Mayurdhawaj Bhakt भक्त मयूरध्वज       

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श्रीमद्भागवत में भगवान का वचन है
“अहं भक्तपराधीनों ह्रस्वतन्त्रा इव द्विज। साधुभिग्र्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजन प्रियः।।(6/4/63)
सुदर्शनचक्र से व्याकुल हुए दुर्वासा ऋषि से विष्णु भगवान ने कहा, ‘हे द्विज! मैं पराधीन के समान भक्तों के वश मंे हूँ। मुझ भक्तवत्सल का चित्त मेरे साधु भक्तों ने बाँध रखा है।’ भगवान की कृपालुता का यह एक अनिर्वचनीय स्वरूप है। भक्तवश होकर एक ओर तो वह युधिष्ठिर महाराज के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की रक्षार्थ अर्जुन के साथ-साथ गये, दूसरी ओर भक्त राजा मयूरध्वज को भी अपनी कृपा से निहाल करने के लिये उन्हांेने ब्राह्मणवेश धारण कर दिव्य लीला की। प्रसंग इस प्रकार हैµ
जिस समय द्वापर के अन्त में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ युधिष्ठिर महाराज के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े के साथ मणिपुर प्रदेश् में पहुँचे, उसी समय रत्नपुर के राजा मयूरध्वज के अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा भी युवराज ताम्रध्वज के संरक्षण में उसी प्रदेश में विचरण कर रहा था। राजा मयूर-ध्वज धर्मात्मा, प्रजापालक और भगवान के अमानी भक्त थे। वे केवल भगवत्प्रीत्यर्थ ही यज्ञ किया करते थे। अर्जुन को अपनी वीरता और भगवद्-भक्ति पर ¯कचित अभिमान हो गया था। भगवान की कृपा का ही एक स्वरूप यह भी है कि जन अभिमान राख जनि काऊ। भक्त का अभिमान वह नहीं रखते। उन्हीं की प्रेरणा से ताम्रध्वज ने उन्हें व अर्जुन को युद्ध में मू£छत कर दिया और उनका अवश्मेघ यज्ञ का धोड़ा लेकर अपनी राजधानी में लौट आया। मयूरध्वज पुत्रा के इस कृत्य से प्रसन्न नहीं हुये। उन्होंने कहाµ ‘भगवान का दर्शन पाकर भी उन्हें छोड़कर तुम घोड़ा ले आये, यह बुद्धिमानी नहीं की। हम श्रीकृष्ण को छोड़कर यज्ञ पूर्ण नहीं कर सकते।’ मयूरध्वज किसी लौकिक सिद्धि के लिये तो यज्ञ करते नहीं थे। भगवान की इस ‘लीलामय पराजय’ से भी उन्हें गहरा क्षोभ हुआ। 
उधर कुछ समय पश्चात् ही जब अर्जुन की मूच्र्छा टूटी और वह यज्ञअश्व के लिये चिन्तित हुए तो भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया। स्वयं ब्राह्मण बने और अर्जुन को अपना शिष्य बनाकर मयूरध्वज की यज्ञशाला में जा उपस्थित हुऐ। भगवान चाहे किसी भी वेश में प्रकट हों, उनका दिव्य तेज उनके सच्चे भक्त से छुपा नहीं रहता। मयूरध्वज ने ब्राह्मण वेशधारी भगवान के दिव्य तेज और प्रभाव को देखकर जैसे ही उन्हें दण्डवत् प्रणाम करना चाहा, उन्होंने ‘स्वस्ति’ कहकर आशीर्वाद दे दिया। मयूरध्वज को यह भी विचित्रा मालूम दिया। उन्होंने कह, ‘ब्राह्मन! आपने नमस्कार से पूर्व ही ‘स्वस्ति’ कहकर मर्यादानुकूल आचारण नहीं किया, फिर भी मेरे योग्य सेवा तो बताइये!’ ब्राह्मण देवता बोले, “मैं अपने पुत्रा के साथ इस ओर से जा रहा था। मार्ग में भयानक वन पड़ता है। वहीं एक सिंह ने मेरे पुत्रा को आहार बनाने के लिये पकड़ लिया। मैं स्वयं उसका आहार बनने को तैयार था, पर उसने मेरा पुत्रा न छोड़ा। राजन्! मैं बहुत गिड़गिड़ाया, तब कहीं उसने एक शर्त रखी। उसकी शर्त आप ही पूरी करने में सक्षम हैं। आप मुझे मुँह माँगी वस्तु दें तो मेरे पुत्रा की प्राण रक्षा हो।’ 
मयूरध्वज यज्ञशाला में आये याचक ब्राह्मण को निराश कैसे करते। उन्होंने कहा, “ब्राह्मन! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ। आप अपनी इच्छित वस्तु माँगें, मैं सहर्ष दूँगा।’ ब्राह्मण वेशधारी भगवान बोलेµ ‘सिंह की शर्त है कि राजा मयूरध्वज का पुत्रा और उनकी रानी आरे से उनका दायाँ भाग काटकर दें तो मैं आपका पुत्रा छोड़ दूँ।” मयूरध्वज की सारी सभा और शिष्य बने अर्जुन वह सुनकर हतप्रभ रह गये। पर राजा मयूरध्वज ने तो सच्चे भगवद्भक्त की समता प्राप्त की थी। वह दो खम्भों के बीच बैठ गये और आरे से अपना दायाँ भाग काटने की आज्ञा की। रानी और युवराज ने अपने-अपने शरीर कटवा कर देने का प्रस्ताव किया। परन्तु सिंह की शर्त के अनुसार राजा मयूरध्वज ने अपना दाहिना अंग कटवाना ही स्वीकार किया। पूर्ण स्तब्धता के बीच जब राजा का पुत्रा और उनकी रानी आरा चलाने लगे तब मयूरध्वज की बांयी आँख से आँसू टपक पड़ा। ब्राह्मण देवता बोले, “आप दुःखी हैं, तो मैं ऐसा दान कैसे स्वीकार करूँगा?” मयूरध्वज उसी प्रकार प्रसन्नचित्त से कहने लगे, ‘प्रभु! बायां अंग तो अपना दुःख इसलिये प्रकट कर रहा है कि ब्राह्मण देवता के काम नहीं आया। आपको दाहिना अंग देने का मुझे कोई क्लेश नहीं।’ वास्तव में मयूरध्वज तो सब साधुओं, प्राणियों पदार्थों मेंµ ‘वासुदवेः सर्वमिति’ के अनुसार भगवान का ही दर्शन करते थे। शरीर भी तो भगवान का ही था। उनकी वस्तु उन्हें ही अ£पत करने में कैसा क्लेश? रुका हुआ आरा फिर चलने लगा। मयूरध्वज ने गोविन्द, मुकुन्द, माधव’ नामों से एकाग्रचित्त हो भगवान स्मरण किया। उस समय उन्हें समाधिस्थ योगी की भाँति शरीर की भी सुधि नहीं रही। भक्त का विशुद्धभाव देखकर भगवान का हृदय द्रवित हो आया और अर्जुन का अभिमान विगलित! तभी भगवान ने अपने आपको शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी चतुर्भुज विष्णु रूप में प्रकट कर दिया। जैसे ही कृपानिधि ने मयूरध्वज के शरीर को अभयदान देते हुये स्पर्श किया, वह अपेक्षाकृत हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर और दिव्य हो गया। भगवान के आग्रह करने पर मयूरध्वज ने वर माँगाµ “हे कृपालु! अब किसी भक्त की ऐसी परीक्षा नहीं लें। मुझे तो आपके चरणों में अविचल प्रेम के अतिरिक्त कुछ और नहीं चाहिये।” भगवान ने उन पर अनुग्रह किया। अब अर्जुन भी अपने वेश में प्रकट होकर राजा मयूरध्वज के चरणों में गिर गये। उनका गर्व भी इस अद्भुत भगवत्कृपा से नष्ट हो गया था। भगवान ने तीन दिन राजा का आतिथ्य स्वीकार किया, तत्पश्चात् वे घोड़ा लेकर अर्जुन के साथ लौट गये। राजा मयूरध्वज अब आठों याम भगवत्प्रेम में निमग्न रहने लगे। वास्तव में तो भगवान ने यज्ञशाला में प्रकट होकर राजा मयूरध्वज की मनोकामना ही पूरी की थी।

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