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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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भक्त नारायणदास Bhakt Narayan Dass 

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जिन्होंने उन अशरणशरण को अपना सब कुछ सम£पत कर दिया है, उन परमनिष्ठ भक्तों पर कोमलचित प्रभु राघवेन्द्र अक्षय कृपा करते हैं। बहुत समय की बात है, बंगाल में राजा की£त चन्द्र के शासनकाल में एक वैभव सम्पन्न भक्त नारायणदास और उनकी पत्नी मालती देवी रहते थे। उनका निवास गंगा तट पर ही था। गंगा के तट का सामीप्य तो वैसे ही पवित्रा करने वाला होता है, फिर नारायणदास तो बड़े श्रद्धालु थे। भगवान कोसलेन्द्र की भक्ति उन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई थी। वह इतनी सरलता का जीवन यापन करते थे कि उस बस्ती में उनके समान दीन दूसरा कोई दिखाई नहीं देता था। भगवान की उन पर पूर्ण कृपा था, उनके समान दीन-हितकारी और है भी कौन! उनकी पत्नी भी साध्वी पति-परायण और भक्ति की प्रतिमू£त थी। दैवयोग से वे निःसंतान थे। वृद्धावस्था आने पर उन्होंने जीवन का शेष भाग भगवान राम के दरबार में व्यतीत करने के उद्देश्य से अयोध्या जाने का संकल्प किया। गृहस्थ की कुछ आवश्यक सामग्री बैलगाड़ी पर लादकर उन्होंने शीघ्र ही यात्रा भी प्रारम्भ कर दी। अत्यन्त दीन भाव को स्वीकार कर उन्होंने अपने साथ कोई सेवक भी नहीं लिया। उन्होंने कहाµ “धनुर्धारी भगवान जब हर समय हमारे साथ हैं तो फिर किसी को साथ लेने की क्या आवश्यकता। उन्होंने चित्राकूट से अयोध्या तक भगवान के वनगमन- पथ का अनुगमन करने की पवित्रा भावना से पहले चित्राकूट पड़ाव डाला। हर स्थल पर भगवान राम की लीला का स्मरण-चिन्तन करते हुए वे पति-पत्नी अपना जीवन प्रभुमय ही बना चुके थे। सत्संग, भजन-कीर्तन, दान-पुण्य, व्रत-स्नान से उनका जीवन तप गया था। चित्राकूट में कुछ समय प्रेमाकुलता से व्यतीत करने के पश्चात् वे अयोध्या के लिए चल पड़े। 
मार्ग में भयंकर वन था। ¯हò पशुओं का भी भय था। पर उनके परम आराध्य अयोध्या नरेश तो उनके साथ ही थे। एक स्थान पर उन्हें चैर्य कर्म करने वाले भीलों ने घेर लिया। अपना वास्तविक रूप प्रकट न करते हुए उन्होंने नारायणदास जी को विश्वास दिलाया कि वे भी अयोध्या ही जा रहे हैं और उन्हें मार्ग में कोई कष्ट नहीं होने देंगे। नारायणदास जी ने सोचाµ “इनके वंशजों पर तो भगवान राम ने कृपा की थी। हो-न-हो, यह उन्हीं दशरथसुअन की अनुकम्पा है कि इस गहन वन में हमें इनका साथ मिल गया।” परन्तु साधु-मना नारायणदास जी का यह निष्कपट भाव भीलों के कुटिल हृदयों पर क्या प्रभाव डालता? घोर वन में ले जाकर वे भील नारायणदास जी को अकेले एक स्थान पर पकड़ कर ले गए। पीट-पीटकर मू£छत कर दिया। कुएँ में डालकर ऊपर से पत्थर फेंक दिए। उन्होंने नारायणदास जी का सारा धन, बर्तन, खाद्य सामग्री सभी कुछ लूटने का कुचक बनाया था। उन्हें मृत समझ कर अब वे मालती देवी पर प्रहार करने वाले थे। पति की दुर्दशा का अनुमान लगा कर मालती देवी आर्तभाव से भगवान श्री राम को पुकारने लगीµ “हे असुरारि! हम तो आपके संरक्षण में ही अयोध्या जा रहे थे। हे दीनदयाल, अपना विरुद संभारो। राक्षसों से हमें त्राण दो।.... हे कृपानन्द-संदोह! शीघ्रता कीजिए, अन्यथा यह मुझ अबला पर अत्याचार करेंगे। हे करुणा सिंधु! मेरे पतिदेव को जीवन दान दीजिए।....”
अयोध्या नरेश से साध्वी मालती देवी की यह करुण पुकार सुनी नहीं गई। तभी भीलों को घोड़ों की टाप का स्वर सुनाई दिया। दूर दिशा में धूल उड़ती दिखाई दी। वे डर गए। सब कुछ वहीं छोड़कर भागे। किसी को ठोकर लगी, किसी की आँखों में अंधेरा छा गया। गिरे और हाथ-पाँव तोड़ बैठे। मालती देवी ने देखा एक धवल श्वेत अश्व पर एक किशोरवय का धनुर्धारी राजकुमार वहाँ उपस्थित हो गया है। उसके माथे पर केसर का तिलक है, शीश पर रत्न-जड़ित मुकुट है, वक्षस्थल पर मणियों के हार हैं। श्यामवर्ण और नील जलद की-सी आभा। मालती देवी को रोमांच हो आया। धनुधारी राजकुमार ने सांत्वना भरे अमृत से मधुर शब्दों में पूछाµ “माता! तुम इस घोर वन में क्या करने आई हो? कौन हो?....” मालती देवी को क्या पता कि जिसके वियोग में वे दिन-रात राम-राम जपते हुए वेगभूमि से अयोध्या नगरी आ रही है, वह त्रिभुवन पति राम उसके समक्ष ही खड़े हैं। बड़ी दीनता से मालती देवी ने अपनी यात्रा वृत्तान्त सुनाकर कहा, “राजकुमार! उन दुष्टों ने मेरे पति के प्राण हर लिए हैं, तुम शीघ्र एक चिता बना दो। मुझसे उनका वियोग नहीं सहा जाता।...”
“माता जी! आप धैर्य रखें। आपके पति जीवित हैं। मैंने पीछे एक कुएँ से यह शब्द सुने थे... ‘हाय! मालती, हम अयोध्या पहुँच कर भगवान राघवेन्द्र के पुण्य दर्शन भी नहीं कर पाए।’ यह निश्चित ही आपके पति नारायण दास जी का स्वर होगा। मैं उन्हें अभी कुएँ से निकालने का उपाय करता हूँ।.....“ उन धनुर्धारी राजकुमार की भृकुटि के संकेत पर तो सारे ब्रह्माण्डों का शासन चलता है। कुएँ से अपने भक्त का उद्धार करने में उन्हें क्या समय लगता। कुएँ से बाहर आते ही नारायणदास को अपनी सारी पीड़ा कपूर की भाँति उड़ गई प्रतीत हुई। अपने सामने कौस्तुभमणिधारी, पीताम्बर पहने हुए, रत्नों से अलंकृत खड़े श्यामवर्ण युवराज को पहचानने में भला नारायणदास देर करते? वह सुध-बुध भूलकर अपने परम अभीष्ट भगवान राघवेन्द्र के चरणों में लेट गए और अश्रु बहाने लगे। दोनों पति-पत्नी सीतापति श्रीराम का दिव्य दर्शन कर कृतार्थ हो गए। अयोध्या पहुँच कर उन्होंने सरयू तट पर पर्णकुटी बनाई और अपना शेष जीवन उसी अयोध्या में बिता दिया जिसकी महिमा स्वयं श्री राम ने गाई है। 


 

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