत सुंदर और मनोहर हो गया और वह आनन्द सागर में निमग्न होकर अपने को और अपने प्रभु को भी भूल गया।
इधर भगवान् भी परमेष्ठी को कृतार्थ और बंधन मुक्त करके बादशाह के शयन मन्दिर में जाकर उसे स्वप्न में ताड़न करके श्री नीलाचल चले गये। तुरंत ही बादशाह उठ बैठा। उसने चारों ओर देखा, परंतु कोई दिखायी नहीं दिया, इससे वह चकित हो विचारने लगा- ‘अरे क्या यह स्वप्न है? नहीं, ऐसा किस प्रकार कहा जा सकता है? मेरा अंग अभीतक धूज रहा है। उसके किये प्रहार के चिन्ह अब तक दिखायी देते हैं। अहा ! यहाँ से वह क्या हो गया? आश्चर्य ! आश्चर्य !! यह तो बड़ी ही विलक्षण घटना दीख पड़ती है !!!’
क्रमशः प्रभात हुआ, बादशाह को चैन कहाँ? उसने तुरंत ही अपने विश्वासी मित्रों को बुलवाया और उनसे अपने स्वप्न की बात कह सुनायी। उसके बाद सभी कैद खाने पहुँचे। जाकर क्या देखते हैं कि सभी पहरेदार अभी निद्रा में पड़े हुए हैं और सभी दरवाजे खुले हुए हैं। परमेष्ठी के हाथ-पैर में बंधन नहीं है। उसका वह रूप भी नहीं है। उसके शरीर से दिव्य प्रकाश चमक रहा है। मुखमंडल में अपूर्व लावण्य झलक रहा है और वह प्रसन्नतापूर्वक अपने प्राणाराम के ध्यान में मग्न है।
परमेष्ठी जब ध्यान टूटा तो वह अपने प्रभु कोे न देखकर बहुत ही व्याकुल हो गया और प्रभु का नाम रटन करने लगा।
परमेष्ठी यह अवस्था देखकर दिल्ली पति को बहुत ही आश्चर्य हुआ। उसके बाद वह उसे नाना प्रकार से प्रसन्न करने लगा तथा अमूल्य वस्त्राभूषणों से उसे विभूषित कर अपने खास हाथी पर बैठाकर बाजे-गाजे के साथ शहर में ले गया। पश्चात् बहुत- सा धन-रत्न देकर उससे क्षमा माँगी। अब बादशाह ने अपने को धन्य माना। इस अलौकिक घटना को सुनकर सब मनुष्य आश्चर्य चकित हो उठे। भक्त की जय-जय-ध्वनि से सारा शहर गूँज उठा, परंतु यह मान-सम्मान प्रतिष्ठा के भय से वह तुरंत ही दिल्ली शहर को छोड़कर दूसरे देश को चला गया एवं भगवान् के भजन-पूजन में जीवन व्यतीत करता हुआ अंत में परम गति को प्राप्त हुआ।
बोलो भक्त और उनके भगवान् की जय !

परमेष्ठी        भगवत्कृपा से कृतकृत्य
गीता में श्री भगवान का वचन हैः पत्रां पुष्पं तोयं योमे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतम श्नामि प्रयतात्मनः।।7/26
”जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्रा, पुष्प, फल, जल आदि (साधारण मनुष्य को भी बिना परिश्रम के प्राप्त) अर्पण करता है उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ, वह पत्रा-पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ।” इस लोक में ‘यः’ पद के प्रयोग से भगवान ने यह स्पष्ट किया है कि बल, रूप, धन, आयु, जाति, गुण और विद्या आदि के कारण उनकी किसी में भेद-बुद्धि नहीं है। किसी भी वर्ण, आश्रम, जाति का कोई भी मनुष्य उन्हें सर्वथा शुद्ध और प्रेमपूर्ण भाव से जो अ£पत करता है, उसे वह कृपालु अवश्य ग्रहण करते हैं।
भगवान जगन्नाथ जी के निष्काम प्रेमी भक्त परमेष्ठी दर्जी के जीवन में यही सत्य कृपा बनकर उद्घाटित हुआ। लगभग चार सौ-साड़े चार सौ वर्ष पूर्व परमेष्ठी जी दिल्ली महानगरी में रहा करते थे। रंग काला, कमर में कूबड़, जन्म से शूद्र और धन से हीन। पर इतने अवगुणों (?) के होते हुए भी भगवान की निष्काम भक्ति के महान् गुण से अलंकृत। घर में साध्वी पत्नी विमला, एक सदाचारी पुत्रा और दो गुणवती कन्याएँ थीं। जीविका के लिए अपनी कुशल कारीगरी से वह निर्वाह मात्रा साधन जुटा लेते थे। अधिक की तृष्णा न थी। एक बार परमेष्ठी रथ-यात्रा के उत्सव पर अपने इष्टदेव की नगरी जगन्नाथपुरी जाकर भगवान के दर्शन कर आये थे। तब से वह प्रायः अपने प्रभु के स्मरण भजन-समाधि में चले जाते। हाथ जहाँ के तहाँ रुक जाते, देह अचल हो जाती, नेत्रों में अश्रुप्रवाह होने लगता और उन्हें किसी भी सांसारिक कार्य-कलाप की सुधि न रहती। बस, उन्हें यही अनुभव होता कि उस त्रिलोकीनाथ की गरिमामयी रथ-यात्रा में वह भी भाव-विभोर हुए कीर्तन कर रहे हैं और भक्तों पर अमृत वर्षा करते हुए भगवान जगन्नाथ की रथ-यात्रा हो रही है। सर्वत्रा तुमुल कीर्तन घोष के मध्य जगन्नाथ जी का ही भव्य दर्शन हो रहा है। 
परमेष्ठी जी की सत्यनिष्ठा और कार्यकुशलता से तत्कालीन बादशाह भी अत्यन्त प्रभावित था। एक समय ऐसा संयोग हुआ कि बादशाह ने बहुमूल्य उन्नावी मखमल पर सोने की तारों से कसीदाकारी करवाई और उसे बहुमूल्य रत्नों से रचित कर इत्रों से सुगंधित करवाया। उसने वह अलंकार-मंडित मखमल परमेष्ठी जी को सौंपते हुए, दो तकिये बनाने का आदेश दिया। पूरी निष्ठा के साथ परमेष्ठी ने तकिये बनाने आरम्भ किए। पर जैसे-जैसे वह रत्नजड़ित सुगंधों से सुवासित मखमल तकिये का स्वरूप लेने लगी, वैसे-वैसे ही परमेष्ठी जी भगवान के ध्यान में निमग्न हो गए और वह संकल्प करने लगे कि ऐसे उत्तमोत्तम तकिये तो श्री भगवान के ही अनुरूप हैं, किसी मनुष्य के लिए यह उपयुक्त नहीं। संयोग ऐसा हुआ कि तभी रथ-यात्रा उत्सव का दिन आया और परमेष्ठी अपनी भाव समाधि में अपने इष्टदेव का दर्शन करते हुए प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि भगवान की रथ-यात्रा हो रही है। सहòांे नर-नारियों के मध्य परमेष्ठी स्वयं भी भगवन की कीर्तन कर रहे हैं। सहसा रथ के कठोर आघात से श्री जगन्नाथ जी के नीचे बिछी हुई दुग्धश्वेत चादर उन्हंे पघारते समय फट गई। पुजारी मंदिर से दूसरा वस्त्रा लेने दौड़े। पर अनन्य भक्त से प्रभु की तनिक-सी भी असुविधा सहन नहीं हुई। उसने एक तकिया तुरन्त अपने प्रभु को अ£पत कर दिया। प्रभु ने कृपा कर वह भेंट स्वीकार की। परमेष्ठी के हर्ष का पारावार नहीं रहा। वह सुध-बुध भूलकर नाचने लगे। इसी स्थिति में भीड़ की धक्का-मुक्की से वह पीछे पड़ गए और प्रभु का भव्य दर्शन विलुप्त हो गया। एक व्यवधान के साथ समाधि टूट गई। प्रभु की कैसी विलक्षण कृपा है। उनका वचन हैः-
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतो क्षिशिरीमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य निष्ठति।।13/13
वह सर्वव्यापक है, सब ओर हाथ पैर वाले, सब ओर नेत्रा, मुख और सिर वाले और सब ओर कान वालेे हैं, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। उन्हें कोई भी वस्तु कहीं से भी समर्पण की जाय वह वहाँ से उसे ग्रहण करने में समर्थ हैं। उधर वास्तव में श्री जगन्नाथ जी के नीचे बिछा हुआ वस्त्रा फट गया था और पुजारियों ने देखा कि किसी अज्ञात भक्त ने एक मूल्यवान रत्नजड़ित तकिया भगवान को अ£पत किया है। नियत समय पर बादशाह के सिपाही जब परमेष्ठी को बुलाने आए तो वह एक ही तकिया लेकर दरबार में उपस्थित हो गए। राजा ने सोचा भी  न था कि परमेष्ठी जैसा सत्यनिष्ठ दर्जी इस प्रकार सहसा बेईमान हो जायेगा। बादशाह के बार-बार पूछने पर भी परमेष्ठी ने निश्छल भाव से यही उत्तर दिया कि मैंने एक तकिया श्री जगन्नाथ को भेंट कर दिया है। राजा को क्रोध हो आया और ऐेसे मूल्यवान तकिये की चोरी के अपराध में उसने परम

© 2018 - All Rights Reserved