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ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
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रावणपत्नी मन्दोदरी mandhodhari

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त्रिपुरनिर्माता, दानवराज मय ने अप्सरा हेमा से परिणय किया।अप्सरा कब तक आनवपुरी में रहेगी। देपताओं के आह्नान पर वह स्र्वग वापस चली गयी। उनकी एक पुत्री थी जिसको वह मय के समीप छोड़ गयी। मय ने पुत्री का नाम मन्दोदरी रखा। मय का सारा स्नेह पुत्री में केन्द्रित हो गया। स्वर्णपुरी में उन्हें विश्राम नहीं मिलता था। इसलिए वह हमेषा इधर-उधर घूमते रहते थे। अपनी कन्या मन्दोदरी को वे सदा अपने साथ ही रखते थे।
एक बार मय अपनी कन्या को लिये पृथ्वी पर एक जगंल में घूम रहा था। मन्दोदरी उस वक्त पंद्रहवें वर्ष की आयु की थी। अकस्मात् उनकी श्ेंट राक्षस राज रावण से हो गई। राक्षस राज रावण श्ी उस समय अविवाहित थे। दानवेन्द्र और राक्षसेन्द्र का परस्पर परिचय हुआ। दोनो ने अपने अपने वंषो का परिचय दिया। पितामह ब्रह्मा के प्रपौत्र रावण ने अपने वंष का परिचय देकर मय से उनकी कन्या का हाथ माँगा। दानवेन्द्र को सुयोग्य पात्र मिला। उन्होने वहीं रावण को विधिवत् कन्यादान किया। दहेज  में अनेक दिव्यास्त्र तथा अमोघ षक्ति दर। इस प्रकार मन्दोदरी रावण की पटरानी बनी। मन्दोदरी रावण की हमेषा ही सर्वप्रधान तथा सब से प्रिय रानी रही। मन्दोदरी ने सदा रावण का कल्याण चाहा और उसे सदा सत्पथ पर बनाये रखने के प्रयत्न में रही। उसने रावण के दुष्कृत्यां का सदा नम्रतापूर्वक विरोध किया।
मन्दोदरी को सतीत्व का उधारण के रूप में माना जाता है। सतीत्व स्वयं एक महासाधन है और उससे समस्त सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती है। ऐसा ही मन्दोदरी के साथ श्ी हुआ। मन्दोदरी के सतीत्व ने उसके हृदय में स्वयं यह प्रकाष प्रकट कर दिया कि परम परमेष्वर पुरुषोत्तम का अवतार श्री राम के रूप में अयोध्या में हो चुका है।
जब रावण ने छल से श्री जनकनन्दिनी का हरण किया, तब मन्दोदरी ने बड़ी नम्रता एवं षिष्टतापूर्वक तरीके से रावण को समझाया- ‘नाथ! श्री राम मनुष्य नही है ; वे सर्वेष्वर, सर्वसमर्थ, सच्चिदानन्दघन साक्षात् परम पूरुष हैं। उनका अनादार मत करें। वैदेही साक्षत् जगज्जननी योगमाया है यह वैर आपके लिये योग्य नहीं । श्री जनकनन्दिनी को श्री राम के समीप पहुँचा दें। लंका का राज्य मेंघनाद को दे दें। हम दोनों वनमें कहीं जाकर श्गवान का ध्यान करें वे करुणामय अवष्य हम पर कृपा करेंगे।
एक- दो बार नहीं, अनेक बार चरण पकड़ कर मन्दोदरी ने पति को समझाया। जब श्ी लंकेष्वर अन्तःपुरी में जाता, यह साध्वी उससे आग्रहपूर्वक प्रार्थना करती। पूरी रात्रि अनुनय एवं उपदेष में व्यतीत हो जाती। रावण कभी श्ी मन्दोदरी का तिरस्कार न कर सका। वह हँसकर टाल जाता या उठकर चल देता। वह जानता था कि पत्नी सच्चे ॉदय से उसका कल्याण चाहती है। मन्दोदरी का बेटा मेघनाथ विष्व विख्यात योद्धा माना जाता था।

जो होना था, हो गया। सर्वात्मा के संकल्प में बाधा देना सम्भव नहीं। श्री रामजी पृथ्वी का भार दूर करने के लिये आये थे। उन्हें तो रावण- वध करना ही था। रणक्षेत्र में दषानन के षव पर रोती-बिलखती मयपुत्री को उन्हांेने कृपा की दृष्टि से देखा। षुद्ध हृदय पर श्गवत्कृपा हुई। माया का आवरण छित्र्ा हो गया। कहाँ का षोक और कैसा मोह।


 

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