#

#

ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्य एक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥ 7 ॥            You are the Supreme Brahman, infinite, yet hidden in the hearts of all creatures. You pervade everything. They, who know You, are free from the cycle of birth, death and rebirth. (Svetasvatara 3 : 7)            परमात्मा सब प्रकार से सब काल में मुक्त और शुद्ध है। वह अपरिमित और अनन्त होते हुए भी सभी प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है। परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।

अज़ छि ज़्येठॖ ॴठम 30.05.2020 ज़्येठॖ (जेष्ठ) ज़ूनॖ पछॖ (शुक्ल पक्ष) ॴठम (अष्टमी) बटॖवार (शनिवार/शनिश्चरवार) श्री सप्तर्षि सम्वत 5096, राश सिंह (चलान) ....Today is Jyesth Maas Shukla Paksh Ashtamiyaam Shanivsasre sanayitaam. Kashmiri Pandit Nirvasan Samvat_31 Sapthrishi Samvat _5096
professional logo

लंगड़ा भक्त Langdha Bhakt

1

अपाहिज लंगड़ा भक्त बैसाखियों के सहारे गोवर्धन की परिक्रमा कर रहा था और मार्ग पर खटखट करता हुआ बैसाखी की हर ध्वनि के साथ भक्तवत्सल से अपनी अनगिनत व्यथाओं को मन-ही-मन कहता जा रहा था। पता नहीं वो कितने वर्षों से गोवर्धन की परिक्रमा करता आ रहा था। उसके भाई उसको भार मानते और उनकी पत्नियां सदा उसका अनादर करती रहती थीं। भक्त की परिक्रमाओं की गिनती और श्रद्धा बढ़ती चली गई और साथ-साथ परिवार वाले उससे ऊबते गये। एक दिन लंगड़े भक्त को उसके भाईयों ने बिना कुछ दिये धक्के मार कर घर से बाहर निकाल दिया। उसके पास रहने को ठौर नहीं, खाने को दाना नहीं। स्वाभीमानी था इसलिये भीख नहीं मांग सकता था। बस गोवर्धनधारी के अलावा उसका और कोई सहारा नहीं था। चल पड़ा उसी की शरण में।
खटखट करता वर्षों गोवर्धन की परिक्रमाक करता रहा। भूखा, प्यासा, थका-हारा लड़खड़ाता हुआ पता नहीं कब परिक्रमा करते-करते निढ़ाल हो गिर पड़ा। किसी पथिक ने सहारा दे दिया, तो होश आया। अपाहिज ने देखा, कि वो मार्ग में एक ओर अपनी बैसाखी के बगल में पड़ा था और पत्ते पर रखा था कुछ खाद्य पदार्थ। कांपते हाथो से एक-एक कौर करते सब कुछ खा लिया और अंत में पत्ते को भी चाट लिया। भूख शांत हुई कुछ आराम मिल चुका था। अतः खड़ा हो गया अपनी एक ही टांग पर और बैसाखी के सहारे पुनः चल पड़ा। कभी न खत्म होने वाली परिक्रमाओं की यात्रा पर। फिर पता नहीं कितने दिन, महीने और वर्ष तक वो गोबरधनधरी का ध्यान करता हुआ चलता ही रहा। कभी कोई कुछ अपने हाथ से दे देता तो खा लेता और कभी भूखा ही रह जाना पड़ता। लेकिन परिक्रमा और श्याम सुन्दर की भक्ति चलती ही रहती। जय कान्हा! जय गिरधर! उसकी जिव्हा पर चलता रहता। मानों उसको इन शब्दों के अलावा कुछ और बोलना ही न आता था। जब भक्त को कोई कुछ देता तब वो हाथ बढ़ाकर, जय कान्हा कह कर ही आभार व्यक्त करता। जब मांगना होता तब भी हाथ फैलाकर जय कान्हा कहता। मगर दोनों बार उसकी भावाभिव्यक्ति में बहुत अन्तर होता था। 
ऐसे ही चलता रहा उसका जीवन और चलते चलते बैसाखी भी घिसकर पैर से छोटी हो गई। उसका सहारा लेकर चलने में भक्त को कठिनाई होने लगी। मगर उसके पास कोई दूसरा विकल्प न था। भक्त चलता रहता बिना पीछे देखे। 
सूर्य देव अस्ताचल में जा चुके थे। रात में अपने पैर फैला लिये थे। पक्षी विश्राम के लिये अपने-अपने घोंसलो में जा चुके थे लेकिन भक्त चलता रहा, तभी अकस्मात पीछे से आकर किसी बालक ने उसकी बैसाखी पर जोर से टक्कर मारी बैसाखी दूर जा पड़ी और भक्त लड़खड़ाता हुआ हाय कन्हैया कहता-कहता गिर पड़ा। फिर बिना कुछ बोले बैसाखी की ओर घिसट कर बढ़ने लगा। तभी उसी बालक ने ठोकर मारकर बैसाखी को और आगे कर दिया। बेचारे भक्त की आंखों में लाचारी मिश्रित आंसू बह पड़े। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे? लाचारी और असमंजसता ने उसे घेर लिया। उसको लगता था कि यदि वो और घिसटकर आगे बढ़ा तो यह शरीर बालक फिर बैसाखी को आगे फेंक देगा। उस समय उसे वहां कोई और यात्राी भी दिखाई नहीं दिया। कातर शब्दों में उसने कान्हा को पुकारा। कान्हा मेरी सहायता करो। तभी बालक बोला क्यांे वो क्यों तेरी सहायता करे क्या तू खुद अपनी सहायता नहीं कर सकता? ......... खड़ा हो और चल .......... लेकिन वो नहीं खड़ा हुआ वो सोचे बैठा था कि बिना बैसाखी के वो नहीं चल सकता है। फिर बालक ने क्रोध युक्त मुस्कान से कहा “अरे तू कैसा भक्त है, तुझे मेरे शब्दों पर विश्वास नहीं हो रहा है......“ लेकिन वो अपने को असहाय समझे वहीं पड़ा रहा। 
अब बालक ने आगे बढ़कर भक्त का हाथ पकड़कर जैसे ही उसे सहारा देकर खड़ा करना चाहा उसके शरीर में बिजली सी कौंध गयी और अगले ही क्षण वो सीधा खड़ा था, लेकिन एक पैर पर ही। बालक ने कहा लगता है तुझे दूसरा झटका भी देना पड़ेगा..... और लगा दिया दूसरा झटका। .....अचंभे से देखता रह गया वो भक्त अब वो दोनो पैरो पर खड़ा था। फिर क्या था, वो तो उन्मत्त हो जय कान्हा! जय गिरधर! कहता हुआ दोनों पैरो पर उछल कर नाचने लगा। जैसे ही उसे सहजता का अनुभव हुआ उसने चारांे ओर पागलों की तरह आंखे फाड़कर उस बालक को ढूंढ़ा। लेकिन वहां बालक कहीं नहीं था। सिर्फ थोड़ी दूर पर उसकी बैसाखी पड़ी हुई उसको निहार रही थी। भक्त की आंखों से आंसू की धार बह पड़ी। हे कान्हा! हे कान्हा! कह कर उसने बैसाखी को उठाकर अपने सर पर रख लिया और नाचने लगा। 
कहते हैं आज भी कभी-कभी जिस पर गिरधर की कृपा होती है उसे वो लंगड़ा भक्त सर पर बैसाखी लिये पर भर के लिये नाचता दिखता है और फिर ओझल हो जाता है। 

डाॅ॰ आनन्द मोहन गर्ग

© 2018 - All Rights Reserved